बेनियाबाग में रैली करने को बेकरार क्यों थी भाजपा?
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मनाहियों को मौकों में तब्दील कर देने के मामले में भाजपा दूसरे राजनीतिक दलों से बाजी मारती दिख रही है।
वाराणसी में बेनियाबाग में चुनावी जनसभा की इजाजत न मिलने के कारण भाजपा नेता और नरेंद्र मोदी समर्थक लंका स्थित महामना मदन मोहन मालवीय की प्रतिमा के समक्ष धरने पर बैठ गए।
गंगा के किनारे पर महज सात से आठ किमी के दायरे मे फैले इस शहर में बेनिया की रैली के बाद सियासत का तापमान कैसा रहता, ये अंदाज अब नहीं लगाया जा सकता। लेकिन भाजपा नेताओं के धरने ने शहर की सियासत को जरूर हंगामाखेज बना दिया।
चिलचिलाती धूप में अरुण जेटली, अनंत कुमार, आमित शाह और सैकड़ों कार्यकर्ताओं को धरने पर बैठे देख भाजपा के राणनीतिकारों को पूर्वांचल की दरकती जमीन एक बार फिर वापस मिलती लगी। हालांकि, विश्लेषकों के बीच जितनी मुंह, उतनी बातें जैसी स्थिति रही।
राजनीतिक लाभ के लिए चला धरने का दांव?
बुधवार को वाराणसी जिला प्रशासन ने बेनियाबाग में नरेंद्र मोदी की रैली रद्द करने के आदेश दिया, उसके बाद से ही भाजपा फैसले का राजनीतिक लाभ लेने की जुगत में जुट गई थी। नरेंद्र मोदी लगातार अरुण जेटली और अमित शाह के संपर्क में रहे।
विश्लेषकों ने फैसले के अपने-अपने राजनीतिक निहितार्थ निकाले। कइयों ने माना बेनिया में चुनावी सभा न होने से भाजपा को फायदा होगा। कुछ ने कहा मुस्लिम बहुल इलाके में मोदी की सभा को रोककर समाजवादी पार्टी मुसलमानों की संवेदना बटोरने में कामायाब होगी।
भाजपा ने काशी में मोदी के पांच कार्यक्रमों की अनुमति मांगी थी, जिसमें बेनिया और रोहनिया में चुनावी जनसभा भी शामिल थी। लेकिन प्रशासन ने बेनिया में सभा की इजाजत नहीं दी। फैसले से नाराज भाजपा ने रोहनिया की सभा छोड़ सभी कार्यक्रम रद्द कर दिया और धरने पर बैठ गई।
बेनिया में जनसभा का मकसद क्या था?
नई सड़क के व्यस्त बाजार से चंद कदमों की दूरी पर बेनिया मैदान किसी जमाने में फुटबॉलरों की नर्सरी था, लेकिन चुनावी रैलियों ने इसे सियासी बैरोमीटर में तब्दील कर दिया।
बेनिया के मैदान जो नेता जितनी भीड़ जुटा सका, पूर्वांचल की राजनीति उसका उतना ही दबदबा माना गया। ये मैदान इंदिरा गांधी और राजनारायण जैसे नेताओं की रैलियों का गवाह रहा।
लेकिन, 1991 के बाद लालकृष्ण आडवाणी और नीतिन गडकरी जैसे नेताओं की छिटपुट रैलियों को छोड़ भाजपा बेनिया मैदान से दूर ही रही।
1991 में बेनिया में चले थे ईंट-पत्थर
भाजपा ने 1991 में बेनिया मैदान में चुनावी रैली की थी, लेकिन रैली में ईंट पत्थर चलने के कारण पूरे शहर में अराजकता फैल गई थी।
दरअसल, 1991 में भाजपा उम्मीदवार श्रीशचंद्र दीक्षित ने चुनाव प्रचार के लिए शत्रुघ्न सिन्हा को को बुलाया था। शत्रुघ्न की चुनावी सभा बेनिया में ही होनी थी। सभा के लिए शत्रुघ्न का काफिला लहुराबीर होते हुए बेनिया पहुंचने वाला था।
प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, शत्रुघ्न के पहुंचने से पहले ही सभा में पत्थरबाजी शुरू हो गई थी। बताया जाता है कि बेनिया में गोलीबारी भी हुई थी, जिससे वहां अफरातफरी मच गई। देखते ही देखते ही पूरे शहर में अराजकता फैल गई।
प्रशासन के पास थी 1991 की रिपोर्ट
बुधवार को भाजपा ने बेनिया मैदान में नरेंद्र मोदी की जनसभा के लिए इजाजत मांगी, तब प्रशासन ने खुफिया विभाग द्वारा भेजी गई 1991 की सभा की रिपोर्ट को भी ध्यान रखा।
बेनियाबाग की सभा को सुरक्षा कारणों से खारिज कर दिया गया। हालांकि, भाजपा ने मनाही का राजनीतिक फायदा लेने का मौका नहीं छोड़ा।
9वें चरण के चुनाव में पूर्वांचल की शेष सीटों पर अपने को कमतर मान रहे भाजपा के रणनीतिकारों ने इस मौके का इस्तेमाल वोटों के ध्रुवीकरण के लिए करने की कोशिश की।
पूर्वांचल की सियासत में मोदी की लहर
लोकसभा चुनावों के लिए टिकट घोषणा के बाद से पूर्वांचल में मोदी की लहर नदारद मान रही भाजपा ने खुद को मजबूत करने के लिए कई पैंतरे चले। लेकिन विश्लेषकों की मानें तो ये सभी पैंतरे नाकाम ही रहे।
पूरे देश में मोदी कों केंद्र बनाकर प्रचार कर रही भाजपा ने हाल ही में पूर्वांचल में कमल निशान और पार्टी को केंद्र बनाकर प्रचार करना शुरू कर दिया।
पार्टी रणनीतिकारों का मानना है कि पूर्वांचल में भाजपा वाराणसी में ही कामयाब होती दिख रही है, जबकि गाजीपुर, जौनपुर, मछली शहर और चंदौली जैसी आसपास की सीटों पर लड़ाई से भी बाहर है।
वोटों को ध्रुवीकरण ही एकमात्र सहारा
1998 के चुनाव में भाजपा ने पूर्वांचल की 32 सीटों में से 24 सीटें जीती थीं। हालांकि पिछले चुनावों में पूर्वांचल की 32 सीटों में से 10 सपा, 10 बसपा, 8 कांग्रेस और 4 बीजेपी के पास है।
मोदी को वाराणसी से लड़ाने के पीछे पार्टी का मकसद पूर्वांचल में अपने पुराने रसूख को पाना भी है। लेकिन जातीय गणित फिलहाल पार्टी के पक्ष में नहीं दिखता।
ऐसे में पूर्वांचल में जीत का रास्ता हिंदु वोटों का ध्रुवीकरण कराके आसानी से तय किया जा सकता है। बेनिया मैदान में चुनावी रैली भाजपा का ये काम आसान कर सकती थी, जिसके रद्द होने के बाद पार्टी ने मुद्दे को गरम करने के लिए धरने पर बैठने की रणनीति बना ली।