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आडवाणी को ग़ुस्सा क्यों आता है?

Fri, 21 Mar 2014 04:05 PM IST
जुबैर अहमद/बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
जुबैर अहमद/बीबीसी संवाददाता, दिल्ली Updated Fri, 21 Mar 2014 04:05 PM IST
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Why advani gets angry

आम चुनाव के निकट आते ही भारतीय जनता पार्टी एक बार फिर संकट में नज़र आ रही है। इस बार भी इसका कारण पार्टी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी समझे जा रहे हैं। किसी न किसी बात पर आडवाणी की नाराज़गी शायद पार्टी के लिए आए दिन नई मुश्किलें पैदा कर रही हैं।

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आडवाणी ने कथित तौर पर पार्टी के उस फ़ैसले को मानने से इनकार कर दिया था जिसमें उन्हें गांधीनगर से चुनाव लड़ने को कहा गया था, जहाँ से वो 1991 से चुनाव जीतते आ रहे हैं। भाजपा ने उनके नाम का एलान भी कर दिया था, लेकिन ख़बरों के अनुसार वे भोपाल से चुनाव लड़ने पर अड़े हुए थे।
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आडवाणी का तर्क था कि अगर मोदी और पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह अपनी पसंद की सीटों से चुनाव लड़ रहे हैं, तो वो अपनी पसंद के चुनावी क्षेत्र से चुनाव क्यों नहीं लड़ सकते?
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चेले ने भंग किया आडवाणी का स्वप्न

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भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी समेत पार्टी के कई बड़े नेता उन्हें मनाने के लिए उनके घर गए और बहुत देर के बाद आख़िरकार उन्होंने गांधीनगर से चुनाव लड़ने पर अपनी सहमति जताई। लेकिन आडवाणी ने ऐसा पहली बार नहीं किया है। इससे पहले भी वो कई बार अपनी नाराज़गी का इज़हार कर चुके हैं।

पिछले साल जब पार्टी ने नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद के लिए उम्मीदवार चुना तो उस समय आडवाणी को काफ़ी ग़ुस्सा आया। यहाँ तक कि उन्होंने पार्टी के सभी पदों से इस्तीफ़ा दे दिया।

मोदी एक समय आडवाणी के चेले थे और शायद आडवाणी को यह बात पची नहीं कि उनका चेला अब प्रधानमंत्री पद का दावेदार है। उनके क़रीबी लोगों को यह मालूम है कि प्रधानमंत्री पद पर बैठना आडवाणी की आख़िरी सियासी ख्वाहिश है।

पस्त आडवाणी, मस्त मोदी

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मोदी के मुद्दे पर आडवाणी पार्टी में अकेले पड़ गए। आख़िर उन्होंने कई दिनों तक नाराज़ रहने के बाद पार्टी के फ़ैसले को स्वीकार कर लिया और हाल के दिनों में मोदी की तारीफ़ करते भी सुने गए।

यूँ तो आडवाणी ने मोदी का हमेशा साथ दिया है और मोदी की पदोन्नति में उनका बड़ा हाथ रहा है, लेकिन 2005 में जब वो अपनी पाकिस्तान यात्रा के दौरान जिन्ना विवाद में घिरे तो उस समय मोदी ने उनका साथ नहीं दिया, जिसके कारण आडवाणी उनसे नाराज़ भी हुए थे।

आडवाणी साल 2009 के चुनाव के समय से मोदी से दूरी बनाने की कोशिश करने लगे। इसके दो साल बाद वो अपनी भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम को गुजरात से शुरू करने वाले थे, लेकिन उन्होंने इसका उद्घाटन बिहार से किया।

इसलिए छोड़ रहे हैं गांधीनगर सीट

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आडवाणी गांधीनगर से एक बार फिर चुनाव क्यों नहीं लड़ना चाहते? हालांकि, पिछले 16 सालों से वह इस सीट से चुने जा रहे हैं और इस बार भी वह मज़बूत उम्मीदवार होंगे। आडवाणी ख़ेमे से ख़बर यह है कि उन्हें इस बात का संदेह है कि मोदी के लोगों का उन्हें समर्थन नहीं मिलेगा। वह इसीलिए चुनाव भोपाल से लड़ने के मूड में हैं, जहाँ मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान उनके एक क़रीबी सहयोगी माने जाते हैं।

लेकिन मोदी इस बात पर अड़े हैं कि आडवाणी को चुनाव गांधीनगर से ही लड़ना चाहिए और उन्होंने आश्वासन दिया है कि उनका इसमें पूरा सहयोग रहेगा। मोदी के लिए ये एक प्रतिष्ठा का मामला बन गया है। आडवाणी नाराज़ हैं। उसी तरह से जैसे मुरली मनोहर जोशी नाराज़ थे, जब उनकी सीट वाराणसी से मोदी को प्रत्याशी बनाने का एलान कर दिया गया।

कहा जा रहा है कि राजनाथ और मोदी ने मिलकर पार्टी के पुराने नेताओं को किनारे कर दिया है। आडवाणी इस समय ख़ुद को तनहा महसूस कर रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद उन्हें आशा है कि वह चुनाव के बाद उभरने वाली स्थिति में प्रधानमंत्री पद के दावेदार बन सकते हैं। उनकी मौजूदा नाराज़गी शायद उनकी आख़िरी नाराज़गी न हो।

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