तालिबान को कहां से ताकत मिलती है?
पेशावर में शर्मनाक और हृदयविदारक हमले के बाद पाकिस्तानी तालिबान दुनिया भर में सबके निशाने पर आ गया है। चरमपंथियों पर सख्त कार्रवाई के लिए पाकिस्तान के सभी नेता एक मंच पर एक स्वर में बोलते नजर आए।
लेकिन ऐसी क्या वजह है कि तालिबान लंबे समय से पाकिस्तान की सत्ता के खिलाफ संघर्ष छेड़े हुए है और पाकिस्तान सरकार उससे निबट नहीं पा रही है? पाकिस्तानी तालिबान आखिर चाहता क्या है और उसे शक्ति कहां से मिलती है?
पाकिस्तान में संशय किस चीज को लेकर है? तालिबान चाहता क्या है और पाकिस्तान के लिए उससे लड़ना आसान क्यों नहीं है?
एसोसिएटेड प्रेस ने 17 दिसंबर को एक लेख छापा, "पेशावार चरमपंथी हमला, पाकिस्तानी तालिबान क्या चाहता है?" इस सवाल का जवाब देते हुए रिपोर्ट कहती है, "टीटीपी ने सरकार को उखाड़ फेंकने और सख़्त इस्लामिक कानून लागू करने की क़सम खाई है।"
'तालिबान चाहता क्या है' विषय पर ही सीएनएन पर लॉरा स्मिथ-स्पार्क और टिम लिस्टर के विश्लेषण में कहा गया, जब घेराबंदी अंततः खत्म हुई तो पाकिस्तान लड़खड़ा रहा था और दुनिया अचंभित थी। कौन ऐसा करना चाहेगा? और इससे वह क्या हासिल करना चाहते हैं?
कौन देता है तालिबान को पैसा?
सरकार को उखाड़ फेंकने और शरिया कानून लागू करने के लिए लंबे समय से संघर्ष कर रहे पाकिस्तानी तालिबान ने पेशावर हमले का श्रेय लेने में जरा भी देर नहीं की।
जेम्स रश ने इंडिपेंडेट में लिखा, "पाकिस्तानी तालिबान सरकार को उखाड़ फेंकने और सख्त इस्लामिक शासन के लिए लड़ रहे हैं। कबायली क्षेत्र में भारी सैन्य अभियान के बाद इस समूह ने हमले की योजना बनाई।"
अंग्रेजी मीडिया में यही सवाल लंबे समय से पूछा जाता रहा है। दि नेशनल के लिए रिपोर्टिंग करते हुए 2010 में हामिदा गफूर ने अफगान तालिबान के बारे में लिखा था, "लेकिन तालिबानी हैं कौन और वह चाहते क्या हैं?"
तालिबान के नेता मुल्ला उमर के प्रवक्ता जेबिउल्लाह ने पिछले साल सीएनएन से कहा था, "हम एक बार फिर कहते हैं। अफगानिस्तान में शरिया कानून लागू करना, इस्लामिक सरकार बनाना और देश से विदेशी सेनाओं को हटाना चाहते हैं।"
ऑर्थर ब्राइट ने क्रिश्चियन साइंस मॉनिटर ने 2012 में तालिबान को पैसा दिए जाने पर एक विशेषज्ञ के हवाले से लिखा, "बड़ी मात्रा में... अरब देशों में रहने वाले समृद्ध व्यक्तियों से मिलता है... घुसपैठिए चंदा उगाहने के लिए हज का भी इस्तेमाल कर सकते हैं। खाड़ी के चरमपंथियों के ये संबंध कुछ गुटों पर अल कायदा के प्रभाव के चलते भी हो सकते हैं।"
दो चीजें साफ हैं। पहली तो यह कि तालिबान शरिया कानून चाहता है और दूसरी कि वह अलग-थलग पड़े जंगली गुट नहीं हैं बल्कि उनके पास पैसा पाने के पर्याप्त साधन हैं। सवाल यह है कि वह यह मांग कर क्यों रहे हैं। इसका जवाब कानून में है।
'संविधान से ताकत'
पाकिस्तानी संविधान के अनुच्छेद 227 (इस्लाम के प्रावधान, भाग 9) में लिखा है, "(1) सभी मौजूदा क़ानूनों को पवित्र क़ुरान और सुन्नाह में बताई गई इस्लाम की हिदायत के अनुरूप करना होगा, इस भाग को इस्लाम की हिदायतों के अनुरूप ही माना जाए, और कोई भी ऐसा कानून लागू नहीं होगा जो ऐसी हिदायतों के प्रतिकूल जाए।"
यह प्रतिबद्धता स्पष्ट और संदेह से परे है। यह 1949 में पाकिस्तान की संविधान सभा में जिन्नाह के उत्तराधिकारी लियाक़त अली खान के किए वायदे के अनुरूप है।
उद्देश्यों के प्रस्ताव में लिखा गया है, "चूंकि संपूर्ण विश्व पर सर्वशक्तिमान अल्लाह की हुकूमत चलती है और पाकिस्तान के लोगों को अधिकारों का इस्तेमाल उसके बताए तरीकों की सीमाओं में रहकर ही करना होगा।"
"और जहां तक पाकिस्तान के लोगों की व्यवस्था बनाए रखने की इच्छा का सवाल है, राज्य अपनी शक्तियों और अधिकारों का इस्तेमाल लोगों के चुने हुए प्रतिनिधियों के जरिए करेगा'; जहां लोकतंत्र, आजादी, समानता, सहनशीलता और सामाजिक न्याय- उसी प्रकार होंगे जैसे कि इस्लाम ने स्थापित किए गए हैं; मुसलमानों को पवित्र क़ुरान और सुन्नाह में बताए गए तरीकों और शिक्षा के मुताबिक़ अपनी निजी और सामूहिक जिंदगी पर अधिकार होगा।"
इसके बावजूद, पाकिस्तान के कानून मुख्यतः भारत की तरह धर्मनिरपेक्ष हैं। यह वैसे ही हैं जैसे औपनिवेशक काल में थे, जब लॉर्ड मैकाले के नेतृत्व में इन्हें लिखा गया था।
अपूर्ण इस्लामिक राज्य से 'असमंजस'
अस्सी के दशक में राष्ट्रपति जिया उल हक ने कुछ इस्लामी कानून लागू किए, जिनमें शराब के साथ पकड़े गए लोगों को कोड़े मारना, बलात्कार पर कानून और ब्लड मनी शामिल थे।
इनमें से कई क़ानूनों का पालन नहीं किया जाता क्योंकि पाकिस्तान सरकार वापस नहीं लौटना चाहती। विश्लेषक खालेद अहमद पाकिस्तान को अपूर्ण इस्लामीकृत राज्य कहते हैं। इसका अर्थ यह है कि पूरे शरिया कानून का वादा पूरा नहीं किया गया, जिससे पैदा हुए असमंजस का फायदा तालिबान ने उठाया।
वह सवाल, जिसके लिए विश्लेषक अपना सिर खुजला रहे हैं, उसका जवाब यह है कि तालिबान दरअसल पाकिस्तान के संविधान पर अमल चाहता है।
इसीलिए उनसे लड़ना इतना मुश्किल है- क्योंकि वह कहते हैं कि क़ानून के सवाल पर सही हैं। उनके खिलाफ कोई भी लड़ाई तब तक सफ़ल नहीं हो सकती, या ठीक से शुरू नहीं हो सकती, जब तक संविधान और इसके वादों पर जारी संशय को खत्म न कर दिया जाए।
मुझे नहीं लगता कि यह ऐसा मुद्दा है जिसका वास्ता सरकार या सेना से है। बदलाव समाज में आना चाहिए। इसीलिए तालिबान से लड़ना इतना मुश्किल है।