बजट: घाटे के सौदे में पैसा कौन लगाएगा?
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रेल मंत्री सदानंद गौड़ा रेल बजट में कुछ नई बातें नहीं कह पाए हैं। ज्यादातर बातें लोक लुभावनी हैं, लेकिन इन्हें असल पटरी पर उतारना काफी चुनौती भरा काम है।
उनका अंदाज यही है कि मानो दुनिया हमारी रेलवे पर पैसा लगाने के लिए तैयार बैठी है, पर वो समझा नहीं पा रहे हैं कि घाटे के सौदे में कौन हमसे व्यापार करने आएगा। कुछ आ भी गए तो इसकी गाड़ी कितनी आगे सरकेगी।
नरेंद्र मोदी के सत्ता संभालने के बाद रेल ढांचे में बदलाव के कयास लगाए जा रहे थे। खासकर जिस तरह की आशा दिलाई गई थी, उसमें यही लग रही था कि रेलवे के सुधार के लिए कई कदम उठाए जाएंगे, लेकिन सब सामान्य ही लगा।
जिस तरह का बजट आया है, उससे यही प्रतीत होता है कि सरकार हाई स्पीड ट्रेन और बुलेट ट्रेन आदि को लेकर बहुत संजीदा है। लगभग 100 करोड़ की योजना पर काम होगा।
इसे सरकार की महत्वाकांक्षी योजना के रूप में देखा जा सकता है। 27 नई ट्रेनें भी शुरू करने की बात की गई है। मगर नई सरकार से तो यह उम्मीद थी कि सरकार नई ट्रेनों के बजाय जो ट्रेनें पटरी पर दौड़ रही हैं, पहले उनके रखरखाव और सुरक्षा आदि पर ध्यान देगी।
रेलवे के संचालन के लिए ठोस काम की जरूरत
यह ज्यादा अच्छा होता कि रेलवे का जो ढांचा हमारे पास है, उसमें अपेक्षित सुधार किया जाता। ट्रेन यात्रा असुरक्षित है और ट्रेनों की गति भी बहुत कम है। निर्धारित समय में ट्रेनें स्टेशनों पर नहीं पहुंच पाती हैं।
दरअसल रेलवे के संचालन के लिए ठोस काम किए जाने की जरूरत है। इस मायने में अगर सरकार कुछ नई ट्रेन चलाने में असमर्थता जताती तो इसे नजरअंदाज किया जा सकता था।
कहीं आलोचना होती भी, तो उसका महत्व नहीं रहता। आखिर सवाल रेल व्यवस्था को बेहतर बनाने का है। माल गाड़ी से आय बढ़ाने की योजनाओं को लेकर पर्याप्त फोकस नहीं हुआ।
बजट के जरिए रेलवे यूनिवर्सिटी, कॉरिडोर, फूड कोर्ट, ऑटोमैटिक दरवाजे और रेलवे स्टेशनों को आधुनिक बनाने आदि की वही बातें दोहराई गई हैं, जिन्हें पिछली सरकार भी कहती रही है।
दुनिया में हर जगह घाटे में चल रही हैं बुलेट ट्रेन
सरकार कह रही है कि रेलवे को सुधारने और उन्नत बनाने के लिए पीपीपी यानी पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप के जरिए पैसा जुटाया जाएगा। मगर सवाल यही है कि रेलवे में पैसा कौन लगाएगा।
एक बात साफ है कि दुनिया में जहां भी बुलेट ट्रेन चल रही हैं, वो घाटे में चल रही हैं। फिर भारत में यह फायदे का सौदा कैसे हो सकता है। भारत में 70 हजार करोड़ की इस योजना में हम कितना ब्याज दे रहे होंगे, यह समझा जा सकता है।
आखिर चीन ने 500 अरब डॉलर खर्च करके अपनी इस महत्वाकांक्षी योजना को चलाया था। लेकिन वह घाटे में ही चल रही है। सफाई के लिए आउटसोर्स हो, आधुनिक रेलवे स्टेशन हों या फिर बुलेट ट्रेन, जहां भी हम पैसा जुटाना चाहेंगे, पैसा उपलब्ध कराने वाला अपना आर्थिक हित जरूर देखेगा, इसलिए एक साथ बहुत बड़े स्तर पर पैसा उपलब्ध होगा, यह संभव नहीं लगता।
अगर ऐसा होगा भी तो हमारे सामने बहुत चुनौतियां होंगी। पूर्व रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव ने भी कहा था कि वह रेलवे के लिए ढाई लाख करोड़ रुपये जुटाएंगे। मगर एक हजार करोड़ रुपये भी नहीं आया।
बगैर मुनाफा दिखाए हम पैसा नहीं जुटा सकते। अच्छी बात है कि सरकार रेलवे में साफ सफाई को लेकर बहुत संजीदगी दिखा रही है। रेल को संचार साधनों से विकसित करने की दिशा में भी आश्वासन दिया जा रहा है। यह बदलाव का सूचक है। देखना होगा कि किस तरह काम होता है।