नरेंद्र मोदी से क्यों 'खफा' हैं अयोध्या के ये महंत?
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उत्तर प्रदेश का अयोध्या-फैजाबाद चुनाव क्षेत्र ही वो स्थान है जहां से एक समय में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को देश की राजनीति में अपने पैर जमाने का स्वर्णिम अवसर मिला था।
शायद इसीलिए भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने अपनी दावेदारी पक्की होते ही अपने 'खास सहयोगी' और पार्टी महासचिव अमित शाह को उत्तर प्रदेश रवाना कर दिया था। पिछले वर्ष से अमित शाह ने उत्तर प्रदेश को अपना घर बनाते हुए भाजपा के लिए काम करना शुरू किया।
हालांकि अमित शाह ने प्रत्यक्ष रूप से बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि का जिक्र नहीं किया था, लेकिन उन्होंने गत वर्ष जुलाई महीने में अयोध्या पहुंच कर संत-महात्माओं से मुलाकात की थी और कारसेवक पुरम में पत्रकारों से बात भी की थी। शाह ने कहा था, "कांग्रेस को सत्ता से हटाने के अलावा मैंने प्रार्थना की है कि हम सब मिलकर एक विशाल राम मंदिर का निर्माण करें"।
राम मंदिर से किया किनारा
उस समय जानकारों का मत था कि अपनी राजनीति में बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि विवाद को करीब रखने वाली भाजपा आगामी चुनावों में भी इस मुद्दे के इर्द-गिर्द रहेगी।
लेकिन इस बात को अब छह महीने से ज्यादा हो चुके हैं। खुद नरेंद्र मोदी ने भी इस विवाद को अपने भाषणों में प्रत्यक्ष रूप से शामिल भी नहीं किया है।
आम चुनावों से ठीक पहले अयोध्या नगरी पहुंचने पर हिन्दू धार्मिक स्थलों के संत-महात्माओं से हुई बात के बाद एक बड़ी निराली और अचरज भरी तस्वीर सामने आती है।
'खून की धारा से बना मंदिर नहीं चाहिए'
हनुमान गढ़ी ट्रस्ट के प्रमुख पुजारी और ज्ञान सागर मंदिर के भी मुखिया महंत ज्ञान दास रोज की तरह मंदिर के प्रांगण में बैठे मिलते हैं और उनके आस-पास भक्तों की चौपाल लगी हुई है।
उन्होंने कहा, "हम किसी एक व्यक्ति या पार्टी के लिए नहीं हैं। किसी एक पार्टी से हमारा लेना-देना नहीं है। हमारा आशीर्वाद तो उसी को मिलेगा जो सबको सामान भाव से देखे। अमित शाह जब आए तो हम अयोध्या नहीं गंगासागर में गए हुए थे।
हमको ऐसा राम मंदिर नहीं चाहिए जो खून की धारा से बना हो, बल्कि ऐसा चाहिए जो सुलह और दूध की धारा से बना हो। चाहे मोदी हों या राहुल गांधी हों, हम किसी का नाम नहीं लेना चाहते। जो भी अच्छा काम करेगा उसे हमारा आशीर्वाद मिलेगा"।
'मोदी के आने से भाजपा की सीटें कम होंगी'
हनुमान गढ़ी के पास ही मौजूद है वो मैदान जहां पर किसी जमाने में बाबरी मस्जिद हुआ करती थी। अब यहां ऊंचे-ऊंचे कटीले तारों के बीच कड़ी सुरक्षा है और सैंकड़ों पुलिसकर्मियों का पहरा है।
इसी स्थल से सटा हुआ है विशालकाय सरजू कुंड मंदिर जिसके प्रमुख महंत युगल किशोर शरण शास्त्री राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के पूर्व प्रचारक भी रहे हैं। महंत शास्त्री को लगता है कि भाजपा इन चुनावों में राम मंदिर के मामले से इसलिए बच रही है जिससे उत्तर प्रदेश और बिहार के पिछड़े और दलित वर्ग का समर्थन भी ले सकें।
उन्होंने कहा, "संघ के लिए हिंसा कोई बड़ा मुद्दा नहीं रहा है लेकिन आरएसएस की इस नीति पर मोदी खरे उतर रहे है। इसलिए क्योंकि आडवाणी इस सोच पर खरे नहीं उतरे। मुझे लगता है मोदी के आने से भाजपा की सीटें कम ही हो जाएंगी, बढ़ेंगी नहीं। मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने में भाजपा ने जल्दी कर डाली है, अभी समय नहीं था"।
'मुसलमानों का कोई पुरसाने हाल नहीं'
समय निकाल कर मैं बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि मामले में पहली बार वर्ष 1959 में अदालत का दरवाज़ा खटखटाने वाले हाशिम अंसारी के घर भी पहुंचा। 90 वर्ष की आयु के आस-पास वाले हाशिम अंसारी मोदी के साथ-साथ कांग्रेस और समाजवादी पार्टी से भी ख़फ़ा बैठे हैं।
उन्होंने बताया, "भारत में कोई भी प्रधानमंत्री बनें, मुसलमानों का कोई पुरसाने हाल लेने वाला नहीं है।जब बाबरी विध्वंस हुआ तब भी राज्य और केंद्र सरकारों में मुसलमान मंत्री चुप बैठे थे और अब मुजफ्फरनगर में दंगे हुए तब भी ऐसा ही हुआ। मोदी हो या कोई और हों मुसलमानों का कुछ नहीं हो सकता"।
बहराल अयोध्या-फैज़ाबाद में निवर्तमान सांसद तो कांग्रेस के निर्मल खत्री हैं लेकिन इस बार भाजपा ने पूर्व विधायक लल्लू सिंह को चुनावी मैदान में उतारा है। इलाके में पिछले हफ्ते इस बात को लेकर विरोध प्रदर्शन भी हुए थे कि राम मंदिर आंदोलन में भाजपा की ओर से सक्रिय रहे, तीन बार सांसद रह चुके, विनय कटियार को इस बार टिकट नहीं दिया गया। भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के वाराणसी चुनाव क्षेत्र चुनने के बाद से यहाँ कुछ लोगों में काफ़ी निराशा भी दिख रही है।