धर्मांतरण के मुद्दे पर क्या था पटेल का रुख?
संविधान निर्माताओं ने सभी धार्मिक समुदायों को अपने धर्म के प्रचार की छूट दी थी। इसे 'अल्पसंख्यकों को दी गई रियायतों' के तौर पर देखा गया और दो दशक तक चीज़ें सामान्य रहीं।
'अल्पसंख्यकों को दी गई रियायतों' में दो दशक के बाद उस वक़्त खलल पड़ी जब दलितों और आदिवासियों की बड़ी आबादी वाले उड़ीसा में धर्मांतरण विरोधी क़ानून लाया गया।
1960 के दशक में स्वतंत्र पार्टी की सरकार 'दी फ्रीडम ऑफ़ रिलीजन एक्ट, 1967' लाई थी। इसमें जबरन, लालच या किसी तरह के छल से धर्मांतरण कराने पर रोक का प्रावधान था। इस क़ानून में 'प्रलोभन' शब्द की परिभाषा बेहद विवादास्पद थी क्योंकि इसके दायरे में 'किसी भी तरह से पहुंचाए गए फ़ायदे, चाहे वह नगदी हो या फिर किसी अन्य स्वरूप में हो' को लाया गया था।
प्रलोभन या लालच
इसका एक मतलब ये भी था कि अगर कोई दलित आत्मसम्मान और बराबरी के लिए हिंदू धर्म का त्याग करता है तो उसके धर्मांतरण को प्रलोभन के आधार पर चुनौती दी जा सकती थी। इसमें कोई हैरत की बात नहीं थी कि 1972 में जब उड़ीसा हाई कोर्ट ने 1967 के इस क़ानून को असंवैधानिक करार देने के जो कारण गिनाए थे, उनमें 'प्रलोभन' शब्द की 'अस्पष्ट' परिभाषा भी एक वजह थी।
'प्रलोभन' की जगह 'लालच' शब्द का जिक्र
साल 1968 में मध्यप्रदेश में भी संयुक्त विधायक दल की सरकार ने ऐसा ही एक क़ानून बनाया जिसमें 'प्रलोभन' की जगह 'लालच' शब्द का जिक्र किया गया।
इस क़ानून के तहत प्रत्येक धर्मांतरण की 'सूचना' ज़िलाधिकारी को देना ज़रूरी कर दिया गया। साल 1974 में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने इस क़ानून को दी गई चुनौती को खारिज़ करते हुए कहा कि वे उड़ीसा हाई कोर्ट के 'फ़ैसले के आधार से इत्तेफाक़ नहीं रखते' हैं।
इसके ठीक बाद सुप्रीम कोर्ट में पांच जजों की एक संविधान पीठ ने दोनों उच्च न्यायालयों के फ़ैसलों के ख़िलाफ़ दायर की गई याचिकाओं पर इकट्ठी सुनवाई शुरू कर की।
संविधान सभा
जनवरी, 1977 में दिए गए फ़ैसले में संविधान पीठ ने एकमत से धर्मांतरण विरोधी दोनों ही क़ानूनों को बरकरार रखा लेकिन उड़ीसा हाई कोर्ट की दलील पर कुछ कहने से वह साफ तौर पर बचती दिखी और उसने संविधान सभा की बहसों को भी नजरअंदाज कर दिया। फ़ैसले में 'प्रचार' के बारे में कहा गया कि यह किसी को अपने धर्म में शामिल करने का अधिकार नहीं है।
और इसकी वजह बताई गई, "अगर कोई व्यक्ति जान बूझकर धर्मांतरण करता है तो यह सभी नागरिकों को दिए गए अंतरात्मा की स्वतंत्रता के अधिकार का अतिक्रमण होगा।"
जबरन धर्मांतरण कराना एक अपराध है
मुसलमानों और इसाईयों को हिंदू धर्म में वापस लाने के लिए जो अभियान जोर शोर से चलाया जा रहा है, उसके मद्देनज़र सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले और इसी मुद्दे पर बने आधा दर्जन से अधिक राज्यों के क़ानूनों को फिर से देखे जाने की ज़रूरत है।
"मौजूदा क़ानूनों के तहत भी जबरन धर्मांतरण कराना एक अपराध है।" ये बात सरदार वल्लभ भाई पटेल ने 22 अप्रैल 1947 को संविधान सभा में मौलिक अधिकारों और अल्पसंख्यकों के मुद्दों से जुड़ी सलाहकार समिति के चेयरमैन की हैसियत से कही थी।
वे एंग्लो इंडियन समुदाय के प्रतिनिधि फ्रैंक एंथनी की चिंताओं का जवाब दे रहे थे।
दरअसल फ्रैंक एंथनी ने सवाल उठाया था कि आने वाले कल में क़ानून बनाने वाले लोग धर्मांतरण के मुद्दे को किस तरह से देखेंगे। उन्होंने कहा, "आप इसे विधायिका पर छोड़ रहे हैं। कल क़ानून बनाने वाले लोग ये कह सकते हैं कि तुम्हारे पास कोई अधिकार नहीं है।"
मोदी सरकार
सलाहकार समिति की उस बैठक में की गई बहस की अहमियत आज पहले से कहीं ज़्यादा बढ़ गई है। क्योंकि अब सरदार पटेल के नाम की क़सम खाने वाली मोदी सरकार सत्ता में है। और सरकार ने आगरा में चले 'घर वापसी अभियान' के बाद संसद में फूटे विपक्ष के ग़ुस्से के बावजूद सभी राज्यों और केंद्र में धर्मांतरण निरोधी क़ानून लाने की बात कही है।
जबरन धर्मांतरण के ख़िलाफ़ किसी एहतियाती उपाय बरतने की बजाय पटेल ने ये नज़रिया अपनाया था कि मौजूदा क़ानून ही इस तरह के अपराधों से निपटने के लिए पूरी तरह से सक्षम हैं।
धर्म परिवर्तन
अल्पसंख्यकों के मुद्दों पर विचार करने वाली सलाहकार समिति की तरफ़ से गठित की गई उपसमिति ने एहतियाती प्रावधान शामिल किए जाने की सिफ़ारिश की थी जिसके लिए पटेल रज़ामंद नहीं हुए। इस प्रावधान में कहा गया था कि "ज़बरदस्ती या ग़ैरज़रूरी प्रभाव के इस्तेमाल से एक धर्म से दूसरे धर्म में कराए गए परिवर्तन को क़ानून की मंज़ूरी नहीं होगी।"
अल्पसंख्यकों से जुड़े मुद्दों पर विचार करने के लिए बनाई गई इस उपसमिति में बहुमत इस प्रावधान के पक्ष में था जबकि बैठकों के ब्यौरे से ये साफ़ था कि चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ने "इस प्रावधान की ज़रूरत पर ही सवाल खड़े कर दिए थे।"
उनका कहना था कि ये बात पहले से ही भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) में शामिल है।
संविधान सभा
चक्रवर्ती राजगोपालाचारी के साथ संविधान सभा के अध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद। हालांकि इस प्रावधान का मसौदा वास्तव में केएम मुंशी ने मौलिक अधिकारों से संबंधित उपसमिति के सामने तैयार किया था और यह सब-कमेटी भी पटेल की अध्यक्षता वाली सलाहकार समिति ने ही गठित की थी।
22 अप्रैल 1947 को पटेल ने कहा कि यह प्रावधान 'कोई मौलिक अधिकार नहीं है' और दोनों उपसमितियों की ये सिफ़ारिश 'ग़ैरज़रूरी है और इसे हटाया जा सकता है।'
फ्रैंक एंथनी ने तब कहा था कि यह प्रावधान 'ईसाई समुदाय के लिए बेहद महत्वपूर्ण' है। श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने भी कहा कि वे नहीं चाहते कि इस प्रावधान को हटाया जाए।
सलाहकार समिति में बहुमत इस प्रावधान के पक्ष में था लेकिन पटेल ने अगले दिन संविधान सभा के अध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद को भेजी गई रिपोर्ट में इसे बरक़रार रखने में मदद नहीं की।
संशोधन प्रस्ताव
एक मई, 1947 को संविधान सभा की बैठक में ये मुद्दा फिर से उठा। केएम मुंशी ने 'धोखे' और 'कम उम्र' के आधार पर धर्मांतरण को अमान्य क़रार देने के लिए संशोधन प्रस्ताव पेश किया।
बाहरी दबाव के प्रभाव में किए जाने वाले धर्मांतरण की रोकथाम के लिए संविधान सभा के सदस्यों में मुंशी के प्रस्ताव के बाद बहस शुरू हो गई।
भीम राव अम्बेडकर, मुंशी के संशोधन प्रस्ताव से असहमत थे और उन्होंने कहा कि सलाहकार समिति इस मुद्दे के सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद ही इस नतीजे पर पहुंची है कि वे उन प्रावधानों पर क़ायम रहेंगे जिनका ज़िक्र उनकी सिफ़ारिशों में है।
पटेल इस सुझाव के पक्ष में थे कि मुंशी के संशोधन प्रस्ताव को फिर से सलाहकार समिति के पास विचार के लिए भेज दिया जाए।
आज़ादी के बाद
राजेंद्र प्रसाद ने उनके सुझाव को स्वीकार कर लिया। सलाहकार समिति में इस बार पटेल के पास अपने रास्ते थे। आज़ादी के दस दिन बाद पटेल ने राजेंद्र प्रसाद को लिखा, "इस मुद्दे पर आगे सोच विचार करने के बाद हमें ये लगता है कि ये प्रावधान इतने आमफ़हम हैं कि इसे संविधान में शामिल करना ग़ैरज़रूरी है और हमारी सिफ़ारिश है कि इसे पूरी तरह से हटाया जाए।"
हालांकि धर्मांतरण को अमान्य क़रार देने वाला ये प्रावधान इसके बाद हटा लिया गया लेकिन छह दिसंबर, 1947 को संविधान सभा में धर्मांतरण पर एक बार फिर से बहस छिड़ी।
बहस के केंद्र में ये सवाल था कि क्या धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार का विस्तार धर्म के प्रचार प्रसार के अधिकार की हद तक होना चाहिए।
मत का प्रचार
मौलिक अधिकारों की उपसमिति के सामने मुंशी ने जो पहला मसौदा पेश किया था, ये शब्द दरअसल उस प्रस्ताव में शामिल नहीं किए गए थे। अल्पसंख्यकों की उपसमिति की सिफ़ारिश के बाद ये शब्द बाद में शामिल किए गए थे।
17 अप्रैल, 1947 को हुए बैठक के ब्योरे में कहा गया है, "एम रुथ्नास्वामी ने ईसाई और इस्लाम जैसे धर्मों के हवाले से ये ज़िक्र किया कि ये अनिवार्य रूप से प्रचार प्रसार करने वाले धर्म हैं और इनके लिए ऐसे प्रावधान बनाए जाने चाहिए ताकि ये अपने नियमों के मुताबिक़ अपने मत का प्रचार प्रसार कर सकें।"
केएम मुंशी ने 'अल्पसंख्यकों को दी गई इस रियायत' को फिर से दोहराते हुए संविधान सभा में कहा कि "'प्रचार' शब्द इस अनुच्छेद में बरक़रार रखा जाना चाहिए ताकि अल्पसंख्यकों के मुद्दों पर विचार करने वाली कमेटी ने जो कुछ भी उनके लिए हासिल किया है, उस पर आंच न आए।"
धार्मिक समुदाय
संविधान सभा में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार को मिली मंज़ूरी के तर्ज़ पर मुंशी ने कहा कि यह अधिकार किसी भी धार्मिक समुदाय के लिए उपलब्ध होगा कि वे अन्य लोगों को अपने धर्म में शामिल होने के लिए प्रेरित कर सकें।
संविधान सभा में मुंशी की दख़लंदाज़ी के बाद एक बहुलतावादी राष्ट्र के विचार को मज़बूत करने के लिए 'प्रचार' शब्द को हटाने से संबंधित संशोधन प्रस्ताव ख़ारिज कर दिए गए।