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'समस्या जनसंख्या है, मुस्लिम जनसंख्या नहीं'

Thu, 27 Aug 2015 09:48 PM IST
Updated Thu, 27 Aug 2015 09:48 PM IST
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What's impact Muslim-hindu census.

किसी आम आदमी से पूछिए कि भारत में मुसलमानों की कितनी आबादी है तो आपको इसके अजीबोगरीब जवाब मिलेंगे। कुछ लोग कहेंगे कि वो बहुसंख्यक हैं, तो कुछ लोग कहेंगे कि उनकी संख्या बहुत ज्यादा है।

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जिनके पास थोड़ी ज्यादा सूचना होगी, साथ ही वो दूर की सोच रहेंगे वो कहेंगे कि वो बहुत तेजी से बढ़ रहे हैं और एक दिन उनकी आबादी देश में सबसे ज्यादा हो जाएगी।
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अगर आप उनसे पलटकर यह पूछ लेंगे कि आपको ऐसा क्यों लगता है कि मुसलमानों की संख्या बहुत ज्यादा है तो वो कहेंगे, मैं जिस शहर में रहता हूं वहां हर जगह मुसलमान दिखाई देते हैं।
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यकीन बनाम सच

What's impact Muslim-hindu census.

जब ऐसी ही समझ बहुत सारे लोगों में मौजूद पाई जाती है तो कई बार लगने लगता है कि यही सच है। मुझे इस बात की खुशी है कि जनगणना के ताजा आंकड़ों को जो लोग देखेंगे और उसका अध्ययन करेंगे तो उन्हें पता चलेगा कि वो अबतक जो सोचते थे वो गलत था।

इन आंकड़ों से यह बात साफ है कि मुसलमान भारत में अल्पसंख्यक हैं। लेकिन साल 2011 की जनगणना पर आधारित इन आंकड़ों को जिस तरह से पेश किया गया है उससे भारत के एक तबके की इस सोच (जो गलत सूचना पर आधारित है) को शायद बल मिले कि मुसलमान जल्द ही इस देश में बहुसंख्यक हो जाएंगे।

ताजा आंकड़ों के अनुसार पिछले एक दशक में मुसलमानों की जनसंख्या में बढ़ोतरी की दर 24.6 प्रतिशत रही है। ये दर हिन्दुओं की जनसंख्या वृद्धि की दर (16.7 प्रतिशत) से करीब आठ प्रतिशत ज्यादा है।

जनसंख्या बढ़ने की दर

What's impact Muslim-hindu census.

इस बात से शायद ही कोई इनकार करे कि मुसलमानों की जनसंख्या वृद्धि की दर हिन्दुओं की तुलना में ज्यादा है। यह बात जनगणना के ताजा आंकड़ों से भी जाहिर होती है। लेकिन ये आंकड़े इस बात को बहुत साफ नहीं करते कि मुसलमानों की जनसंख्या वृद्धि की दर में पिछले कुछ दशकों में बहुत तेजी से कमी आई है।

2001-11 के दौरान न सिर्फ जनसंख्या वृद्धि दर में भारी कमी आई है बल्कि इस दौरान मुसलमानों की जनसंख्या बढ़ोतरी दर में भी भारी गिरावट दर्ज की गई है।

इस दौरान हिन्दुओं की जनसंख्या वृद्धि की दर में भी कमी आई है लेकिन मुसलमानों और हिंदूओं की जनसंख्या वृद्धि दर में जो फासला पहले था वो काफी कम हुआ है।

मुसलमानों की जनसंख्या वृद्धि की दर में आई इस कमी से उन लोगों को जरूर राहत मिलनी चाहिए जिन्हें यह डर सताता है कि आने वाले समय में भारत में मुसलमानों की जनसंख्या हिन्दुओं से ज्यादा हो जाएगी।

असल समस्या

What's impact Muslim-hindu census.

असल मुश्किल यह है कि भारत में जनसंख्या बढ़ने को एक समस्या की तरह देखने के बजाय केवल मुसलमानों की जनसंख्या में बढ़ोतरी को समस्या की तरह देखा जाता है।

इससे भी बड़ी मुश्किल मुसलमानों की जनसंख्या बढ़ने को एक सोची-समझी साजिश के रूप में देखना है, ताकि मुसलमानों की संख्या हिन्दुओं से अधिक हो जाए। यह सच है कि पिछले एक दशक में हिन्दुओं की कुल जनसंख्या में 0.7 प्रतिशत की कमी आई है। हिन्दुओं की जनसंख्या देश की कुल आबादी का 79.8 प्रतिशत है।

वहीं मुसलमानों की कुल जनसंख्या का प्रतिशत 13.4 से बढ़कर 14.2 हो गया है। यानी उनकी जनसंख्या में पहले के मुकाबले 0.8 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। लेकिन ध्यान रहे कि एक या दो या उससे अधिक बच्चे पैदा करना पति और पत्नी का निजी निर्णय होता है।

बच्चे का फैसला निजी

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कोई वैवाहिक दंपति कितने बच्चे पैदा करना चाहता है इसका निर्णय वो शायद ही धार्मिक आधार पर लेता हो। और कम से कम ये किसी मजहब के लोगों की बहुत बड़ी साजिश का हिस्सा तो कतई नहीं।

और भाजपा सांसद साक्षी महाराज की तरह तो शायद ही कोई करता हो जिन्होंने कुछ समय पहले कहा था कि हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए हर हिन्दू को कम से कम चार बच्चे पैदा करने चाहिए। जनसंख्या वृद्धि और संसाधनों पर पड़ने वाले उसके दबाव की समस्या से निपटने के लिए सरकार लोगों को कम बच्चे पैदा करने के लिए शिक्षित और प्रेरित करने की कोशिश करे।

सरकार कम बच्चे पैदा करने वालों को विशेष रियायत वगैरह देकर इसे बढ़ावा दे सकती है लेकिन बेहतर यही होगा कि इसका फैसला परिवारों के ऊपर ही छोड़ दिया जाए, चाहे उनका तालुक्क किसी मजहब से हो।

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