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सिलिकन वैली में क्यों है भारतीयों का दबदबा?

Fri, 22 Jan 2016 08:34 PM IST
Updated Fri, 22 Jan 2016 08:34 PM IST
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Why dominated by Indians in Silicon Valley?

अमेरिका के एक तिहाई स्टार्ट-अप भारतीयों ने शुरू किए हैं। भारतीयों की कामयाबी ऐसी है कि अमेरिका में सात अन्य देशों के आप्रवासी मिलकर भी इतने स्टार्ट अप लॉन्च नहीं कर पाए हैं।

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अमेरिका की सिलिकन वैली में कुल वर्कफोर्स का छह प्रतिशत भारतीय हैं लेकिन सिलिकन वैली के 15 फीसदी स्टार्ट अप के कर्ताधर्ता भारतीय हैं।

स्टेनफर्ड और ड्यूक यूनिवर्सिटी में पढ़ाने वाले प्रोफेसर विवेक वाधवा के अध्ययन से यह जानकारी मिली है।

इस अध्ययन के मुताबिक भारतीयों की सफलता के सामने अमेरिका में स्टार्ट अप शुरू करने वाले ब्रिटेन, चीन, ताइवान और जापान के लोगों की मिली-जुली कामयाबी भी फीकी नजर आती है।
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गूगल का शुरू से ही भारत से नाता

Why dominated by Indians in Silicon Valley?

सिलिकन वैली में सवाल पूछा जा रहा है कि भारतीय मूल के लोगों की अमेरिका में इस कामयाबी का रहस्य क्या है?

बीते कुछ सालों में अमेरिका में सूचना और तकनीक की दुनिया में भारतीयों का दबदबा खासा बढ़ा है।

दुनिया के सबसे बड़े इंटरनेट सर्च इंजन कंपनी गूगल के सीईओ सुंदर पिचाई भारतीय मूल के हैं।

पहली बार कोई भारतीय गूगल में शीर्ष पद तक पहुंचा है, पर हकीकत यह है कि गूगल का तो शुरू से ही भारत से नाता रहा है।

1998 में स्टेनफर्ड यूनिवर्सिटी में सर्गेई ब्रिन और लैरी पेज ने अपने शिक्षक टैरी विनोग्रैड और राजीव मोटवानी के साथ गूगल की परिकल्पना विकसित की थी।

भारत में जन्मे और पले-बढ़े मोटवानी ने ही गूगल के पहले कर्मचारी क्रेग सिल्वरस्टीन को प्रशिक्षण दिया था। मोटवानी और पिचाई दोनों इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नालॉजी (आईआईटी) से पढ़े थे।

सबसे ज्यादा औसत सालाना आमदनी वाला समूह

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वैसे केवल सुंदर पिचाई और मोटवानी ही नहीं, अमेरिका की तकनीकी दुनिया में शीर्ष पर भारतीयों की मौजूदगी लगातार बढ़ रही है।

2010 के जनसंख्या आंकड़ों के मुताबिक, अमेरिका में भारतीय समुदाय सबसे ज्यादा औसत सालाना आमदनी वाला समूह है।

अमेरिका में रह रहे भारतीय साल में 86,135 डॉलर कमाते हैं जबकि अमेरिका की औसत आय 51,914 डॉलर सालाना है।

हालांकि भारतीय समुदाय को यहां तक पहुंचने में काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा है। अब पिचाई का ही उदाहरण देखिए।

चेन्नई के एक इंजीनियर के बेटे पिचाई जब अमेरिका गए तो हवाई टिकट की कीमत उनके पिता के सालाना वेतन के बराबर थी।

पैसे की तंगी की वजह से वे छह महीने तक अपनी होने वाली पत्नी को फोन नहीं कर पाए थे।

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सत्या नडेला को माइक्रोसॉफ्ट ने सीईओ बनाया

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2004 में गूगल से जुड़ने से पहले पिचाई मैनेजमेंट कंसल्टेंट के बतौर मैकेंजी और माइक्रोप्रोसेसर सप्लायर एप्लायड मैटेरियल्स के साथ काम कर चुके थे।

गूगल के सीईओ बनने से पहले पिचाई ने वेब ब्राउजर गूगल क्रोम की स्थापना की थी।

दरअसल पिचाई जैसे भारतीयों के बढ़ते दबदबे की सबसे बड़ी वजह यही है कि अमेरिकी सिलिकन वैली में शीर्ष स्तर पर जो कार्य-संस्कृति है उसमें बड़ा बदलाव आया है।

पहले के सीईओ काफी अहम वाले, कर्मचारियों को आपस में भिड़ाकर और प्रतिस्पर्धी माहौल बनाकर उत्पादकता बढ़ाने में यकीन रखते थे।

अब प्रबंधन का अंदाज बदला है और टकराव को नजरअंदाज कर, बेहतर काम करने का रास्ता अपनाने की संस्कृति में भारतीय सीईओ एकदम फिट बैठते हैं। यही वजह है कि माइक्रोसॉफ्ट ने सत्या नडेला को अपना सीईओ बनाया है।

इसके अलावा जापान के टेलीकॉम मल्टीनेशनल सॉफ्टबैंक ने निकेश अरोड़ा को अपना प्रेसीडेंट बनाया है। एडोबी को शांतानु नारायण चला रहे हैं।

भारतीयों का अंग्रेजी जानना बड़ी वजह

Why dominated by Indians in Silicon Valley?

आईटी की बड़ी कंसल्टेंसी कंपनी कॉग्नीजेंट को फ्रांसिस्को डिसूजा लीड कर रहे हैं तो कंप्यूटर मेमरी की बड़ी कंपनी सैनडिस्क के मुखिया संजय मेहरोत्रा हैं।

केवल टेक्नॉलाजी की बड़ी कंपनियों में ही भारतीयों का दबदबा नहीं बल्कि शराब कारोबार करने वाली सबसे बड़ी कंपनी डियाजियो के सीईओ इवान मेनजेस भी भारतीय मूल के हैं।

मास्टरकार्ड के बॉस अजय बंगा भी भारतीय हैं। पेप्सी की सीईओ इंद्रा नूयी टॉप तक पहुंचने वाली भारतीयों में शामिल हैं।

भारतीय को मिली कामयाबी की एक बड़ी वजह भारतीयों का अंग्रेजी जानना है। ब्रिटिश उपनिवेशवाद के चलते भारत में उच्चशिक्षा अंग्रेजी माध्यम में उपलब्ध है। ऐसे भारतीय पेशेवरों को अलग से अंग्रेजी सीखने में मेहनत नहीं करनी पड़ती।

यहां भारतीय काफी अच्छा कर रहे हैं

Why dominated by Indians in Silicon Valley?

सिलिकन वैली में नेटवर्किंग संस्था चला रहे द इंडस आंतरप्रेन्योर्स के अध्यक्ष वेंकटेश शुक्ला इसकी एक दूसरी वजह भी मानते हैं।

वे कहते हैं, "इनमें से ज्यादातर लोग भारत से तब आए थे जब वहां सीमित अवसर थे। अमेरिका की वीजा नीतियों के कारण सिर्फ बेहतरीन प्रतिभाएं ही यहां आ सकीं। तो यहां भारत के सबसे प्रतिभाशाली लोग मौजूद हैं।"

इसके अलावा कुछ और पहलू हैं जिनके चलते भारतीय अच्छा कर रहे हैं। इनमें विविधता भी शामिल है।

वेंकटेश शुक्ला कहते हैं, "अगर आप भारत में पले-बढ़े हों तो विविधरंगी समाज आपके लिए कोई नई बात नहीं होती। आप जानते हैं कि लोग अलग-अलग तरह के होते हैं। जरूरी नहीं कि आपसे बेहतर या कमतर। सिलिकन वैली में ज्यादा राजस्व और बेहतर उत्पाद की बात होती है। आप कैसे दिखते हैं और क्या बोलते हैं, इसका कोई मतलब नहीं होता।"

भारतीय ने सीखे टीम वर्क के गुर

Why dominated by Indians in Silicon Valley?

कल्चरल डीएनए-साइकॉलोजी ऑफ ग्लोबलाइजेशन किताब के लेखक गुरनेक बैंस कहते हैं, "भारतीयों के दिमाग में विविधता की यह समझ समाई हुई है। इसके लिए भारतीय परंपरा में अनेक देवी-देवताओं का होना, विविध उत्पाद, विविध वास्तविकता और विविधरंगी नजरिए का होना जिम्मेदार हैं।"

बैंस कहते हैं, "इसके चलते भारतीय तेजी से बदलती आईटी की दुनिया की चुनौतियों को संभालने में सक्षम हैं।"

बैंस की फर्म 200 से ज्यादा सीईओ के कामकाज का आकलन कर चुकी है और उनके मुताबिक अमेरिकियों की सोच है कि भारतीय जिस तरह काम करते हैं वह सही तरीका है और अमेरिका में यही चलता है।

तमाम गुणों के बावजूद भारतीयों में एक बड़ी खामी भी है। बैंस के अध्ययन के मुताबिक, "भारतीय टीम वर्क में सबसे कमजोर हैं।" इस पहलू में अमेरिकी और यूरोपीय सबसे बेहतर हैं। हालांकि जो भारतीय लंबे समय से बाहर रहे हैं, वो टीम वर्क के गुर भी सीख गए हैं।

'भारत तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था'

Why dominated by Indians in Silicon Valley?

विवेक वाधवा कहते हैं, "भारत के बच्चे माइक्रोसॉफ्ट और गूगल का सबसे ज्यादा इस्तेमाल करते हैं और वे इन कंपनियों के भारतीय सीईओ को भी देख रहे हैं। यह काफी प्रेरक है।"

वाधवा के मुताबिक भारतीय पेशेवरों को अब अपनी क्षमता दिखाने के लिए अमेरिका जाने की बाध्यता भी नहीं है क्योंकि भारत सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है।

वाधवा कहते हैं, "अगले तीन से पांच साल के बीच भारत में करीब 50 करोड़ की आबादी स्मार्टफोन का इस्तेमाल करने लगेगी। भारत में तकनीकी क्रांति आएगी और वहां कई अरबों डॉलर वाली कंपनियां विकसित होती दिखेंगी। अब अवसर भारत में ही मौजूद हैं।"

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