गांधी परिवार से क्यों नफरत करती हैं मेनका?
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जनता पार्टी सरकार की असफलता के बाद 1980 में हुए लोकसभा के मध्यावधि चुनावों में इंदिरा गांधी की अगुआई में कांग्रेस की फिर सत्ता में वापसी हुई।
रायबरेली से इंदिरा गांधी ने 1977 में अपनी हार का बदला लेकर अपनी जीत दर्ज कराई और अमेठी से संजय गांधी अच्छे मतों से जीतकर पहली बार संसद में पहुंचे। लेकिन कुछ महीनों के बाद ही विमान दुर्घटना में हुई संजय गांधी की अचानक मौत ने इंदिरा गांधी और कांग्रेस के सामने नया संकट खड़ा कर दिया।
शोक की इस घड़ी में इंदिरा ने अपने बड़े बेटे राजीव गांधी को राजनीति में उतारने का फैसला करके अमेठी के उप चुनाव में उन्हें वहां से कांग्रेस का उम्मीदवार बना दिया।
राजीव को लड़ाने का फैसला मेनका को नहीं आया रास
इस उपचुनाव में विपक्ष ने लोकदल के युवा नेता शरद यादव को उम्मीदवार बनाया, लेकिन राजीव यह चुनाव जीत गए। इंदिरा गांधी के इस फैसले ने परिवार में फूट पैदा कर दी।
क्योंकि संजय की पत्नी मेनका गांधी की खुद की इच्छा राजनीति में आकर अपने पति की विरासत संभालने की थी और इस मुद्दे पर उनका अपनी सास इंदिरा गांधी के साथ झगड़ा आम हो गया था।
नौबत यहां तक पहुंची कि कुछ समय बाद मेनका अपनी सास का घर छोड़कर अपने नन्हें बेटे को लेकर अपनी मां के घर रहने चली गईं और उन्होंने अपना संजय विचार मंच के नाम से अपना नया राजनीतिक दल बना लिया। संजय के कुछ वफादारों जिनमें अकबर अहमद डंपी प्रमुख थे, कांग्रेस छोड़कर मेनका के साथ चले गए।
इंदिरा की मौत, मेनका ने दी राजीव को चुनौती
31 अक्टूबर 1984 को अपने अंगरक्षक की गोलियों का शिकार होकर इंदिरा गांधी की मौत हो गई। तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह ने राजीव को प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलाई। इसके बाद लोकसभा चुनावों की घोषणा हो गई।
राजीव फिर अमेठी से लोकसभा चुनाव लडऩे के लिए गए तो मेनका ने राजीव के मुकाबले संजय विचार मंच के उम्मीदवार के रूप में परचा भर दिया। राजीव राजनीति में बहुत पुराने नहीं थे। मां की हत्या के हादसे ने अचानक उन्हें प्रधानमंत्री बना दिया।
इसके पहले वह इंडियन एअर लाइंस में पायलट थे। हालांकि एक बार वह अमेठी से चुनाव जीत चुके थे, लेकिन तब मां इंदिरा का हाथ और साया उनके सिर पर था।
अब बिना इंदिरा गांधी के उन्हें न सिर्फ अपना चुनावी सफर तय करना था, बल्कि पूरी कांग्रेस पार्टी को भी सत्ता में वापस लाने की चुनौती थी।
अमेठी सीट पर आमने सामने थे राजीव और मेनका
राजीव के लिए न सिर्फ राजनीति के ऊबड़ खाबड़ रास्तों पर अकेले थे, बल्कि देश का प्रथम परिवार माने जाने वाले नेहरू गांधी परिवार का ही दूसरा वारिस यानी उनके छोटे भाई संजय की पत्नी इस चुनाव में उनके मुकाबले मैदान में थी।
संजय का वफादार कांग्रेस पार्टी का एक गुट भी मेनका के साथ चला गया था। लेकिन अमेठी राजपरिवार के राजकुमार संजय सिंह राजीव गांधी के चुनाव का प्रबंधन भी उसी तरह देख रहे थे, जैसे वह संजय गांधी के चुनाव का देखा करते थे।
राजीव के सामने न सिर्फ चुनाव जीतने की चुनौती थी बल्कि एक बड़ा भावानात्मक द्वंद्व भी था। सिर्फ कुछ वर्ष पहले इसी अमेठी में संजय और मेनका के साथ इंदिरा गांधी कांग्रेस के प्रचार के लिए आती थीं और अब उसी सीट पर राजीव और मेनका आमने सामने थे।
संजय के नाम पर वोट मांग रही थी मेनका गांधी
इस चुनावी लड़ाई में बाकी उम्मीदवार गौण हो गए और मुकाबला नेहरू गांधी परिवार के दोनों वारिसों के बीच हो गया।
मेनका अपनी सूनी मांग का हवाला देकर अमेठी की जनता से अपने दिवंगत पति संजय गांधी के नाम पर वोट मांग रही थीं, जबकि राजीव अपनी मां इंदिरा गांधी के अधूरे कामों को पूरा करने और कांग्रेस की नीतियों के नाम पर जनता के बीच थे।
एक तरफ पूरी कांग्रेस पार्टी, इंदिरा गांधी की हत्या से पैदा हुआ माहौल, केंद्र व प्रदेश की सत्ता थी तो दूसरी तरफ संजय की अकस्मात मौत का हवाला देकर उसे अपने लिए सहानूभूति लहर में तब्दील करके राजनीति की सीढिय़ां चढऩे को बेताब मेनका गांधी और संजय के वफादारों की युवा टीम थी। कोई नहीं कह सकता था कि मुकाबले में कौन बाजी मारेगा?
बड़े मेनका को आशीर्वाद देते] महिलाएं पुचकार
अमेठी उन दिनों उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले की एक तहसील थी। लखनऊ से करीब सौ किलोमीटर दूर एक बेहद पिछड़ा इलाका जो संजय गांधी के यहां से चुनाव लडऩे की वजह से विकास के सपने देखने लगा था, क्योंकि बगल की रायबरेली सीट से फिरोज गांधी के जमाने से नेहरू गांधी परिवार का कब्जा था और इंदिरा गांधी के यहां से चुने जाने के बाद इस इलाके में विकास की गंगा बहने लगी थी।
ऐसे में जब गांव गांव घूमकर सफेद साड़ी पहने अपनी सूनी मांग लिए नन्हे वरुण को गोद में लेकर मेनका लोगों केबीच जातीं तो बड़े बूढ़े, पुरुष महिलाएं सबकी आंखें नम हो जाती थीं।
बड़े मेनका को आशीर्वाद देते थे और महिलाएं उन्हें पुचकार कर, सिर पर हाथ फेरकर दुख साझा करती थीं।
राजीव के साथ पत्नी सोनिया भी हर जगह जातीं
राजीव के लिए काम करने वाले कांग्रेसी कार्यकर्ता भी मेनका के सामने आते ही असमंजस में पड़ जाते थे और अपने दिवंगत युवा नेता की पत्नी का विरोध करने का साहस नहीं जुटा पाते थे। लग रहा था कि सहानुभूति लहर मेनका की सियासी नाव को पार लगा देगी।
उधर राजीव भी गांव गांव घूम रहे थे। उनके साथ पत्नी सोनिया भी हर जगह जाती थीं। इलाके के लोगों में इंदिरा गांधी के बड़े बेटे और बहू के प्रति बेहद प्यार था। इसलिए जहां ये जाते थे भीड़ उमड़ी आती थी। राजीव अपने भाषण में संजय या मेनका का कोई जिक्र नहीं करते थे।
सिर्फ इंदिरा गांधी की हत्या के बाद उनके अधूरे कामों को पूरा करने के लिए जनादेश मांगते थे। जबकि मेनका के भाषण में इंदिरा गांधी परिवार द्वारा उनके साथ की गई नाइंसाफी का जिक्र होने के साथ अमेठी की जनता से इंसाफ देने की अपील होती थी।
लोगों की सोनिया के प्रति बेहद उत्सुकता थी
हालांकि सोनिया पहले भी इस इलाके में आ चुकी थीं, लेकिन लोगों की सोनिया के प्रति बेहद उत्सुकता थी। लोग उनके करीब जाते थे।
उनके लिए सोनिया का यूरोपीय मूल भी एक कौतूहल का विषय होता था। आम तौर पर कम बोलने वाली सोनिया लोगों के साथ घुलने मिलने की कोशिश करती थीं।
तब उन्हें इतनी अच्छी हिंदी नहीं आती थी जैसी अब आती है। लेकिन फिर भी वह कुछ हिंदी वाक्यों के जरिए लोगों के दिलों में अपनी जगह बनाने लगी थीं। इस सियासी घमासान और पारिवारिक उहापोह के बीच अमेठी का यह चुनाव हुआ और भारी तादाद में मतदान हुआ।
राजीव गांधी तीन लाख से भी ज्यादा वोटों से जीत गए
दोनों ओर से अपनी अपनी जीत के दावे और उम्मीदें थीं। जब मतपेटियां खुलीं और गिनती हुई तो राजीव गांधी तीन लाख से भी ज्यादा वोटों से यह चुनाव जीत गए और इसके साथ ही अमेठी से संजय गांधी परिवार का नाता टूट गया।
इसके बाद मेनका गांधी ने फिर अमेठी का रुख नहीं किया और वह तराई इलाके के पीलीभीत लोकसभा क्षेत्र से चुनाव लड़कर संसद में पहुंचने लगीं। इस बार उनके बेटे वरुण गांधी अमेठी की बगल की सीट सुल्तानपुर से भाजपा के टिकट पर मैदान में हैं जिनका मुकाबला कांग्रेस उम्मीदवार और अमेठी के राजा संजय सिंह की पत्नी अमिता सिंह से है।
वरुण पिछली बार पीलीभीत से लोकसभा चुनाव जीते थे। लेकिन इस बार उन्होंने सुल्तानपुर को चुना है।