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पेट्रोल-डीजल के मामले में भारत बन पाएगा आत्मनिर्भर?

Fri, 27 Feb 2015 07:00 PM IST
Updated Fri, 27 Feb 2015 07:00 PM IST
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when india will stop import of oil?

भारत में इस्तेमाल होने वाले पेट्रोलियम उत्पाद और प्राकृतिक गैस का तक़रीबन 80 फ़ीसदी हिस्सा आयात किया जाता है। यह चीजें खा़ड़ी के देशों से मंगाई जाती हैं जो फ़िलहाल सबसे अशांत इलाक़ा माना जाता है। क्या आयात पर इस निर्भरता को कम करने का कोई उपाय है? सबसे स्वाभाविक उपाय है, जहां तक संभव हो घरेलू उत्पादन को बढ़ाना।

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पढ़ें विस्तार से
भारत में तेल और गैस संसाधन अगर ज़्यादा नहीं हैं तो दुर्लभ भी नहीं। तेल और प्राकृतिक गैस की संभावनाओं के नज़रिए से भारतीय भूगर्भ कठिन और जोख़िम भरा है, पर सही ढंग से खोज करने पर इनके बड़े भंडार भी मिल सकते हैं।
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सच तो यह है कि भारत में आज तक सही मायने में कच्चे तेल की खोज ही नहीं हुई है। मिलती जुलती भौगोलिक स्थितियों वाले दुनिया के दूसरे इलाक़ों से तुलना की जाए तो तेल और गैस की खोज के लिए सबसे कम कुंओं की खुदाई भारत में ही की गई है।
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आज भी भारत के पास कई स्थापित स्रोत है जहाँ पर्याप्त मात्रा में तेल और प्राकृतिक गैस मिल सकते हैं। समस्या यह है कि यह स्थान या तो गहरे समुद्र में हैं या छोटे-छोटे ऐसे इलाकों में, जहाँ से इन्हें निकालने का काम पेचीदा या महंगा हो सकता है।

लेकिन दोनों ही स्थितियों में समस्या ज़मीन के नीचे स्थित संसाधनों की उतनी नहीं है जितनी कॉन्ट्रेक्ट सिस्टम और लाइसेंस प्रणाली की है।

जोख़िम भरा व्यापार

when india will stop import of oil?

तेल और गैस क्षेत्रों की खोज और उनका विकास एक जोख़िम भरा व्यापार है। निवेशक को कड़ी मशक्कत और करोड़ों रुपए खर्च करने के बाद ही तेल या प्राकृतिक गैस के नए भंडार का पता चलता है। कई बार सब कुछ करने के बाद भी उसे खाली हाथ ही लौटना पड़ता है।

अनुबंध प्रणाली और क़ीमत को लेकर विवाद के कारण कई गंभीर निवेशकों ने भारत से दूर ही रहना पसंद किया है। इसलिए नई सरकार की पहली प्राथमिकता होनी चाहिए कि वह निवेशकों का विश्वास दोबारा हासिल करे। इसके लिए स्थिर, स्पष्ट और पारदर्शी अनुबंध प्रणाली की ज़रूरत है।

साथ ही कच्चे तेल की क़ीमतों में आई गिरावट के कारण सरकार को घरेलू उत्पादन से ज़्यादा राजस्व की उम्मीदों को कम करने की ज़रूरत है।

'मूल्य नियंत्रण हल नहीं'
दुनिया भर में उद्योग और उपभोक्ता क़ीमत के आधार पर ही ईंधन का उपयोग करते हैं। उदाहरण के लिए 2013-14 में अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में तेल की तुलना में गैस कहीं सस्ती दर पर उपलब्ध थी। विकसित बाज़ारों में लोग क़ीमत के आधार पर ईंधन का चयन करते हैं। लेकिन भारत में कीमतों का निर्धारण सरकार करती आई है, इसलिए किस ईंधन की खपत कितनी मात्रा में होनी है यह सरकार पर निर्भर होता है।

क़ीमत तय नहीं तय कर सकता

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भारत तेल और गैस का बड़ा हिस्सा आयात करता है, पर वह उनकी क़ीमत तय नहीं तय कर सकता। इसलिए भारत सरकार समय-समय पर क़ीमतों पर नियंत्रण कर और गैस का कोटा बांधकर बिक्री मूल्य संतुलित करने का प्रयास करती रहती है।

इस प्रकार क़ीमतें नियंत्रित करने से अमीर की मर्सिडीज को डीज़ल उसी कीमत पर मिलता है जिस पर ग़रीब किसान को अपने मोटर पंप के लिए।

सब्सिडी का प्रयोग महंगे ईंधन का खर्च वहन नहीं कर सकने वाले और ग़रीबी रेखा के नीचे रहने वाले लोगों की मदद के लिए ही होना चाहिए।

महंगी ऊर्जा का ग़लत इस्तेमाल
लेकिन मूल्यों का नियंत्रण इसका हल नहीं है। क्योंकि यह भारत सरकार तेल या गैस की क़ीमतें तय नहीं कर सकती, अंतरराष्ट्रीय बाजार तय करता है।

कीमतें तय करने में इस तरह का हस्तक्षेप पहले से महंगी ऊर्जा के अकुशल प्रयोग को बढ़ावा देता है। इसी वजह से ओएनजीसी और आईओसी आदि जैसी लाभदायक राष्ट्रीय धरोहर की कंपनियां कमजोर होती गई। यह देश के बुनियादी ढांचे तथा उसकी ऊर्जा सुरक्षा के लिए ख़तरनाक है।

सुनहरा मौक़ा

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अच्छी बात यह है कि सरकार अब डीज़ल और पेट्रोल की क़ीमतें तय नहीं करती, उन्हें बाज़ार की ताक़तों पर छोड़ दिया है। रसोई गैस की तरह नए बजट से उर्वरक तथा बिजली के लिए सब्सिडी भी ज़रूरतमंद लोगों तक सीधी ही पहुंचनी चाहिए।

सौभाग्य से पिछले छह महीनों से अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में तेल की क़ीमत आधी हो गई हैं। अगर क़ीमतें बढ़ती भी हैं तो यह ज़्यादा से ज़्यादा 70 डॉलर प्रति बैरल के आस पास ही होंगी। यह मौक़ा है जब भारत अंतरराष्ट्रीय बाज़ार से अलगाव को ख़त्म कर अपने आपको इससे जोड़े। ऐसा सुनहरा मौका कम ही आता है।

इससे देश में घरेलू संसाधनों की खोज का काम तेज़ होगा। इसके आलावा भारत को खाड़ी देशों के आलावा अन्य क्षेत्रों से पाइप लाइन के जरिए गैस का आयात करने में आसानी होगी। इससे ईंधन की कई विभिन्न स्रोतों से आपूर्ति की संभावनाएं बढ़ जाएंगी। यह भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिेए ज़रूरी है।

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