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क्या मतलब है इन चुनाव परिणामों का?

Mon, 09 Dec 2013 11:10 AM IST
विनोद वर्मा/संपादक अमर उजाला डॉट कॉम
विनोद वर्मा/संपादक अमर उजाला डॉट कॉम Updated Mon, 09 Dec 2013 11:10 AM IST
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what is meaning of assembly election results

राहुल गांधी का पूरी तरह विफल हो जाना या फिर नरेंद्र मोदी को मिलने वाली अभूतपूर्व सफलता का पहला चरण? आम आदमी पार्टी की जीत से विकल्प की राजनीति का उभार? या फिर क्षेत्रीय दलों के हाशिए पर चले जाने के संकेत?

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अगर इस मुद्दे का सरलीकरण कर दिया जाए तो कहा जा सकता है कि यह सभी बातें सही हैं। लेकिन चूंकि राजनीति इतनी सरलीकृत नहीं होती, इसलिए इसके निहितार्थ भी इतने सरल नहीं हो सकते।
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राजनीतिक दल और राजनीतिक विश्लेषक विभिन्न चुनावी परिस्थितियों को अलग-अलग ढंग से परिभाषित करते रहे हैं।

इससे पहले जब भी मतदान का प्रतिशत बढ़ता रहा है, ये विश्लेषण किया जाता रहा है कि यह सत्तारूढ़ दल के खिलाफ नाराजगी के संकेत हैं। लेकिन इस बार मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में अधिक मतदान के बाद भी सरकारों की वापसी ने इस सिद्धांत को गलत साबित कर दिया है।
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ये कहा जा सकता है कि इन राज्यों में मुख्यमंत्रियों ने अपनी छवियों और अपने कामकाज के दम पर वापसी की है। साथ ही श्रेय भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व को दिया जाना चाहिए जिसने राज्य को गुटबाजी का अड्डा नहीं बनने दिया।

दूसरी ओर राजस्थान से लेकर मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ तक हर प्रदेश में कांग्रेस की हार इस बात का गवाह है कि राहुल गांधी की सीधी निगरानी भी इन प्रदेशों में गुटबाजी को नहीं रोक सकी।

राहुल की रणनीति विफल?
तो क्या यह मान लिया जाए कि राहुल गांधी की रणनीति विफल हो गई है? क्योंकि टिकट वितरण से लेकर प्रभारी चुने जाने तक सारा फैसला उन्होंने ही लिया था और वे अपनी पार्टी की ओर से प्रधानमंत्री पद के अघोषित उम्मीदवार हैं?

इसका उत्तर एक हद तक हां है। एक हद तक इसलिए क्योंकि गुटबाजी को रोकना उन्हीं की जिम्मेदारी थी और ये भी सही है कि चुनाव में सिर्फ प्रभारी और टिकट से चुनाव नहीं जीते जा सकते।

ये भी कहना एक हद तक सही हो सकता है कि राज्यों के चुनाव स्थानीय मुद्दों पर लड़े जा सकते हैं। लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि यूपीए-2 सरकार की छवि और उसके खिलाफ पिछले कुछ महीनों से बन रहा माहौल भी कांग्रेस के खिलाफ गया है।

आने वाले दिनों में राहुल गांधी को प्रदेशों में नेतृत्व तैयार करने में मेहनत करनी होगी और अगर लोकसभा चुनाव में अपनी पार्टी की दशा ठीक रखनी है तो केंद्र सरकार की छवि को सुधारना होगा। क्योंकि इसके बिना नरेंद्र मोदी से मुकाबला करना आसान नहीं होगा।

क्या यह मोदी की सफलता है?
हालांकि यह मान लेना गलत होगा कि इन राज्यों में हुई जीत नरेंद्र मोदी की जीत है। यह याद रखना होगा कि इन चारों राज्यों में जीत का आकलन तब से लगाया जा रहा था जब नरेंद्र मोदी अभी गुजरात का चुनाव जीतकर केंद्र में नहीं आए थे। जब वे प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नहीं बनाए गए थे।

और अगर नरेंद्र मोदी की सफलता ही होती तो क्यों उनके धुंआधार प्रचार के बावजूद दिल्ली में आम आदमी पार्टी को इतनी सफलता मिलती और भाजपा वहां नहीं ठहर जाती, जहां वह ठहर गई है और बस्तर की सीटों पर भाजपा की करारी हार नहीं होती।

यह ठीक है कि नरेंद्र मोदी को लेकर एक सकारात्मक माहौल बना हुआ है लेकिन उन्हें इस भ्रम में नहीं पड़ना चाहिए कि यह जीत उनका करिश्मा है।

उन्हें अभी अपना करिश्मा दिखाना बचा है जिसमें उन्हें देश के उस आधे हिस्से में सहयोगी तलाश करना है जहां भाजपा का कोई नामलेवा नहीं है। उन्हें एनडीए तो पुनर्जीवित करने के लिए क्षेत्रीय दलों की जरूरत होगी।

क्षेत्रीय दलों की भूमिका
इन राज्यों के चुनावों में भले ही दिखता हो कि अकाली दल, बसपा और सपा जैसी पार्टियां अपने छोटा-मोटा जनाधार खो चुकी हैं लेकिन यह राष्ट्रीय दलों के लिए घातक आकलन होगा कि वे उन्हें हाशिए पर पड़ा मान लें।


वे अपने अपने राज्यों में बहुत मजबूत हैं। अब तो एक चुनौती यह भी है कि क्या होगा यदि दूसरे राज्यों में भी आम आदमी पार्टी का गठन हो जाए और वहां भी लोग उसे हाथों हाथ ले लें। उन्हें अनदेखा करना न मोदी के हित में होगा न राहुल के। आखिर वही तो यूपीए और एनडीए के तारणहार हैं।

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