क्यों थम सा गया है मोदी का स्वच्छ भारत अभियान?
देश को स्वच्छ बनाने के सपने के साथ शुरू हुआ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का स्वच्छ भारत अभियान पहले ही साल में थम सा गया है। पीएम मोदी ने झाडू अपने हाथ में थामकर जोर-शोर से इस अभियान की शुरुआत की थी लेकिन अन्य कामों में पीएम की व्यस्तता बढ़ने के साथ ही इससे जुड़े नामचीन चेहरे भी सीन से गायब हैं।
देश-विदेश में चर्चित रहने वाले इस अभियान को आम बजट से भी झटका लगा है। स्वच्छ भारत अभियान की सफलता पर सवाल खड़े करते हुए संसदीय समिति ने बजट कटौती पर गंभीर चिंता जताई है।
डा. पी वेणुगोपाल की अध्यक्षता वाली ग्रामीण विकास संबंधी संसदीय समिति ने कहा है कि वर्तमान बजट में पेयजल और स्वच्छता मंत्रालय के खर्च में 65 फीसदी की कमी कर दी गई है।
यूपीए सरकार ने साल 2013-14 के बजट में इस मद में 15260 करोड़ का प्रावधान किया था जबकि राजग सरकार ने इस अभियान को महज 5243 करोड़ प्रदान किए हैं।
मिशन को समय पर पूरा नहीं किया जा सकता?
सरकार ने 2019 तक स्वच्छ भारत मिशन को पूरा करने की समय सीमा तो निर्धारित कर दी है मगर स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) के लिए धन की उपलब्धता को अभी तक अंतिम रूप नहीं दिया है।
इस मामले पर डा. मुरली मनोहर जोशी की अध्यक्षता में गठित संसद की प्राक्कलन समिति ने अपनी चिंता से सरकार को अवगत कराया है। समिति का कहना है कि संसाधनों को निर्धारित किए बिना मिशन को समय पर पूरा नहीं किया जा सकता है।
मानव संसाधन विकास मंत्रालय के आंकड़े बताते हैं कि अभियान को अभी रफ्तार नहीं मिल पाई है। सरकार के पास शौचालय वाले घरों के वास्तविक आंकड़े भी नहीं हैं।
जनगणना और एनएसएसओ के आंकड़ों में 10 फीसदी से ज्यादा का अंतर है। संसदीय समिति ने भी इसके लिए सरकार को लताड़ लगाई है कि जमीनी हकीकत समझे बिना उसने अभियान चला दिया।
60 करोड़ लोग शौचालय का उपयोग नहीं करते
खुद भारत सरकार के मंत्रालय ने कहा है कि लगभग 600 मिलियन भारतीय शौचालयों का उपयोग नहीं करते हैं। संसदीय समिति के अनुसार ग्रामीण इलाकों में शौचालय के एक बार के प्रयोग में 0.6 लीटर पानी लगता है तो शहरों में 2.2 लीटर।
यूडीआईएसई के 2013-14 के आंकडे़ के अनुसार देश में 1.57 लाख शौचालय बनने के बाद भी काम नहीं कर रहे हैं। जलापूर्ति भी इसके लिए सबसे बड़ी बाधा है।
स्वच्छ भारत मिशन पर होने वाले खर्चे को लेकर संसदीय समिति का कहना है कि स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) के लिए 1,34,386 करोड़ रू. की जरूरत है।
पांच वर्षों में इसमें केंद्र का हिस्सा 1,00,447.02 करोड़ रूपया है। पेयजल और स्वच्छता मंत्रालय के अंतर्गत बारहवीं पंचवर्षीय योजना के लिए ग्रामीण स्वच्छता के लिए वर्तमान में केंद्रीय परिव्यय ही 37, 159 करोड़ है।
सरकार को 65561.63 करोड़ का जुटान कारपोरेट सामाजिक दायित्व (सीएसआर), स्वच्छ अभियान कोष और तेरहवीं पंचवर्षीय योजना अवधि के पहले दो वर्षों से हासिल करना है।
पहले था निर्मल भारत, अब स्वच्छ भारत
सरकार के स्तर पर स्वच्छता अभियान की शुरूआत वर्ष 1986 में केंद्रीय ग्रामीण स्वच्छता कार्यक्रम के जरिए हुई। वर्ष 1999 में इसके स्थान पर संपूर्ण स्वच्छता अभियान (टीएससी) शुरू हुआ। इस अभियान ने देश की ग्रामीण स्वच्छता में काफी सुधार किया।
2001 की जनगणना में ग्रामीण स्वच्छता कवरेज में 22 प्रतिशत वृद्धि देखी गई। तो 2011 की जनगणना में 32.7 की वृद्धि के आसार हैं। वर्ष 2012 में यूपीए सरकार ने स्वच्छता अभियान को नए सिरे से धार देने के लिए संपूर्ण स्वच्छता अभियान का नाम बदलकर निर्मल भारत अभियान (एनबीए)शुरू कर दिया।
अब मोदी सरकार ने एनबीए को बंद कर 2 अक्टूबर 2014 को स्वच्छ भारत अभियान की शुरूआत की है। अभियान का मकसद 2019 तक देश से खुले में शौच की प्रथा को समाप्त करना है।