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कौन है नरेंद्र मोदी की कामयाबी के पीछे?
अमर उजाला दिल्ली
Updated Tue, 08 Oct 2013 07:33 PM IST
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वह गुजरात में हो या किसी दूसरे राज्य में, जब कभी 'मित्रों' के साथ अपने भाषण की शुरुआत करते हैं, तो उम्मीदें आसमान छूने लगती हैं।
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भाजपा के प्रधानमंत्री पद के दावेदार नरेंद्र मोदी को भी इस बात का इल्म है कि उनके भाषण का श्रोताओं और दर्शकों पर क्या असर होता है।
इसे सियासी बिसात की चाल कह लीजिए या फिर लोगों से जुड़ने की वास्तविक जरूरत, मोदी इसके लिए जोरदार तैयारियां करते हैं।
एचटी की खबर के मुताबिक सीएमओ के एक वरिष्ठ अधिकारी ने पहचान जाहिर न करने की शर्त पर बताया, "उनके पास अपने भाषण को श्रोताओं के मुताबिक ढालने की अद्भुत क्षमता है।"
विशेषज्ञों की टीम करती है काम
अब सवाल उठता है कि वह ऐसा कैसे होता है? दरअसल, उनके पास विशेषज्ञों की एक टीम है, जो उन्हें स्थानीय स्तर पर इनपुट मुहैया कराती है। इसके अलावा वह रैली में अपनी बात रखने से पहले ग्रुप डिस्कशन में लोगों की बात सुनते हैं।
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मसलन, 2 अक्टूबर को दिया गया उनका 'पहले शौचालय फिर देवालय' वाला बयान तुरंत छात्रों के बीच पसंद किया गया। लेकिन इससे पहले क्या-क्या हुआ, यह जानना दिलचस्प है।
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मोदी ने छात्रों के साथ आठ घंटे गुजारे, उन्हें सुना और उनसे बातचीत की। नौजवानों के विचार जाने और समाधान सुने।
उनके चुनाव अभियान से जुड़े एक शीर्ष सहयोगी ने बताया कि मोदी हर जगह अलग तरह का शॉट लगाते हैं। उन्होंने कहा, "वह सभी मतदाताओं को एक जैसा नहीं मानते। वह सिर्फ एक मुद्दे को लेकर बंधे नहीं हैं।"
पिछले गुजरात चुनावों के दौरान मोदी स्थानीय मुद्दों को जानने के लिए अलग-अलग कोने में गए। इसे बाद उनके सहयोगी वापस उन्हीं जगह गए और अलग-अलग समस्याओं के समाधान से जुड़ी प्रतिक्रिया लेकर लौटे। बाद में इन्हीं समाधानों को घोषणा पत्र में शामिल किया गया।
हैदराबाद में रैली आयोजित करते हुए उन्होंने तेलंगाना के लिबरेशन डे का जिक्र किया, जब 17 सितंबर, 1948 को निजाम का शासन खत्म हुआ था। उन्होंने कहा, "खुशकिस्मती से मैं भी इसी रोज पैदा हुआ था।"
कोलकाता में उन्होंने कारोबारियों के बीच कहा, "अगर आपको गेंद फेंकनी है, तो कुछ कदम पीछे जाना होगा।"