फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   News Archives ›   India News Archives ›   why political leaders are not there in birthday party of mulayam

मुलायम के जश्न से राजनीतिक चमक गायब क्यों?

Sat, 21 Nov 2015 12:51 PM IST
Updated Sat, 21 Nov 2015 12:51 PM IST
विज्ञापन
why political leaders are not there in birthday party of mulayam

बिहार विधानसभा चुनाव से ठीक पहले महागठबंधन का साथ छोड़कर मुलायम सिंह यादव ने उसके खिलाफ तीसरा मोर्चा मैदान में न उतारा होता तो 20 नवंबर को पटना के गांधी मैदान में जुटा गैर भाजपा नेताओं का जमावड़ा 21 नवंबर की शाम के लिए सैफई को कूच करता, जहां बॉलीवुड की कई हस्तियां एक भव्य कार्यक्रम में मुलायम का जन्म दिन समारोह मना रही हैं।

विज्ञापन


फिल्म और राजनीति का ग्लैमर कुछ अद्भुत समा बांधता। फिल्मी चकाचौंध तो सैफई में होगी, लेकिन राजनीतिक जमावड़ा नदारद होगा। समधी लालू यादव या ज्यादा से ज्यादा पुराने साथी देवेगौड़ा किस-किस की कमी पूरी करेंगे!

विज्ञापन

76वां जन्मदिन है

why political leaders are not there in birthday party of mulayam

एक गलत राजनीतिक दांव या किसी मजबूरी ने 76वें जन्म दिन पर मुलायम के चेहरे से वह राजनीतिक आभा छीन ली जो उनके हिस्से आनी थी।
नीतीश कुमार के शपथ ग्रहण समारोह में उन्हें सबके आकर्षण का केंद्र, विजय गाथा का असली रचनाकार और भाजपा विरोधी राजनीति का सिरमौर होना था।

मगर वे एक मेहमान की हैसियत से भी वहां नहीं जा पाए। जनता परिवार के दलों के गठबंधन से अलग होने के लिए मुलायम अपने परिवार के अलावा और किसी को दोष भी नहीं दे सकते।

राजनीतिक विश्लेषक आज भी हैरान हैं कि मुलायम ने बिहार में कौन सा दांव खेला! वह कोई चाल थी या भाजपा ने उनकी कोई बहुत कमजोर नस दबा दी थी?

विज्ञापन

अमिताभ, सलमान, ऋतिक आएंगे

why political leaders are not there in birthday party of mulayam

बहरहाल, जब 21 नवंबर को सैफई में अमिताभ बच्चन, सलमान खान, ऋतिक रोशन और एआर रहमान जैसे सितारे अपनी चमक बिखेर रहे होंगे और अगले दिन पार्टी के विधायक, स्थानीय नेता और 2017 के टिकटार्थी उत्तर प्रदेश के 50 हजार गांवों में उनका जन्म दिन समारोह मना रहे होंगे तो मुलायम अपनी अगली रणनीति के बारे में भी जरूर सोच रहे होंगे।

बिहार चुनाव के बाद की स्थितियों में मुलायम के पास दो रास्ते हैं। एक, वे लालू-नीतीश से फिर संधि कर लें और भाजपा विरोधी मंच पर उनके साथ खड़े हो जाएं। चुनाव नतीजों के तत्काल बाद मुख्यमंत्री अखिलेश और शिवपाल यादव ने अपने बयानों में इसके संकेत दिए भी थे।

नीतीश के निमंत्रण पर मुलायम और अखिलेश दोनों के शपथ ग्रहण समारोह में जाने की पुष्टि भी कर दी गई थी। अंतिम समय में कोई नहीं गया तो साफ है कि मुलायम ने फिलहाल यह रास्ता नहीं चुना है।

विज्ञापन

मुलायम को दोयम दर्जा मंजूर नहीं

why political leaders are not there in birthday party of mulayam

यह रास्ता पकड़ने का मतलब था कि मुलायम गैर-भाजपाई राजनीति की अगुवाई में नहीं होते। एक भागीदार भर होते। इस मोर्चे के निर्विवाद नेता अब नीतीश-लालू हैं। मुलायम को अपने लिए दोयम दर्जा मंजूर नहीं।

दूसरा रास्ता है भाजपा और कांग्रेस दोनों से बराबर दूरी बनाए रखने का। लगता है उन्होंने इसे ही चुना है। फिलहाल यही उन्हें मुफीद लगता है। दो रोज पहले पार्टी के युवा कार्यकर्ताओं की बैठक में उन्होंने कहा भी कि बिहार में महागठबंधन से अलग होने का कारण सपा की कांग्रेस-विरोधी नीति है। उन्होंने याद दिलाया कि समाजवादी पार्टी का जन्म ही कांग्रेस-विरोध से हुआ था।

अपने राजनीतिक करियर में मुलायम ने कांग्रेस का साथ भी खूब दिया है लेकिन इधर उन्होंने कांग्रेस विरोधी स्वर ही मुखर किए हुए हैं। याद कीजिए, पटना में हुई महागठबंधन की पहली बड़ी रैली में भी वे खुद शामिल नहीं हुए थे, क्योंकि उसमें सोनिया मौजूद थीं।

यूपी में आक्रामक तरीके से उतरेगी बीजेपी

why political leaders are not there in birthday party of mulayam

दोनों दलों से बराबर दूरी की रणनीति भविष्य के लिए सभी दरवाजे खोले रखती है। अगर जरूरत पड़ी तो कांग्रेस का साथ आगे चल कर भी लिया जा सकता है।

यदि बिहार का मुस्लिम मतदाता भाजपा को हराने के लिए महागठबंधन में शामिल कांग्रेस को स्वीकार कर सकता है तो यूपी में क्यों नहीं। लेकिन यह आने वाली स्थितियां तय करेंगी।

बिहार की बड़ी हार के बाद भाजपा यूपी में और भी ज्यादा तैयारी और आक्रामकता के साथ उतरेगी। पश्चिम बंगाल समेत पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव यूपी से पहले होने हैं। भाजपा वहां अपनी रणनीति को और धार देकर आएगी।

यूपी में समाजवादी पार्टी के सामने भाजपा के अलावा बसपा भी बड़ी चुनौती पेश करेगी। हाल में हुए क्षेत्र पंचायत चुनावों में बसपा काफी मजबूत होकर उभरी है। लोकसभा चुनाव में पिटी मायावती के हौसले बुलंद दिखते हैं।

मुलायम के लिए चुनौती बड़ी

why political leaders are not there in birthday party of mulayam

इस कारण मुलायम की चुनौती बड़ी है। अखिलेश सरकार की छवि नीतीश कुमार जैसी कतई नहीं। उन्हें सत्ता विरोधी रुझान भी झेलना होगा।

बिहार के सफल प्रयोग ने भाजपा के मुकाबले गठबंधन की राजनीति को हवा दी है। वहां लालू-नीतीश आसानी से मिल गए। यहां मुलायम और मायावती का साथ आना असंभव सा लगता है।

मगर गठबंधन तो बनेंगे ही। भाजपा भी अपने लिए साथी खोजेगी। इसलिए मुलायम की फिलहाल यही नीति रहेगी- एकला चलो और अवसर आने दो।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed