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क्यों टूट रही हैं मुजफ्फरनगर दंगों के बाद हुई शादियां?

Fri, 13 Jun 2014 03:03 PM IST
दिव्या आर्य/बीबीसी संवाददाता, मुज़फ़्फ़रनगर से
दिव्या आर्य/बीबीसी संवाददाता, मुज़फ़्फ़रनगर से Updated Fri, 13 Jun 2014 03:03 PM IST
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Why marriages are being broken after the muzaffarnagar riots?

इस बस्ती की और लड़कियों से एकदम अलग है छोटी। मुज़फ़्फ़रनगर के शाहपुर इलाक़े में दंगों के बाद बनी इस बस्ती में इतनी बेबाकी से बात करने वाली वो शायद इकलौती होगी।

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19 साल की छोटी उन सैंकड़ों लड़कियों में से है जिनकी शादी मुज़फ़्फ़रनगर और शामली में पिछले साल सितंबर में हुए दंगों के बाद आनन-फ़ानन में कर दी गई। छोटी की मर्ज़ी किसी ने पूछी ही नहीं।
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वो कहती हैं कि पूछते भी तो वो मना नहीं करती। छोटी ने कहा, “हमें तो मां-बाप की ख़ुशी के लिए सब बात माननी पड़ती है, अगर हम ना मानें और अपने मन की करें, तो बिरादरी के लोग कहते कि इस घर में तो लड़की की चलती है तो ये लड़की ज़रूर ख़राब होगी।”
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पर शादी के लिए हामी भरना छोटी और उसके मां-बाप, किसी को ख़ुशी नहीं दे पाया। ससुराल में दस दिन ही रहने के बाद छोटी को वापस घर लौटा दिया गया और अब वो तलाक़ चाहती है।

टूट रही शादियां

Why marriages are being broken after the muzaffarnagar riots?

दरअसल मुज़फ़्फ़रनगर के दंगा पीड़ितों के लिए बने कुछ शिविरों में जब लड़कियों की शादियां हुईं तो उत्तर प्रदेश सरकार ने उनकी मदद के लिए उस व़क्त एक लाख रुपए दिए।

ये बात जब फैली तो कई परिवारों में बच्चियों की शादी करने की होड़ लग गई। पर सरकार ऐसा किसी नीति के तहत नहीं कर रही थी, लिहाज़ा पैसे कुछ ही परिवारों को मिले।

अब छोटी का आरोप है कि उसके ससुराल वालों ने इसी पैसे की आस में शादी की और जब पैसे नहीं मिले तो लौटा दिया। उन्होंने कहा, “एक दिन तो मेरी मां ने कहा कि हम कुछ सामान दे देते हैं, तो मेरे ससुर बोले कि पैसे ही चाहिए उन्हें, सामान से नहीं होगा।”

पैसे का लालच?

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दहेज लेना और देना भारत में क़ानूनन अपराध है, और अपने घर से बेघर हुए इन दंगा पीड़ित परिवारों के लिए दहेज जुटाना बेहद मुश्किल भी, तो छोटी के परिवार ने पुलिस में शिकायत क्यों नहीं की?

मैंने पूछा तो छोटी ने कहा कि उसके परिवार का मानना है कि पुलिस में जाने से बदनामी होगी, इससे बेहतर तो है कि तलाक़ ले लिया जाए।

छोटी कहती है कि जल्दबाज़ी की शादी में उसके साथ धोखा किया गया, “मेरे पति को ख़ून में पीलिया है, पर शादी के व़क्त ये नहीं बताया गया, और जब मैं ब्याह के वहां गई तो मुझसे नौकरों की तरह काम कराया गया। मुझसे बुरा बर्ताव किया गया, मेरी तबीयत इतनी ख़राब हो गई की शरीर में ख़ून की कमी पाई गई है।”

तो अब छोटी वापस अपने मां-बाप के साथ शाहपुर की इस बस्ती में रहने लगी हैं, जहां उसके मुताबिक़ उसकी जैसी लड़कियों की आपबीती अकसर सुनने को मिल जाती है।

कई परिवार हैं परेशान

Why marriages are being broken after the muzaffarnagar riots?

वो मुझे उसी के गांव कांकड़ा से भागकर आए एक और परिवार की बेटी सोनिया से मिलाती है। सोनिया की शादी भी राहत शिविर में हुई।

सोनिया भी शादी के बाद ससुराल में क़रीब एक महीना बिताकर वापस भेज दी गईं। हालांकि उन्हें एक लाख रुपए की सरकारी मदद भी मिली थी।

पर सोनिया, छोटी से बिल्कुल अलग है। वो तो अपना मुंह भी नहीं खोलती। उसकी आवाज़ उसके भाई और उसकी मां हैं। ऐसे में ये जानना नामुमकिन था कि ये शादी उसकी मर्ज़ी से हुई भी थी या नहीं।

पर ये ज़रूर जान लिया कि ससुराल ने उसे वापस क्यों लौटाया। सोनिया को मिले पैसे उसके परिवार ने ससुराल वालों को नहीं दिए हैं और वो उन पैसों के बिना लड़की को रखने को राज़ी नहीं हैं।

ससुराल जाने का इंतज़ार

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सोनिया के भाई कहते हैं, “जबसे मैं सोनिया को वापस लेकर आया हूं कोई फ़ोन कर उसका हाल तक नहीं पूछता, बस शादी करवाने वाले बिचौलिए ने ही पैसों की बात हमसे की है।”

इस सबके बावजूद सोनिया की मां अपनी बेटी को उसी घर वापस भेजना चाहती हैं। मैंने सोनिया से पूछा वो क्या चाहती है? तो बोलीं, “चली जाऊंगी।”

दंगों के बाद से मुज़फ़्फ़रनगर और शामली ज़िलों में काम कर रहीं समाजसेवी अज़रा बताती हैं कि वो ऐसी कई लड़कियों से मिली हैं और उनके मुताबिक़ तो इनमें से कई लड़कियां नाबालिग़ हैं।

अज़रा कहती हैं, “ये बच्चियां पढ़ी-लिखी नहीं हैं और परिवार में अपनी बात नहीं रख पातीं। हमने शादियों के व़क्त भी कई परिवारों को समझाया की जल्दबाज़ी ना करें, बच्चियां भी छोटी हैं, पर हमें बार-बार सुरक्षा और इज़्ज़त का हवाला दिया जाता रहा।”

परिवारों में है चुप्पी

Why marriages are being broken after the muzaffarnagar riots?

कई परिवार अपनी बच्चियों के ससुराल से वापस लौटने पर बात करने से झिझकते हैं। परिवारों से उनके फ़ैसले के बारे में बात करना आज भी बहुत मुश्किल है। जिनसे भी बात की उनका यही मानना था कि उस व़क्त शादी करने में ही समझदारी थी।

पर बार-बार ऐसा अहसास हो रहा था कि यहां समाज ने ज़िम्मेदारी निभाने की जगह निबटाने का रवैया अपनाया है। सरकारी मदद, यौन हिंसा के डर और ससुराल वालों-परिवार वालों के कथित लालच के चक्रव्यूह में ना जाने कितनी जवान लड़कियों की ज़िन्दगी बदल गई है।

18-19 साल की ये लड़कियां क्या करना चाहती थीं और अब क्या सोचती हैं, ना तो ये बताने का हौसला इन लड़कियों में दिखता है और ना ही ये जानने की दिलचस्पी किसी परिवार में। अफ़सोस ये कि दंगों में जान-माल के नफ़े-नुक़सान का लेखा-जोखा करने वालों को, शायद इन लड़कियों की ज़िन्दगी के दलदल की ख़बर भी ना हो।

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