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चुनाव प्रचार में अव्वल मोदी की ऊर्जा का क्या है राज?

Sun, 11 May 2014 12:10 PM IST
ज़ुबैर अहमद/बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
ज़ुबैर अहमद/बीबीसी संवाददाता, दिल्ली Updated Sun, 11 May 2014 12:10 PM IST
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what is the secret of Narendra Modi's energy?

अगर देश भर में दौरे और रैलियां करके, अपनी रणनीतियों पर अमल करके कोई चुनाव जीत सकता है तो भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी को इस चुनाव में भारी जीत मिलनी चाहिए।

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यह बात मुझसे हाल ही में मोदी की एक कट्टर समर्थक ने कही। वह कहीं न कहीं भारत के मध्यवर्ग के एक बड़े तबके की जनभावना को अभिव्यक्त कर रही थीं।

एक तरफ़ भारतीय मीडिया मोदी की हर रैली को रात-दिन कवर कर रहा है तो दूसरी तरफ़ उनके समर्थक मानते हैं कि काम करने के मामले में मोदी किसी से भी कम नहीं हैं।
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बनारस में आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल का रोड शो भी कम प्रभावशाली नहीं रहा। दरअसल वो सर्दी और बुख़ार के बावजूद लगातार प्रचार अभियान में लगे रहे हैं। वो एक ऐसे चुनाव प्रचारक के रूप में सामने आए हैं जो कभी भी थकते या रुकते नहीं हैं।
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कांग्रेस के स्टार प्रचारक राहुल गांधी भी देशभर में एक के बाद एक रैलियां कर रहे हैं। इन रैलियों में वो मोदी पर प्रहार करते रहे हैं लेकिन कई बार ऐसा लगता है कि वो अपनी ताक़त से ज़्यादा जोर लगाने की कोशिश कर रहे हैं। इसके बावजूद वो नरेंद्र मोदी की तरह ऊर्जा से भरे हुए नहीं नज़र आते।

उम्र भी ज़्यादा, ऊर्जा भी अधिक

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नरेंद्र मोदी आमतौर पर एक दिन में तीन से चार रैलियां करते हैं और फिर अपने शहर अहमदाबाद लौट आते हैं। लंबे समय से उनकी यही दिनचर्या है। यह मामूली बात नहीं है कि पिछले साल सितंबर से ही वो तक़रीबन रोज़ ही सैकड़ों मील का हवाई सफ़र करते हैं।

मोदी की उम्र है 64 साल, यानी वो 45 वर्षीय केजरीवाल और 43 वर्षीय राहुल से काफ़ी बड़े हैं। लेकिन वो अपने इन युवा प्रतिद्वंदियों के मुक़ाबले रोज़ ज़्यादा हवाई सफ़र करते हैं, रोज़ भारत की गलियों की ज़्यादा धूल फांकते हैं और उन दोनों से ज़्यादा रैलियों को संबोधित करते हैं।

नरेंद्र मोदी का '56 इंच की छाती' के दावे वाला बयान अब एक मज़ाक़ जैसा बन चुका है, लेकिन उनके सबसे कट्टर आलोचक भी उनकी ऊर्जा और हौसले को स्वीकार करते हैं।

अपनी रोज़मर्रा की कठिन ज़िम्मेदारियों को पूरा करने की उनकी दृढ़ इच्छाशक्ति की उनके विरोधी भी मन ही मन प्रशंसा करते हैं। ऐसे में सवाल यह उठता है कि मोदी की इस ऊर्जा का स्रोत क्या है?

कहां से आती है ऊर्जा?

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पुरानी कहावत है कि सत्ता से शक्ति मिलती है। सत्ता व्यक्ति में जोश और ऊर्जा के छिपे हुए स्रोत को जगा देती है।

भारत के पूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हा रॉव सेवानिवृत्त जीवन जी रहे थे, उनकी सेहत भी ठीक नहीं रहती थी, लेकिन प्रधानमंत्री का पद ग्रहण करते ही उनमें उत्साह और जीजिविषा दोनों जागृत हो गए थे और उन्होंने अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा किया।

देश के पहले ग़ैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई 80 साल से अधिक उम्र में प्रधानमंत्री बनने के बाद भी लगातार कार्यरत रहे। संभवतः प्रतिदिन स्वमूत्रपान की उनकी आदत उनके लंबे जीवन का राज़ रही हो।

पहले से तैयार किया गया भाषण

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नरेंद्र मोदी को पहले से तैयार किए गए भाषण से बल मिलता है। वो बिना तैयारी के भाषण नहीं देते हैं। उनकी पार्टी के अंदरूनी सूत्रों के अनुसार हर राज्य के लिए उनका भाषण पहले से तैयार होता है।

अगर वो पश्चिम बंगाल में जाते हैं तो उनके निशाने पर ममता बनर्जी होती हैं और अगर वो बिहार में होते हैं तो नीतीश कुमार पर कटाक्ष करते हैं। उन्होंने भाजपा के प्रति उदासीन मुस्लिम मतदाताओं को लुभाने की काफ़ी कोशिश की। इसके लिए वो लोगों की सलाह भी लेते रहे हैं।

जब भी उन्हें मुस्लिम समुदाय के बारे में बात करनी होती है तो एक वरिष्ठ मुस्लिम नेता उन्हें इसके बारे में सलाह देते हैं। मोदी की रैलियों में मतदाताओं का रवैया आमतौर पर उत्साहवर्द्धक रहता है। यही वजह है कि मोदी के हाव-भाव और भाषणों से लगता है कि उन्हें यक़ीन है कि वो देश के अगले प्रधानमंत्री होने जा रहे हैं।

शायद उनका यह आत्मविश्वास ही उनकी अक्षय ऊर्जा और जीजिविषा का स्रोत है जिसके दम पर वो लगातार इतनी रैलियां और रोड शो कर पा रहे हैं।

उम्मीद पर खरे उतरे

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मोदी के एक क़रीबी रणनीतिकार का कहना है कि मोदी हमेशा से ऊर्जावान नेता रहे हैं। जब उन्हें पार्टी के चुनाव प्रचार अभियान का मुख्य प्रचारक चुना गया था तो सबको पता था कि वो व्यस्त से व्यस्त दिनचर्या का पालन कर सकेंगे, विभिन्न राज्यों में होने वाली रैलियों को संबोधित कर सकेंगे।

मोदी न केवल अपने साथियों की उम्मीदों पर खरे उतरे हैं बल्कि ये कहा जा सकता है कि उन्होंने उन सबकी उम्मीद से बढ़कर प्रदर्शन किया है। नरेंद्र मोदी पिछले साल सितंबर में पांच राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों के पहले राष्ट्रीय परिदृश्य पर सामने आए थे।

उन्हें आधिकारिक तौर पर प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार तो काफ़ी बाद में घोषित किया गया। उन्होंने इसके पहले ही राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और दिल्ली में एक के बाद एक रैलियां की थीं। वो विषय से भटकते नहीं, हमेशा जोश में बोलते हैं और भाषण कला में तो वो माहिर ही हैं।

उनकी रैलियों में समर्थकों का हुजूम उमड़ता देखा जा सकता है जबकि उनकी तुलना में राहुल गांधी की रैलियां उतनी दमदार नहीं दिखतीं।

पहले से थे तैयार

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पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के समय ही यह साफ़ हो गया था कि मोदी केवल राज्यों के चुनाव के लिए प्रचार नहीं कर रहे हैं। उस समय यह दिखने लगा था कि वो ख़ुद को प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में पेश कर रहे हैं।

उनकी पार्टी के लिए उनकी अनदेखी करना बेहद मुश्किल हो गया था। सच तो यह है कि 2004 के लोकसभा चुनावों में अप्रत्याशित रूप से हार का सामना करने वाली भाजपा के लिए इस बार के आम चुनावों में उम्मीद की एकमात्र किरण मोदी ही हैं।

उनकी अति लोकप्रियता को देखते हुए पार्टी ने उन पर भरोसा भी किया। आख़िरकार भाजपा ने पिछले दस साल में मुख्य विपक्ष पार्टी के रूप में बेहद ख़राब प्रदर्शन किया है।

वहीं, भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाए जाने को लेकर पार्टी की सार्वजनिक रूप से काफ़ी छीछालेदर हुई थी।

मोदी समर्थकों में दिखा जोश

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नरेंद्र मोदी को भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार घोषित किए जाने के बाद ऐसा लगा कि जैसे पार्टी के कार्यकर्ताओं में एक नया जोश भर गया हो।

प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किए जाने के बाद मोदी तत्काल ही पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को किनारे लगाते हुए ख़ुद पार्टी के 'पोस्टरब्वॉय' बन गए। उनके आलोचक पहले से ही उनके ऐसे बर्ताव के प्रति आशंका जताते रहे थे।

इसके बाद से मोदी के एक-एक शब्द की नुक्ताचीनी की जाने लगी। दूसरी तरफ़ उनके भाषणों में शिकवे-शिकायतों का जख़ीरा बढ़ता गया, जिसमें काफ़ी नकारात्मकता भरी होती है, लेकिन उनके समर्थकों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।

कई राजनीतिक विश्लेषकों को मानना है कि मोदी ने अपना चुनाव प्रचार अभियान थोड़ा ज़ल्दी शुरू कर दिया। इन विश्लेषकों को लगता है कि मोदी के समर्थक उनसे ऊब जाएंगे और इससे पार्टी और मोदी दोनों को नुकसान होगा।

लेकिन इससे मोदी को फ़ायदा ही हुआ और उन्होंने प्रधानमंत्री पद के लिए अपनी दावेदारी को ज़्यादा मज़बूती से सामने रखा। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि अगर मोदी के नेतृत्व में भाजपा अकेले 200 से ज़्यादा सीटें लाने में कामयाब रहती है तो अगली सरकार के गठन में मोदी की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण हो सकती है।

बने रहे एकमात्र स्टार

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मोदी के प्रचार के तरीके की काफ़ी आलोचना भी हुई है। कई बार उनके पार्टी के अंदर भी दबे स्वर में उनकी आलोचना हुई है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि मोदी हर बड़ा काम ख़ुद ही करना चाहते हैं।

उन्होंने अपनी पार्टी या अपनी सहयोगी पार्टियों के किसी भी नेता को इस चुनाव में स्टार बनकर नहीं उभरने दिया, न ही किसी को ख़ुद पर हावी होने दिया।

उन्होंने तेलुगु देशम के चंद्रबाबू नायडू, भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह और भाजपा नेता स्मृति ईरानी के साथ मंच साझा किया, लेकिन मंच पर आकर्षण का केंद्र किसी और को नहीं बनने दिया। उनके समर्थकों ने भी उनके सामने किसी और नेता को भाव नहीं दिया।

कुछ दिन पहले तक वो गुजरात से आने वाले एक क्षेत्रीय नेता हुआ करते थे, लेकिन अब वो चुनाव जीतें या न जीतें, उनकी रैलियों ने उन्हें राष्ट्रीय परिदृश्य पर ज़रूर ला दिया है।

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