सवालों से क्यों मुंह चुरा रहे हैं मोदी-राहुल?
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लोकसभा चुनावों की तारीख़ें तय की जा चुकी हैं और इसे पूरी दुनिया पिछले कई दशकों के सबसे बड़े चुनावों के तौर पर देख रही है।
देश की दो सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टियों के नेता – भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री पद के दावेदार नरेंद्र मोदी और कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी धड़ाधड़ रैलियां कर रहे हैं, भाषण दे रहे हैं। उन्हें इंटरनेट पर लगातार लाइव वेबकास्ट भी किया जा रहा है।
लेकिन सवाल इस बात पर उठाए जा रहे हैं कि दोनों ही नेता सिर्फ ऐसे मंचों पर जा रहे हैं जहां उनसे कोई कड़े सवाल नहीं पूछ सके। समूहों में आयोजित की जा रही चर्चाएं भी स्थानीय मुद्दों पर आधारित हैं।
नहीं दिया कोई बड़ा इंटरव्यू
दोनों बड़े नेताओं ने हाल-फिलहाल में कोई बड़ा साक्षात्कार नहीं किया है। राहुल गांधी ने एक अंग्रेज़ी चैनल को इंटरव्यू ज़रूर दिया, लेकिन उसे भी कई सप्ताह बीत गए हैं। ऐसा कहा जा रहा था कि वो अन्य संस्थानों में भी साक्षात्कार के लिए जाएंगे, लेकिन तब से अब तक उनका कोई बड़ा इंटरव्यू नहीं हो पाया।
नरेंद्र मोदी की बात करें तो उन्होंने भी काफ़ी समय से कोई बड़ा इंटरव्यू नहीं दिया है। तो ऐसे में एक बड़ा सवाल ये है कि क्या ये दोनों नेता भ्रष्टाचार, विकास, सुरक्षा, अर्थव्यवस्था, चिकित्सा जैसे अहम सवालों से मुंह चुरा रहे हैं?
वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद जोशी बताते हैं, “एक टीवी इंटरव्यू के बाद राहुल गांधी का रुक जाना यह दर्शाता है कि उस इंटरव्यू का या तो नकारात्मक प्रभाव पड़ा या उन्हें यह प्रभावशाली नहीं लगा। मुझे लगता है कि उनमें इस बात को लेकर घबराहट है कि वह सीधे सवालों का जवाब नहीं दे पाएंगे। यह बात दोनों नेताओं पर लागू होती है। हमारे मौजूदा प्रधानमंत्री क्लिक करें मनमोहन सिंह ने भी इतने लंबे समय में सिर्फ तीन-चार इंटरव्यू ही दिए हैं।”
मीडिया की भूमिका
इस बीच सवाल मीडिया की भूमिका और काम-काज के तरीक़ों पर भी उठाए जा रहे हैं।
प्रमोद जोशी के अनुसार, “हमारा मीडिया, ख़ासतौर पर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के काम का जो तरीक़ा है वो काफ़ी आक्रामक है और कई मौकों पर इसपर बाल की खाल निकालने और बातों को घुमाने का भी आरोप लगता रहा है। विवादों से बचने के लिए भी राजनेता मीडिया से दूरी बनाते हैं।”
ऐसा हो सकता है कि दोनों नेताओं के पास कई सवालों का जवाब न हो, लेकिन प्रमोद जोशी का मानना है कि राजनेताओं में ये कला हमेशा रही है कि वे पत्रकारों के सवालों का घुमाकर-फिराकर जवाब तैयार कर लेते हैं और संवादहीनता उतनी ही ख़तरनाक है जितना किसी के सवाल में फंस जाना।