जब उसने बताया कि आखिर वो बीफ क्यों नहीं खाता
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
'गाय हमारी माता है, ग़फ़ूर उसको खाता है'। ये है वह नारा जो वर्ष 1975 में पूरे बिहार में गूँज रहा था। मेरे बड़े भाई के कानों में आज भी गूंजता है। इंदिरा गांधी और कांग्रेस के विरोध में देश के दूसरे राज्यों की तरह बिहार भी उठ खड़ा हुआ था। उस समय बिहार में कांग्रेस की सरकार थी और वहाँ के मुख्यमंत्री अब्दुल ग़फ़ूर थे।
मेरे बड़े भाई कॉलेज के छात्र थे और इस आंदोलन के साथ जुड़े हुए थे। लेकिन जब इस आंदोलन ने ज़ोर पकड़ा तो यह नारा सांप्रदायिक रंग में ढल गया। शायद अब्दुल ग़फ़ूर के मुसलमान होने के कारण!
'बीफ़ के कारोबार का धर्म से नहीं नाता'
मेरे भाई को लगा इस नारे में मुस्लिम विरोधी भावना छिपी है। वो आंदोलन में शामिल थे, लेकिन यह नारा नहीं लगाते थे। गोमांस को मुसलमानों से जोड़ना यह नारा या आंदोलन गाय के मांस खाने या गोहत्या पर पाबंदी के लिए नहीं था। लेकिन इससे एक बात साफ़ थी कि गाय का मांस खाने को मुस्लिम समुदाय से जोड़ा गया।
'क्या सरकार शाकाहारी ब्राह्मण हो गई है?'
अगर ग़फ़ूर शाकाहारी होते तो शायद तब भी यह नारा लगाया जाता। मुझे नहीं मालूम वह शाकाहारी थे या नहीं। लेकिन मेरे भाई और मेरा पूरा परिवार मांसाहारी था। गाय का मांस घरेलू मेन्यू में शामिल था। इस नारे ने काफ़ी मुसलमानों को नाराज़ किया था।
परिवार में गाय का मांस खाने वालों में मैं भी शामिल था। इसके मांस का बनाया हुआ कोयला कबाब हो या फिर निहारी- खाने से पहले इसकी खुशबू से मैं झूम उठता था।
बीफ़ कबाब की दावत
सालों बाद अपने भाई की तरह मैं भी कॉलेज का छात्र बना। एक बार बकरे वाली ईद के अवसर पर मेरी क्लास की दस छात्राओं ने 'बीफ़' कबाब की मांग की।
सभी छात्राएं हिन्दू थीं। मैं थोड़ा घबराया कि सांप्रदायिक दंगा न हो जाए। उन दिनों बिहार में हिन्दू-मुस्लिम झगड़े छोटी-छोटी बातों पर हो जाते थे। ज़ाहिर है उन लड़कियों ने अपने घरों में नहीं बताया। मैंने उन्हें घर आने की दावत दे डाली। जब उन्होंने मेरे घर आना शुरू किया तो घर के आँगन में कबाब सेके जा रहे थे।
'प्राचीन काल में हिन्दू गोमांस खाते थे'
इसकी सुगंध दूर-दूर तक फैल रही थी। जो मुझे खुशबू लग रही थी, मेरे मेहमानों को नागवार गुज़र रही थी। उन्होंने 'बीफ' कबाब बनते पहले कभी नहीं देखा था। इसका स्वाद तो लिया था लेकिन इसके तैयार होते समय की तेज़ महक को कभी झेला नहीं था।
उनके चेहरों पर पड़ने वाली शिकन से मुझे लगा महक इनके बर्दाश्त से बाहर हो रही है।
हैरानी की बात यह थी कि सभी ने जम कर खाया। लेकिन उससे भी हैरानी की बात यह थी कि मुझे पहली बार 'बीफ़' खाने में मज़ा नहीं आया। इसकी खुशबू भी बदबू में बदल गई। उन दिनों मेरे घर पर एक पालतू जर्सी गाय होती थी। एक हिन्दू ग्वाला उसकी सेवा करता था।
'मैं क्या खाऊं ये मैं तय करूंगा, सरकार नहीं'
मैंने जब अपने ग्वाले अपनी क्लास को दावत वाली बात बताई। उसने कहा कि लड़कियां बहक गई हैं, सच्ची हिंदू नहीं हैं क्योंकि उसके अनुसार हिंदुओं का बहुमत बीफ़ नहीं खाता, गाय को पवित्र मानता है।
सवालों ने मुझे बदल दिया
उसने मुझसे एक सवाल किया, क्या आप सुअर का मांस खाते हैं? मैंने कहा, नहीं, कभी नहीं। उसने पूछा क्या कोई आपको सुअर के गोश्त के कबाब खाने की दावत दे तो आप जाएंगे, मैंने कहा सवाल ही नहीं। उसने कहा आप अपने क्लास की लड़कियों पर मत जाइए बस समझिए कि आम हिन्दू आप की तरह है। आम हिन्दू बीफ़ नहीं खाता।
10 राज्यों में क़ानूनन होती है गो-हत्या
उसने फिर एक सवाल दाग़ा: क्या आप उनका सम्मान रखने के लिए बीफ़ खाना छोड़ नहीं सकते? वह ग्वाला अगले दिन से नौकरी पर फिर कभी नहीं लौटा, उसकी बातों ने मुझे हमेशा के लिए बदल दिया। उस दिन से आज तक मैंने कभी बीफ़ नहीं खाया।
मैं बीफ़ नहीं खाता और मैं इससे बहुत खुश हूँ। लेकिन मेरे बड़े भाई को वो नारा अब भी याद है। शायद अब वह उसी ज़िद में बीफ़ खाते हैं, जबकि मेरे परिवार के कई सदस्य अब बीफ़ नहीं खाते।