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मीट खाएँ या सब्जी, सरकार क्यों बताए

Sat, 12 Sep 2015 07:32 PM IST
ज़ुबैर अहमद
ज़ुबैर अहमद Updated Sat, 12 Sep 2015 07:32 PM IST
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Why govt decides, what we eat?

डेढ़ साल पहले जब से मोदी सरकार बनी है, मांस, खासकर गोमांस पर केवल चर्चाएं ही नहीं बढ़ी हैं, बल्कि इस पर प्रतिबंध भी लगाए जाने के प्रयास किए जा रहे हैं।

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अगर यही हाल रहा तो कहीं ऐसा ना हो कि भारत में माइक की तरह कुछ अरसे बाद मांसाहारियों की आदत की छुट्टी हो जाए। मुझे तो कोई खास फर्क नहीं पड़ेगा, क्योंकि मैं बीफ नहीं खाता और मटन कभी-कभी खा लेता हूँ।
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ना भी मिले तो इसे 'मिस' नहीं करता। लेकिन मैं उन बेचारों के बारे में सोच रहा हूँ जो रोज बीफ खाते हैं, क्योंकि वो रोज दाल या सब्जी नहीं खरीद सकते। मैं उनके बारे में सोच रहा हूँ जो बीफ बेच कर अपना परिवार चलाते हैं।
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देश के आदिवासी हों या फिर गरीब हिंदू और मुस्लिम, जनता को पोषण आमतौर पर बीफ से मिलता है।

'मेरा खाना, मेरा फैसला'

Why govt decides, what we eat?

मैं उनके बारे में सोच रहा हूँ जो क्या खाएं, क्या न खाएं, इसका फैसला खुद करना चाहते हैं। ऐसे लोग भी हैं जो कहते हैं कि सरकार कौन होती है ये बोलने वाली कि मीट नहीं सब्जी खाओ या खास दिनों पर मीट न बेचो?

क्या ये सवाल नरेंद्र भाई मोदी के प्रधानमंत्री बनने से पहले उठाए जा रहे थे? क्या ये राष्ट्रीय बहस का मुद्दा थे? जम्मू-कश्मीर में 1932 से गोहत्या पर पाबंदी लगाई गई थी, लेकिन अब अचानक वहां उस प्रतिबंध को लागू किया जा रहा है।

कश्मीर वादी के अधिकतर कश्मीरी मुसलमान भेड़ का मांस खाते हैं, लेकिन वे गोहत्या पर पाबंदी का विरोध कर रहे हैं।

विवाद क्यों?

Why govt decides, what we eat?

मीट पर ताजा विवाद जैन समाज के एक त्योहार के दौरान कई स्थानों पर मीट के व्यापार पर लगाई गई पाबंदी के फैसले से शुरू हुआ है। इस त्योहार के दौरान पिछले कई सालों से ये पाबंदी लागू है। फर्क ये है कि इस साल ये प्रतिबंध दो दिनों के बजाय चार से आठ दिनों के लिए लगाया गया था।

केंद्रीय मंत्री और भारतीय जनता पार्टी की वरिष्ठ नेता निर्मला सीतारमण ने इस बात पर आश्चर्य जताया जताया कि ये पाबंदी जैन त्योहार के समय कई सालों से लगाई जा रही है, तो इसमें विवाद किस बात का और बीजेपी को बदनाम क्यों करें?

सतही तौर पर देखें तो फर्क केवल प्रतिबंध की अवधि का है। लेकिन अगर इसकी गहराई में जाएँ और इसके आसपास के कुछ और मुद्दों पर ध्यान दें तो एक पैटर्न नजर आता है। निर्मला सीतारमण ने जिस मासूमियत से इस मुद्दे पर अपनी पार्टी का पक्ष रखा उससे दाल में कुछ काला जरूर नजर आता है।

सोशल मीडिया पर विवाद

Why govt decides, what we eat?

यह विवाद शुरू हुआ 4 सितंबर को मुंबई से सटे मीरा भयंदर में। उस दिन बीजेपी के पार्षदों के नेतृत्व में नगर निगम ने त्योहार के दौरान एक हफ्ते के लिए मीट की बिक्री पर बैन लगाने का एक प्रस्ताव पारित किया। इसके कुछ दिनों बाद मुंबई और नवी मुंबई की महानगर पालिकाओं में भी प्रतिबंध लगाए गए।

इसके बाद महाराष्ट्र से बाहर राजस्थान और गुजरात में भी वैसे ही प्रस्ताव पास किए गए। शिव सेना ने इस फ़ैसले को असंवैधानिक और गैर कानूनी बताया है। हाल में कहीं पढ़ा था कि देश का दो तिहाई बहुमत मांसाहारी है।

मान लीजिए कि आधी आबादी भी अगर मांस खाती है तो इस पर पाबंदी क्यों? शिव सेना के नेता संजय राउत के अनुसार, अगर इस तरह की पाबंदियां बढ़ती गईं तो आगे चल कर समाज में फूट पड़ने का खतरा पैदा हो सकता है।

सोशल मीडिया पर यह फूट तो अभी से नजर आने लगी है। मैं फेसबुक और ट्विटर पर शाकाहारियों और मांसाहारियों के बीच मीट पर बहस रोज देखता हूँ। उम्मीद करता हूँ कि यह विवाद सोशल मीडिया तक सीमित रहे।

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