फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   News Archives ›   India News Archives ›   what is quiescence before storm

क्या होती है तूफान से पहले की खामोशी?

Wed, 16 Oct 2013 05:57 PM IST
सलमान रावी
सलमान रावी Updated Wed, 16 Oct 2013 05:57 PM IST
विज्ञापन
what is quiescence before storm
बचपन से कहावत सुनता आ रहा हूँ- तूफ़ान से पहले की ख़ामोशी। ये कहावत अलग-अलग परिस्थितियों में महसूस करता रहा।
विज्ञापन


कभी स्कूल में अपने शिक्षक के गुस्से को लेकर, तो कभी घर पर शरारतों की वजह से अपने पिता के ग़ुस्से से डरकर। नौकरी में आया तो नक्सली इलाक़ों में ज्यादा काम करना पड़ा। इसलिए जब भी नक्सली हिंसा में कमी आती थी, तो लोग इसकी व्याख्या 'तूफ़ान से पहले की ख़ामोशी' के रूप में करते थे।

मगर तूफ़ान से पहले की ख़ामोशी क्या होती है, इसका अंदाज़ा नहीं था। बहरहाल भारत में अब तक टकराने वाले सबसे शक्तिशाली पायलिन तूफ़ान के दौरान मुझे अंदाज़ा हो गया कि ये ख़ामोशी कितनी ख़ौफ़नाक हो सकती है।
विज्ञापन


यूं तो ज़िंदगी में कई तूफ़ान आए और गए, चाहे वो जैसे भी हों- क़ुदरती या निजी। मगर एक बड़े तूफ़ान का सामना करने का यह मेरा पहला अनुभव था। दिल्ली से मेरे हवाई जहाज़ ने जब उड़ान भरी, तब तक ओडिशा के ऊपर मौसम पहले ही ख़राब हो चुका था। तेज़ हवाओं का सिलसिला शुरू हो चुका था। बारिश भी काफी तेज़ थी।
विज्ञापन
विज्ञापन


जब हवाई जहाज़ के पायलट ने हमसे 'सीट बेल्ट' बाँधने को कहा तो लगा कि बस हम अब सुरक्षित उतर जाएंगे। मगर तेज़ हवाओं ने मुश्किलें बढ़ा दीं। जब पायलट ने हवाई जहाज़ को लैंड करने का पहला प्रयास किया, तब तक तेज़ हवाएं टकरा रहीं थी। प्लेन हवाई पट्टी पर उतर न सका और उसे फिर ऊपर ले जाना पड़ा।

जहाज़ में बैठे यात्रियों का कलेजा मुंह को आ गया था। हम फिर से बादलों के ऊपर जा चुके थे। फिर पायलट ने प्लेन उतारने का दूसरा प्रयास किया। मगर तेज़ हवाओं में प्लेन हिचकोले खाने लगा।

यात्रियों में बच्चे भी सवार थे, जो रोने लगे। चौथे प्रयास के बाद तेज़ हवाओं को चीरते हुए हमारे जहाज़ ने किसी तरह झटके के साथ लैंड किया, तो सबकी जान में जान आई। ये भी ज़िंदगी का अजीब सा अनुभव था।

चारों तरफ़ वीरानी
ये तूफ़ान से रू-ब-रू होने की बस शुरुआत ही थी क्योंकि आगे क्या होने वाला है, इसका अंदाज़ा नहीं लग रहा था। ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर के एयरपोर्ट से निकलते ही चारों तरफ वीरानी दिखी।

लोग और गाड़ियाँ सड़कों से नदारद तो थे ही, साथ ही सभी दुकानें और प्रतिष्ठान भी बंद थे। लोग अहतियात बरत रहे थे।

भुवनेश्वर से गोपालपुर तक का सफ़र 180 किलोमीटर का था। तेज़ बारिश और हवा की वजह से सड़क पर एक भी गाड़ी नहीं थी। हमारे सामने चुनौती थी कि हमें समय से पहले वहां पहुंचना है, जहाँ पायलिन पहली बार ज़मीन के इलाकों से टकराने वाला था- यानी गोपालपुर का तटवर्तीय इलाका।

शाम के छह बजे थे और हवाओं ने ज़ोर पकड़ना शुरू कर दिया। तूफ़ान की शिद्दत बढ़ने लगी थी। हालांकि वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी थी कि तूफ़ान शाम छह बजे से लेकर रात आठ बजे गोपालपुर के तट से टकराएगा।

हुआ भी वैसा। तूफ़ान टकरा चुका था। हमारे होटल के सामने वाले पेड़ टूट-टूटकर गिरने लगे। कच्चे मकानों की छतें उड़ने लगीं। पोल गिरने लगे। तूफ़ान की शिद्दत और बढ़ने लगी।

मगर उसी दौरान एक पल ऐसा भी आया, जब सब कुछ थोड़ी देर के लिए बंद हो गया था। तेज़ हवाएं कुछ पल के लिए रुकीं। कहीं कोई जुम्बिश नहीं। बरहमपुर गोपालपुर तट से महज़ 15 किलोमीटर दूर है, जहाँ मैंने अपना ठिकाना बना रखा था।

मगर वो पल आया जब हवा रुकी तो मेरे साथ मौजूद होटल में काम करने वाले स्थानीय लोगों के मुंह से अचानक 'बाप रे बाप' निकला।

इन लोगों ने 1999 का तूफ़ान भी झेला था। इनमे से एक ने डरे हुए लहजे में मुझसे कहा, "अब जो होगा विनाशकारी होगा। यह तूफ़ान से पहले की ख़ामोशी है। हमने ऐसा 1999 में भी महसूस किया था। अब तूफ़ान और उग्र होकर टकराएगा।"

ये पल था तो कुछ सेकेंडों का, लेकिन मैंने इस पल को महसूस किया जब सब कुछ थम गया था। मुझे पसीने आने लगे थे। मगर अगले पल ऐसा तूफ़ान टकराया, जिसने मेरे मज़बूत तीन मंजिला होटल की नींव को हिलाकर रख दिया।

संसार से संपर्क ख़त्म
होटल में रुके लोग और कर्मचारी कमरों से निकलकर गलियारे में खड़े को गए। सबके चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थीं। हवा ऐसी चल रही थी, मानो होटल की इमारत को ही उड़ाकर ले जाएगी।

कुछ ही देर में एक-एक कर होटल की कांच की खिड़कियाँ टूटने लगीं। फ़ानूस गिरने लगे। कमरों में पानी भर चुका था। तीन घंटे बीत चुके थे, तूफ़ान रुकने का नाम नहीं ले रहा था। पूरे इलाक़े में दो दिन पहले से ही बिजली काट दी गई थी।

हमारे होटल में जेनरेटर था। वो भी ठप हो गया। बस अँधेरा ही अँधेरा और हवा की ख़ौफ़नाक आवाज़। अगले पल मोबाइल फ़ोन का भी नेटवर्क ग़ायब। हम संसार से बिलकुल कट चुके थे।

मन में ख्याल आ रहा था कि पता नहीं गोपालपुर के तट पर क्या स्थिति होगी। अच्छी बात यह थी कि लाखों लोगों को तटवर्तीय इलाके से पहले ही हटा दिया गया था।

इस वजह से जान का नुकसान तो नहीं हुआ। अलबत्ता लोगों के मकान और खेत क्षतिग्रस्त ज़रूर हुए। मगर दिल को एक दिलासा था कि माल के नुकसान की भरपाई तो हो सकती है, मगर जान की नहीं। लोगों की जानें तो बचीं।


पायलिन के बीच में रहकर तूफ़ान का अनुभव करने के बाद अब मुझे पता चल गया है कि आख़िर सही मायने में तूफ़ान से पहले की ख़ामोशी क्या होती है और वो कितनी डरावनी होती है।

अब बिना किसी वजह मैं इस कहावत का इस्तेमाल नहीं करूंगा। इतना तो तय है।
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed