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BJP को मुस्लिमों से क्यों हुई मोहब्बत?

Sat, 01 Mar 2014 12:46 PM IST
वेद विलास उनियाल/अमर उजाला, नई दिल्ली
वेद विलास उनियाल/अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Sat, 01 Mar 2014 12:46 PM IST
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why bjp trying to woo muslims

देश की राजधानी दिल्ली में भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने मुस्लिम मतदाताओं को लुभाने की पहल करते हुए कहा कि वे भले ही उनकी पार्टी को वोट न दें, लेकिन उनकी पार्टी से नफरत करना छोड़ दें।

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उन्होंने यहां तक कहा कि अगर अतीत में उनकी तरफ से कोई गलती हुई होगी, तो वह शीश झुकाकर माफी मांगने के लिए तैयार हैं। जाहिर है, भाजपा की कोशिश है कि मुसलमान मतदाताओं की उसके प्रति सोच बदले और वे किसी भी तरह उसके खिलाफ लामबंद न हों।
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हालांकि भाजपा की यह पहल कोई नई नहीं है।

मुंबई में मुस्लिम सम्मेलन

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दो दशक पहले भाजपा ने मुंबई में मुस्लिम सम्मेलन कराकर यह संकेत देने की कोशिश की थी कि पार्टी और उनके बीच एक संवाद स्थापित हो सकता है।

लेकिन आज भाजपा का संदेश मात्र सांकेतिक नहीं है, बल्कि वह बताना चाह रही है कि देश भर में भाजपा बड़े पैमाने पर मुस्लिमों को अपना उम्मीदवार बना रही है।

ताकि वह बता सके कि पार्टी मे मुस्लिमों को लेकर किसी तरह का दुराव नहीं है।

सांप्रदायिकता के बजाय विकास

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नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने के बाद भाजपा ने सबसे पहले यही कोशिश की कि चुनावी बहस धर्मनिरपेक्षता बनाम सांप्रदायिकता के बजाय विकास पर केंद्रित हो।

यह रणनीति तय की गई कि हिंदुत्व का प्रतीक बन चुके मोदी को हिंदुत्व का नया नारा गढ़ने के बजाय उन चीजों को संभालना है, जिनकी लय बिगड़ी हुई है।

मोदी बहुत चालाकी से सांप्रदायिकता से जुड़े सवालों से बचते रहे। वह बार-बार गुजरात के विकास की ही बात करते रहे। मोदी सबके विकास की बात को तूल देकर यही कहना चाह रहे थे कि सबका विकास होगा, तो मुस्लिमों का भी विकास होगा।

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क्या मोदी-राजनाथ पर मुस्लिम करेंगे यकीन?

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मुस्लिम मतदाता राजनाथ और मोदी की बातों पर कितना यकीन करेंगे, यह तो बाद में पता चलेगा, फिलहाल भाजपा के साथ बहुत सीमित मुस्लिम मतदाता उससे जुड़े हैं।

हो सकता है कि थोड़ी बढ़त हो जाए, लेकिन उनके रुख में अचानक कोई नाटकीय परिवर्तन आएगा, इसकी गुंजाइश बहुत कम है।

सवाल उठता है कि तब भाजपा की इस कवायद के पीछे क्या सोच है।

आखिर क्या चाहती है भाजपा?

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तीन बातें तो बिल्कुल साफ हैं। पहला, भाजपा किसी भी तरह मुस्लिम मतदाताओं को अपने खिलाफ लामबंद होने से रोकना चाह रही है।

दूसरा, वह नए मतदाताओं, जिनकी इस लोकसभा में महत्वपूर्ण भूमिका होगी, को यह बताना चाहती है कि उसका रवैया पहले की तरह कट्टर हिंदुत्व वाला नहीं है।

और तीसरा, मुस्लिमों के प्रति अपने रुख में बदलाव की रणनीति के जरिये वह कांग्रेस या दूसरे विरोधी दलों की आक्रामकता को कुंद करना चाह रही है।

मोदी के बाद भाजपा की 'मुस्लिम' रणनीति

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भाजपा ने शायद मान लिया है कि मौजूदा परिस्थिति में मुस्लिमों के करीब जाने की कोशिश करने से उसके पारंपरिक मतदाता नाराज नहीं होंगे।

खासकर नरेंद्र मोदी के हाथ में पहल आने के बाद फिलहाल हिंदुत्व की अवधारणा पर वोट करने वाले मतदाताओं के बिदकने का सवाल नहीं होता।

आरएसएस भी मौके की नजाकत को देखते हुए ऐसे सवाल उठाने से बचेगी। राजस्थान विधानसभा के चुनाव नतीजों का हवाला देते हुए बार-बार कहा जा रहा है कि वहां से भाजपा के टिकट पर मुस्लिम जनप्रतिनिधि जीत कर आए हैं।

भाजपा और दिखाएगी मुस्लिम प्रेम

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पहले से ही भाजपा ने शहनवाज हुसैन को प्रवक्ता बनाकर प्रस्तुत किया है। हालांकि भाजपा मुस्लिमों को यह नहीं समझा पाई कि उसकी खोज केवल शहनवाज तक ही क्यों रुक गई। पार्टी ऐसे और नेता क्यों नहीं तलाश पाई। आरिफ मोहम्मद खान जैसे नेताओं को यह अपने शामियाने में क्यों नहीं ला पाई?

अब भाजपा की रणनीति यही है कि पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा, केरल  पूर्वोत्तर भारत में कई जगहों पर मुस्लिमों को प्रत्याशी बनाया जाए। कोई अचरज नहीं कि भाजपा करीब सत्तर सीटों पर ऐसे मुस्लिम प्रत्याशी खड़ी करे। उसके पास वहां खोने के लिए ज्यादा नहीं है।

संकेत यह भी हैं कि पार्टी उन राज्यों में अपने मुस्लिम सम्मेलन करेगी, जहां तीसरा फ्रंट का उदय हुआ है। बहरहाल भाजपा के मुस्लिम प्रेम के कई नजारे आने वाले दिनों में दिखेंगे। यह भी दिख सकता है कि किसी सभा में अजान की आवाज सुनकर मोदी कुछ देर के लिए अपने भाषण को रोक दें।

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