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यूपी: जान लीजिए, कौन होगा भाजपा का अगला अध्यक्ष?

Thu, 04 Jun 2015 03:00 PM IST
Updated Thu, 04 Jun 2015 03:00 PM IST
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who can become bjp president in up

यूपी के प्रदेश भाजपा अध्यक्ष डा. लक्ष्मीकांत वाजपेयी का अगस्त में कार्यकाल पूरा हो रहा है। पार्टी को नए अध्यक्ष की तलाश है। अध्यक्ष पद के लिए वैसे तो कई नेता दावा ठोक रहे हैं मगर पार्टी के रणनीतिकार चाहते हैं कि अबकी संगठन की बागडोर पिछड़े या अनुसूचित जाति वर्ग के नेता को सौंपी जाय ताकि 2017 में होने वाले प्रदेश विधानसभा चुनाव में सामाजिक समीकरण साधने मे सहूलियत हो।

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भाजपा एक तीर से दो निशाना साधना चाहती है। संगठन की कमान गैर ब्राह्मण को सौंपकर सीएम कैंडिडेट के चयन को आसान बनाना चाहती है। यानी तय है कि भगवा ब्रिगेड 2017 के चुनाव में किसी ब्राह्मण चेहरे को ही भावी सीएम के रूप में प्रोजेक्ट करेगी।
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पार्टी सूत्रों के मुताबिक नए प्रदेश अध्यक्ष की होड़ में स्वतंत्र देव सिंह का नाम सबसे ऊपर चल रहा है। संगठन में उनकी पकड़ अच्छी है। वे अनुसूचित जाति से आते हैं। अपनी जाति में भी उनकी अच्छी साख है। संगठन में लंबे समय तक काम करने का अनुभव भी उनकी दावेदारी को मजबूत करता है।

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ये नेता हैं यूपी के सीएम की दौड़ में

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वहीं सांसद केशव प्रसाद मौर्या प्रदेश अध्यक्ष की दौड़ में शामिल बताए जा रहे हैं। काशी क्षेत्र के अध्यक्ष लक्ष्मण आचार्य भी प्रदेश अध्यक्ष की दौड़ में शामिल बताए जा रहे हैं। प्रधानमंत्री मोदी के संसदीय चुनाव के कुशल प्रबंधन के बाद से संगठन में उनके प्रमोशन की चर्चा लगातार चल रही है।

उधर, सीएम कैंडिडेट के रूप में सोशल मीडिया पर एक दर्जन से अधिक नेताओं के नाम चल रहे हैं। हालांकि पार्टी किसी ब्राह्मण चेहरे को ही आगे करना चाहती है। पार्टी का एक बड़ा वर्ग लखनऊ के महापौर दिनेश शर्मा की पैरवी कर रहा है।

वहीं मोदी सरकार में पर्यटन और संस्कृति मंत्रालय संभाल रहे डॉ. महेश शर्मा का नाम भी चर्चा में है। मौजूदा प्रदेश अध्यक्ष डा. वाजपेयी भी बहुतों की पसंद हैं। इनके अलावा सोशल मीडिया में सीएम कैंडिडेट की दौड़ में मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी, वरुण गांधी, योगी आदित्यनाथ समेत दर्जन भर से अधिक नेताओं का नाम चल रहा है।

पार्टी में संगठन मंत्री के बढ़ते प्रभाव से कई वरिष्ठ नेता खुद को असहज महसूस करने लगे हैं। सांगठनिक कामकाज में हस्तक्षेप बढ़ने और बेवजह की दखलंदाजी से कई नेता नाराज हैं मगर सार्वजनिक मंचों पर अपनी नाराजगी जाहिर करने से बच रहे हैं। आरएसएस से भाजपा में आए लोग ही संगठन मंत्री बनाए गए हैं। ऐसे में संगठन मंत्री के खिलाफ मोर्चा खोलना एक तरह से संघ के खिलाफ मोर्चा खोलना होगा। यही सोचकर कई बार नेता चुप्पी साध जाते हैं।

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