मोदी के खिलाफ इसलिए चुनाव लड़ना चाहते हैं केजरीवाल
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
भारतीय जनता पार्टी की तरफ से प्रधानमंत्री पद के दावेदार नरेंद्र मोदी और आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल के बीच बनारस के मैदान में मुकाबला हो सकता है। लेकिन बहुत से लोगों का मानना है कि इस मुकाबले में कोई खास दम नहीं है।
मोदी के पास लंबा अनुभव है। चुनावी सर्वे बता रहे हैं कि इन लोकसभा चुनावों में उनकी शोहरत बुलंदी छू रही है और फिलहाल वाराणसी लोकसभा सीट भी उनकी पार्टी भाजपा के पास है।
ऐसे में अरविंद केजरीवाल बनारस के इस रण में जीत के लायक मजबूत नहीं दिखते, लेकिन सियासत में सिर्फ जीतना कोई लक्ष्य नहीं होता। खास तौर से केजरीवाल के लिए ऐसा है। केजरीवाल, मोदी के खिलाफ चुनाव क्यों लड़ना चाहते हैं, इसकी वजह ये रहीं।
केजरीवाल को नुकसान कम, फायदा ज्यादा
अरविंद केजरीवाल ने ऐलान किया है कि वह नरेंद्र मोदी की चुनौती स्वीकार करने को तैयार हैं और 23 मार्च को इसकी घोषणा हो सकती है। उनका कहना है कि अगर बनारस की जनता उन्हें लड़ने के लिए कहेगी, तो वह जरूर लड़ेंगे।
दरअसल, मोदी के खिलाफ खड़े होने से केजरीवाल को कोई नुकसान नहीं, बल्कि फायदा है। वह चुनाव भले ही न जीत सकें, लेकिन वीआईपी सीट का मुकाबला उन्हें मीडिया और देश, दोनों का फोकस दिलाएगा।
अगर वह बड़े नेता को चुनौती देने वाले आम आदमी के रूप में सामने आते हैं, तो मौजूदा चुनावों में 543 लोकसभा सीटों में वाराणसी पर सबसे ज्यादा निगाह रहेंगी।
मोदी को चुनौती देने वाले नेता बनेंगे?
चुनावी सर्वे बता रहे हैं कि इन चुनावों में भाजपा की अगुवाई वाले एनडीए को दूसरे सभी दलों पर भारी पड़ेगा। मोदी प्रधानमंत्री के रूप में पहली पसंद के रूप में दिख रहे हैं।
भाजपा समर्थकों का कहना है कि देश में मोदी लहर है। ऐसे में उनके मुकाबले में उतरकर केजरीवाल यह संदेश दे सकते हैं कि वो इकलौते हैं जिन्होंने इतनी बड़ी ताकत को चुनौती देने की हिम्मत दिखाई, क्योंकि कांग्रेस पहले ही हार मान चुकी है।
केजरीवाल ने चार दिन चला गुजरात दौरा किया, मोदी से मिलने उनके ऑफिस पहुंच गए और राज्य के विकास पर 17 सवाल भी सौंपे। वह यह संदेश देना चाहते हैं कि उनके जैसी छोटी पार्टी मोदी के सामने मुख्य विपक्षी दल की भूमिका निभा रही है।
AAP को एकजुट करने का मौका मिलेगा?
अरविंद केजरीवाल जब मुख्यमंत्री नहीं बने थे, तो उनकी पार्टी को गजब का समर्थन मिला था। किसी ने कल्पना भी नहीं की थी पहली बार चुनावों में उतरी आम आदमी पार्टी 28 सीटें जीतने में कामयाब रहेगी।
लेकिन जब से उन्होंने पद छोड़ा, कुछ ठीक नहीं चल रहा। AAP कार्यकर्ताओं का दिल्ली में भाजपा मुख्यालय पर हिंसक प्रदर्शन, चुनावी टिकट को लेकर समर्थकों में बवाल, टीवी इंटरव्यू के दौरान प्रभावित करने का वीडियो लीक होना और फिर मीडिया को जेल में डालने की धमकी, केजरीवाल चौतरफा मुसीबत में घिरे हैं।
ऐसे में अगर अरविंद केजरीवाल, बनारस में मोदी से लोहा लेते हैं, तो आम आदमी पार्टी को एक बार फिर स्पष्ट और फोकस मिल सकता है। उसके सदस्य एक बार फिर एकजुट हो सकते हैं।
राहुल को पीछे छोड़ेंगे केजरीवाल?
नरेंद्र मोदी, कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी और अरविंद केजरीवाल, तीन ऐसे नेता जिन्हें मौजूदा चुनावों में सबसे ज्यादा फोकस मिल रहा है। अनुमान है कि मोदी सबसे आगे हैं, लेकिन दूसरे नंबर पर कौन है?
अगर बनारस में भाजपा बनाम आम आदमी पार्टी की स्थिति बनी, तो मीडिया और कैमरे का ध्यान खींचने के मामले में अरविंद केजरीवाल कांग्रेसी नेता को जरूर पीछे छोड़ सकते हैं।
उन्हें कुछ कामयाबी भी मिली है। गुजरात के अपने चार दिवसीय दौरे में वह राज्य में ऐसे मुद्दे उठाने में कामयाब रहे, जो कांग्रेस बीते कई साल में सामने नहीं रख सकी।
आगे की सियासत पर टिकी है नजर?
इस बात की काफी संभावनाएं हैं कि अरविंद केजरीवाल को नरेंद्र मोदी के हाथों हार का मुंह देखना पड़े, क्योंकि जहां तक मुस्लिम वोटरों की बात है, तो वह बाहुबली नेता मुख्तार अंसारी के खाते में जा सकते हैं।
यूं भी पिछली बार मुरली मनोहर जोशी को अंसारी को हराने के लिए ऐड़ी-चोटी का जोर लगाना पड़ा था। अगर ऐसा हुआ, तो भी केजरीवाल एक योद्धा की तरह हारेंगे।
भविष्य में जब कभी मोदी का जिक्र होगा, तो यह भी कहा जाएगा कि केजरीवाल ने उनसे मुकाबला किया था। वैसे भी केजरीवाल की निगाह 2014 चुनावों पर नहीं, बल्कि आगे की सियासत पर है।