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जब संघी विचारधारा से अलग हुआ एक कट्टर समर्थक

Mon, 13 Oct 2014 03:06 PM IST
Updated Mon, 13 Oct 2014 03:06 PM IST
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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी अपने को 'राष्ट्रवादी' विचारधारा से संचालित संगठन बताते हैं।

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मेरे विचार से भारत में 'राष्ट्रवाद' की विचारधारा की जनक भाजपा से ज़्यादा कांग्रेस रही है।

वहीं, संघ की विचारधारा एक समुदाय मात्र को मजबूत करने वाली प्रतीत होती है।

भारत जैसी सांस्कृतिक विविधता वाले देश में किसी एक समुदाय के बजाय सभी समुदायों को लेकर चलने वाली विचारधारा ही ज़रूरी प्रतीत होती है।
मैं अपने परिवार को 'राष्ट्रवादी' इसलिए कहता हूँ कि मेरे पिता अर्धसैनिक बल में थे और मैं उसी परिवेश में पला और बड़ा हुआ।

पहले इस बात में यक़ीन करता था कि लोग किसी विचारधारा से सहमत होने के बाद ही उससे जुड़ते हैं।

मैं उत्तर भारत के एक उच्च जाति के हिंदू परिवार से हूँ। मेरी किशोरावस्था के दौरान रामजन्मभूमि आंदोलन और मंडल आंदोलन अपने चरम पर था।

समाज भारतीय जनता पार्टी की ओर झुक रहा था। ख़ासकर वो समाज, जिससे मैं आता हूँ।

'राष्ट्रवाद' मेरे परिवार के अंदर था।

स्नातक की पढ़ाई के दौरान संसद में अटल बिहारी वाजपेयी के भाषणों से मैं काफ़ी प्रभावित रहा। लेकिन, जब मैं एमए करने के लिए जेएनयू पहुँचा तो मुझे बड़ा सांस्कृतिक झटका लगा।

अलगाववादी या राष्ट्रविरोधी

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जेएनयू में कश्मीरी अलगाववादियों को भी बुलाया जाता था, जो मेरे लिए झटके जैसा था। मुझे लगता था कि ऐसा करना राष्ट्रविरोधी है।

मुझे यह भी लगने लगा कि साम्यवादी आंदोलन राष्ट्रविरोधी है। इससे मेरा झुकाव अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की ओर होता चला गया।

1998 में ऐसा मौक़ा भी आया जब मैं इसमें पूरी तरह सक्रिय हो गया। धीरे-धीरे मेरी अपनी पहचान विद्यार्थी परिषद के सक्रिय कार्यकर्ता के रूप में होनी शुरू हो गई।

मैं पाँच-छह साल तक विद्यार्थी परिषद से जुड़ा रहा। इस दौरान मैं विद्यार्थी परिषद के वैचारिक पर्चे लिखा करता था। मेरी सक्रियता वैचारिक ही थी।

परिषद से जुड़े आंदोलनों से मुझे भावनात्मक समर्थन मिल रहा था और मेरी जान-पहचान भी इससे जुड़े लोगों से ही हो रही थी।

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शोध और समझ

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एमफिल और पीएचडी के दौरान मैंने बीसवीं सदी की शुरुआत में हिंदू राष्ट्रवादी आंदोलनों पर अध्ययन करना शुरू किया।

इस पर गहन अध्ययन के दौरान बौद्धिक स्तर पर मुझे दो चीज़ें समझ में आईं।

पहली ये कि भारतीय राष्ट्रवाद में जनसंघ या भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की कोई भूमिका नहीं थी। हक़ीक़त यह है कि भारतीय राष्ट्रवाद में सबसे अहम भूमिका कांग्रेस की ही थी।

शोध के दौरान मुझे भारत की आज़ादी के आंदोलन में संघ की सक्रिय भूमिका का कोई प्रमाण नहीं मिल पाया। बौद्धिक स्तर पर मेरी राष्ट्रवाद की शुरुआती समझ को उसी समय बड़ा झटका लगा।

शोध के बाद मैं इस नतीजे पर पहुँचा कि संघ राष्ट्रवाद का एकमात्र प्लेटफॉर्म नहीं है। मगर इसका मतलब क़तई यह नहीं है कि 'राष्ट्रवाद' में संघ की भूमिका का हवाला देकर आज भाजपा पर सवाल उठाए जाएं।

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बदलता संदर्भ

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शोध के बाद संघ की कमजोरियाँ और ताक़त मेरे सामने खुलकर आने लगीं। मूल रूप से यह आंदोलन हिंदुओं को एकजुट करने का था। हालांकि मैंने संघ से दूरी इस ज्ञान के मिलने के बाद नहीं बनाई।

मैं 2004 में संघ से दूर हुआ। जेएनयू से निकलने के बाद मैंने पत्रकारिता की पढ़ाई शुरू की।

जेएनयू से संपर्क टूटने के बाद मेरी विचारधारा का संदर्भ भी बदलना शुरू हो गया। जब मैं जेएनयू में था तब विद्यार्थी परिषद मेरे लिए सब कुछ थी। लेकिन अब मैं एक पत्रकार बन रहा था।

इससे विद्यार्थी परिषद के साथ जुड़े रहने की मेरी बौद्धिक, वैचारिक और भावनात्मक ज़रूरतें नहीं रहीं। धीरे-धीरे मैं परिषद से दूर होता गया। हालांकि मैं किसी और विपक्षी विचारधारा से भी नहीं जुड़ा।

मतभेद के बिंदु

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मैं गांधी की विचारधारा और सावरकर की विचारधारा के बीच के फ़र्क को समझने लगा था।

एक की विचारधारा मतभेदों को नज़रअंदाज़ करके जोड़ने वाले बिंदु खोजने की है। महात्मा गांधी का एजेंडा मतभेदों को दूर करने का था।

जबकि दूसरे की विचारधारा अपने समुदाय को मजबूत करने की थी।

ये एक समुदाय के विकास का मॉडल है जबकि गांधी की विचारधारा सभी समुदायों को साथ लेकर चलने की लगती है।

मुझे लगता है कि भारत जैसे विविधताओं वाले देश में साथ चलना वक़्त की ज़रूरत है।

मैं गांधीवादी विचारधारा से पूरी तरह प्रभावित हो गया। वक़्त के साथ मेरी रुचि भी बदली और मैं संघ से अलग हो गया।

(बीबीसी संवाददाता सलमान रावी से बातचीत पर आधारित)

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