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आखिर, इफ्तार पार्टियों से दूर क्यों हैं पीएम मोदी?

Wed, 15 Jul 2015 09:57 PM IST
Updated Wed, 15 Jul 2015 09:57 PM IST
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Why Modi keep distance for Iftaar party

रमजान के महीने में इफ्तार की दावतों का सिलसिला चल रहा है। लगभग सभी बड़ी पार्टियों के नेता इफ्तार पार्टी देने में बढ़-चढ़ के हिस्सा ले रहे हैं। लेकिन मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अभी तक कोई इफ्तार पार्टी नहीं दी है। तो क्या मोदी मुसलमान विरोधी हैं, और क्या इफ्तार की दावतों और सियासत के बीच कोई संबंध है?

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पढ़ें बीबीसी के जुबैर अहमद का लेख

कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की हालिया इफ्तार पार्टी की तस्वीरों को देखा। कोई मुसलमान चेहरा नज़र नहीं आया। एक साहब सोनिया जी के बगल में टोपी लगाए बैठे थे। मैंने सोचा शायद मुसलमान हों लेकिन गौर से देखा तो वो तृणमूल कांग्रेस के डेरेक ओब्रायन निकले। इसके बाद पता चला कि जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्लाह जैसी चुनिंदा मुसलमान हस्तियां वहां मौजूद थीं।
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माँ ये तस्वीरें देखतीं तो कहतीं: "इफ्तार की दावत देने वाली गैर मुसलमान, इफ्तार खाने वाले अधिकतर गैर मुसलमान तो इस इफ्तार के मायने क्या? इफ्तार तो रोजेदारों के लिए होता है।"

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मोदी ने नहीं दी रमजान की बधाई

Why Modi keep distance for Iftaar party

मुझे याद है कि बचपन में इंदिरा गांधी की इफ्तार पार्टियों पर उनकी क्या प्रतिक्रिया होती थी: 'ये तो केवल नाटक है, ढकोसला है।' उनकी खामोशी शायद इसीलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इफ्तार पार्टी की दावत नहीं देते? और इस तरह के 'नाटक और ढकोसले' वाली इफ्तार पार्टियों में नहीं जाते? या फिर इफ्तार से उसी तरह से दूर रहते हैं जिस तरह से वो मुसलमान 'टोपी' को सर पर रखने से परहेज करते हैं?

मोदी ने पिछली 'मन की बात' में राखी की बधाई दी लेकिन रमजान के पवित्र महीने पर खामोश रहे। इन बातों को लेकर भारत के मुसलमानों को मोदी जी से शिकायत है। लेकिन इफ्तार पर उनका स्टैंड गलत नहीं है। उनकी कई बातों पर आम असहमति बनी है लेकिन इफ्तार पर उनकी खामोशी पर किसी को ऐतराज नहीं होना चाहिए।

वो इसलिए कि दशकों से सभी पार्टियों और नेताओं ने इफ्तार पार्टियां या तो वोट बैंक के लिए आयोजित की हैं या फिर सत्तारूढ़ सरकार के विरुद्ध विपक्ष की एकता बनाने की कोशिश के लिए। इसमें कांग्रेस हमेशा से आगे आगे रही है। एक रोजेदार मुसलमान ने मुझसे कहा कि कांग्रेस को सेकुलरिज्म के नाम पर अगर इफ्तार पार्टियां देनी ही है तो हिन्दू-मुसलमान एकता बढ़ाने के लिए इफ्तार पार्टी दो। गांधी जी की 'सर्व धर्म समभाव' की भावना के नाम पर इफ्तार पार्टी करो।

मुसलमानों को 'सलाम'

Why Modi keep distance for Iftaar party

प्रधानमंत्री अगर इफ्तार पार्टियों से दूर रहते हैं तो कोई बात नहीं। आज यानी बुधवार को राष्ट्रपति भवन की इफ्तार पार्टी में नहीं जाते हैं तो मुसलमानों का इससे दिल छोटा नहीं होना चाहिए। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक प्रचारक के सामने जब मैंने मोदी जी और इफ्तार पार्टियों में उनकी गैरहाजिरी वाली बात छेड़ी तो उन्होंने कहा कि इसका मतलब ये न निकालो कि वो मुसलमान विरोधी हैं।

उस प्रचारक ने दावा किया कि रमजान शुरू होने से पहले इसकी बधाई उन्होंने तमाम मुसलमान देशों को दी थी। जब पिछले हफ्ते वो मुसलमान देश उज्बेकिस्तान गए तो उन्होंने वहां के मुसलमानों को सोशल मीडिया पर 'सलाम' कहा था। इसके अलावा पिछले महीने उन्होंने दिल्ली के इस्लामिक सेंटर जाकर एक मुसलमान लेखक की पुस्तक जारी की थी। इस समारोह में अधिकतर मुसलमान थे जहां मोदी जी ने भारत के मुसलमानों को पढ़ाई-लिखाई में पिछड़ेपन से बाहर निकलने को कहा था। मेरे एक मुसलमान दोस्त ने कहा कि वो प्रधानमंत्री की नसीहत से सहमत है। लेकिन उसके अनुसार प्रधानमंत्री का भी फर्ज बनता है कि वो मुसलमानों को ज्ञान प्राप्त कराने के लिए ठोस कदम उठाएं।

उसने आगे कहा, 'इफ्तार पार्टी न दें। इफ्तार पार्टी में शामिल न हों। उनके राज में इस देश का मुसलमान समुदाय खुद को अलग-थलग महसूस करने लगा है, वो हाशिए पर आ गया है। उसे सरकारी सेकुलरिज्म नहीं सरकारी मदद चाहिए।' और ये मोदी जी तो ख़ुद जानते हैं। तो देर किस बात की। क्या वो इफ्तार के बजाय मुसलमानों की शिक्षा और रोज़गार में भागीदारी बढ़ाने की ज़िम्मेदारी उठाएंगे?

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