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महाकुंभ में हुई इन मौतों का जिम्मेवार कौन?

इलाहाबाद/इंटरनेट डेस्क Updated Mon, 11 Feb 2013 12:13 PM IST
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Who is responsible for the death in Kumbh

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महाकुंभ को लेकर लगातार अपनी पीठ थपथपा रही यूपी सरकार के इंतजाम मौनी अमावस्या के दिन बुरी तरह नाकाम रहे। जबकि वहां तीन करोड़ की भीड़ आने का अनुमान पहले से ही लगाया गया था, बावजूद इस भीड़ को संभालने के इंतजाम क्यों नहीं हुए? इसका जवाब किसी के पास नहीं है।
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रेलवे ने दूर-दराज से आई तीन करोड़ की भीड़ को वापस भेजने के लिए न तो पर्याप्त ट्रेनें चलाई गई थी, और न ही यात्रियों के ठहरने के समुचित इंतजाम किए थे। ऐसे में रविवार शाम को हुई घटना को महज हादसा कत्तई नहीं माना जा सकता।


दरअसल, यह घटना कई स्तरों पर हुई लापरवाही का नतीजा है। कुंभ मेले की कामयाबी का गुणगान कर रही यूपी सरकार ने मेला क्षेत्र से बाहर के इंतजामों से मानो आंख ही फेर ली थी। करोड़ों लोगों के लिए संगम पर स्नान की व्यवस्था तो की गई, लेकिन इस पर ध्यान नहीं दिया गया कि जब इतने सारे लोग शहर से बाहर जाने के लिए स्टेशन का रुख करेंगे तो क्या होगा?

मेला क्षेत्र से बाहर निकलने वाले लोगों को रेलवे स्टेशन या बस स्टेशन तक पहुंचने का कोई पुख्ता इंतजाम ही नहीं किया गया। लोगों को भगवान भरोसे छोड़ दिया गया। मेला प्रशासन की जिम्मेदारी सिर्फ कुंभ मेले तक ही दिखाई दी।

यही हाल रेलवे प्रशासन का भी था। रेलवे ने न तो जंक्शन और अन्य स्टेशनों पर आने वाली भारी भीड़ को नियंत्रित करने की कोई रणनीति बनाई थी और न ही यात्रियों को सुरक्षित गंतव्य तक पहुंचाने के लिए पर्याप्त मात्रा में अतिरिक्त ट्रेनों का ही संचालन तय किया था।

इलाहाबाद प्रशासन, पुलिस और रेलवे अधिकारियों की संवेदनहीनता को मानवता कभी माफ नहीं कर सकेगी। इनकी लापरवाही के कारण 41 लोगों की जानें गईं। अव्यवस्था का शिकार रेलवे जंक्शन उन पुलिसवालों के हवाले था जो श्रद्धावान जनों से लाठी से बात कर रहे थे। यही नहीं, जब हादसा हो गया तब रेलवे के जिन अधिकारियों पर जिम्मेदारी थी वे मौके से भाग गए।

जख्मी महिलाएं प्लेटफार्म पर पड़ी तड़पती रहीं और तीन घंटे तक मदद नहीं पहुंची। छह लोग एक-एक कर प्लेटफार्म पर तड़प-तड़प कर मर गए। अगर उन्हें समय से उपचार मिल जाता तो वे बच सकते थे। महिलाएं और बच्चे चीखते रहे, लेकिन रेलवे प्रशासन जैसे वहां था ही नहीं। जिन घायलों के साथ और लोग थे वे खुद उन्हें उठाकर अस्पताल भागे, लेकिन जो जख्मी अपने घरवालों से अलग हुए वे प्लेटफॉर्म पर ही तड़प कर मर गए।

तीन घंटे तक रेलवे डीआरएम समेत कोई भी जिम्मेदार अधिकारी मौके पर नहीं पहुंचा। जो दरोगा, सिपाही और टीटी थे वह डर की वजह से निकल गए। जब यात्रियों ने हंगामा शुरू किया तो रेलवे और पुलिस अधिकारी वहां से खिसक गए। साढ़े छह बजे हुए हादसे के बाद रात साढ़े नौ बजे लाशों को उठाने का इंतजाम हुआ।

हादसे के बाद मेले की जिम्मेदारी संभाल रहे अखिलेश सरकार के मंत्री आजम खान को ये मामूली घटना दिखी। आजम खां ने इस हादसे के लिए केंद्र सरकार को जिम्मेवार ठहराते हुए कहा कि स्टेशन की कमजोर व्यवस्थाओं के लिए रेलवे दोषी है। वहीं, सीएम अखिलेश यादव इसकी ज़िम्मेदारी केंद्र सरकार के पाले में उछालकर सैफई में एक शादी समारोह में व्यस्त रहे।

प्रशासन के लोग भी एक दुसरे पर उंगली उठाकर यही खेल खेलते रहे, अब तो जांच रिपोर्ट ही बताएगी की सच क्या है? इस भयानक घटना की नैतिक जिम्मेदारी कोई नहीं ले रहा है। रेल मंत्रालय से लेकर यूपी सरकार तक सभी एक-दूसरे पर दोषारोपण में जुटे हैं।

सवाल ये है कि आखिर ये लापरवाही किसके स्तर पर हुई और उन 41 लोगों की मौत का जिम्मेवार कौन है?

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