जनरल का बयान: कुछ 'बाजारू' 'वेश्याओं' की पीड़ा
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पूर्व सेनाध्यक्ष और वर्तमान विदेश राज्यमंत्री वीके सिंह ने पत्रकारों को 'प्रेस्टिट्यूट' कह दिया। उन्होंने 'प्रोस्टिट्यूट' की तरफ इशारा भी किया। वे लंबे समय से पत्रकारों को यह तमगा दे रहे हैं। इससे पहले प्रधानमंत्री मीडिया के लिए 'बाजारू' शब्द का इस्तेमाल कर चुके हैं। लोकतंत्र का चौथा खंभा कहलाने वाले समाचार तंत्र के कामगारों के लिए लोकतंत्र के रक्षकों का यह बयान बहुत से लोगों को नागवार गुजरा है। अमर उजाला के छह पत्रकारों ने इस टिप्पणी पर अपने विचार लिखे हैं। आप भी पढ़िए और अपनी राय दीजिए---
दुखद है, पर आश्चर्यजनक नहीं
कल्लोल चक्रवर्ती
मीडिया को वेश्या (प्रेस्टिट्यूट) कहकर विदेश राज्य मंत्री जनरल विजय कुमार (वीके) सिंह ने दरअसल अपनी मानसिकता का ही परिचय दिया है। मीडिया को वेश्या कहकर उन्होंने उस पेशे का अपमान तो किया ही है, जिसे लोकतंत्र का चौथा खंभा कहा जाता है, उन असंख्य महिलाओं के बारे में भी उन्होंने अपनी सामंतवादी और पुरुषवर्चस्ववादी मानसिकता का परिचय दिया है, जो विवशता में देह व्यवसाय के धंधे में धकेल दी जाती हैं, और जिनका उद्धार करना हर सरकार का प्राथमिक कर्तव्य होना चाहिए।
पर जो लोग जनरल वीके सिंह को जानते हैं, उन्हें मीडिया को वेश्या (प्रेस्टिट्यूट) बताए जाने वाले उनके बयान पर बहुत हैरानी नहीं होनी चाहिए। भारतीय सेना जैसे अनुशासित संगठन में रहते हुए भी रिटायरमेंट के समय अपनी उम्र को लेकर उन्होंने तत्कालीन यूपीए सरकार से लड़ाई मोल ली थी। उपलब्धियों के तमाम तमगे उन्होंने अपने विवादास्पद बर्थ सर्टिफिकेट से ही लिए थे। लेकिन रिटायरमेंट के समय उन्हें अचानक अपनी उम्र एक साल कम लगी थी! भारत चूंकि एक लोकतंत्र है, इसलिए यहां सेना ने कभी सरकार से तकरार मोल नहीं लिया।
लेकिन बतौर सेनाध्यक्ष वीके सिंह को यह परंपरा तोड़ते हुए संकोच नहीं हुआ था। रिटायर होते समय उन्होंने दो वरिष्ठतम सेनाधिकारी बिक्रम सिंह और दलबीर सिंह सुहाग के खिलाफ टिप्पणियां की थीं। उनके खिलाफ उन्होंने जो आरोप लगाए थे, वे अदालत में गलत साबित हुए। हद तो तब हो गई थी, जब बतौर विदेश राज्यमंत्री उन्होंने जनरल दलबीर सिंह सुहाग की सेनाध्यक्ष के तौर पर नियुक्ति के खिलाफ ट्वीट कर दिया। ऐसा करके वस्तुतः वह अपनी सरकार के फैसले पर ही उंगली उठा रहे थे। यानी जनरल वीके सिंह को न सेना का अनुशासन बांध पाया, न सरकार में होते हुए सामूहिक जिम्मेदारी की भावना उन्हें जिम्मेदार बना पाई। ऐसा आदमी अगर आज मीडिया पर उलजुलूल टिप्पणी कर रहा है, तो यह दुखद भले हो, पर आश्चर्यजनक कतई नहीं है।
जहां तक मीडिया का सवाल है, उसने हर जरूरी मौके पर अपनी जिम्मेदारी समझी है। मीडिया के भीतर व्यक्तिगत तौर पर भले ही कुछ लोगों की नीयत पर सवाल उठाए जाएं, जैसा कि हर पेशे की सच्चाई है, पर सामूहिक तौर पर मीडिया ने हमेशा अपनी जिम्मेदारी का ईमानदारी से निर्वाह किया है और आगे भी करता रहेगा। यह मीडिया ही है, जो सरकार की उपलब्धियां सामने लाता है, और खतरा उठाकर उसकी कमियों के बारे में भी बताता है। मीडिया को इसका भी एहसास है कि पूर्ण बहुमत वाली एक ताकतवर सरकार अपनी प्रशंसा से अलग कुछ सुनना पसंद नहीं करती।
पर जरूरी यह है कि 'मिनिमम गर्वनमेंट, मैक्सिमम गवर्नेंस' का नारा देने वाली मोदी सरकार अपने उत्साही बयानवीरों पर अंकुश लगाए। हो सकता है कि दिखावटी 'खेद' प्रकट कर या मीडिया द्वारा 'बातों को तोड़-मरोड़कर पेश करने' के बहानों के जरिये इस विवाद को खत्म कर देने की कोशिश हो। संभव है, पूर्व सेनाध्यक्ष खेद प्रकट करने में विश्वास ही न रखते हों। पर अपने उत्साही मंत्रियों और सांसदों की निंदनीय टिप्पणियों पर रोक लगाने की शीर्ष स्तर पर अगर अभी से ठोस पहल नहीं की गई, तो पहले एक साल का रिपोर्ट कार्ड पेश करने जा रही सरकार की छवि खराब होते देर नहीं लगेगी।
मैं शर्मिंदा हूं जनरल!!!
विनोद वर्मा
जब मैं पत्रकार बना तो मेरे पिता के जहन में था कि मैंने कोई ऐसा पेशा अपना लिया है जिसमें आजीविका भी मुश्किल होगी। उन्होंने बहुत समय तक किसी को बताया नहीं कि मैं पत्रकार हो गया हूं। वे एक तरह से शर्मिंदा थे। वे आज मेरे बारे में और इस पेशे के बारे में ऐसा नहीं सोचते। वे शर्मिंदा तो हरगिज नहीं।
अपने पेशे को लेकर या इस पेशे के चयन को लेकर मेरे मन में आज भी कोई दुविधा नहीं है। लेकिन आज मैं शर्मिंदा हूं कि मेरे देश के सेना के प्रमुख पद पर रहा चुका एक जनरल और देश का एक मंत्री मेरे पेशे के बारे में ऐसा सोचता है। मेरे देश के प्रधानमंत्री के मन में पत्रकारिता को लेकर जो सोच है, मैं उससे भी शर्मिंदा हूं। शायद पूरी पत्रकार बिरादरी शर्मिंदा होगी।
जनरल वीके सिंह ने प्रेस्टिट्यूट (presstitute) शब्द का इस्तेमाल किया है और जिस तरह का इशारा उनके संदेश में है उसकी वजह से इसे प्रॉस्टिट्यूट (prostitute) शब्द से भी जोड़कर देखा जा रहा है। अगर उनका इशारा प्रॉस्टिट्यूट यानी वेश्या से नहीं भी रहा होगा तो भी प्रेस्टिट्यूट अपने आपमें बहुत अपमानजनक है।
प्रेस्टिट्यूट का अर्थ अगर शब्दकोश में लिखा है, 'ऐसा पत्रकार जो दुर्भावना के साथ या किसी खास पक्ष के लिए खबरें लिखता है'। यह एक जनरल (रिटायर्ड ही सही) की उस पेशे के बारे में सोच को दर्शाती है जिसे लोकतंत्र का चौथा खंभा कहा जाता रहा है। वह चौथा खंभा है या नहीं इस पर विवाद हो सकता है। लेकिन लोकतंत्र में पत्रकारिता के महत्व पर कोई विवाद न था और न रहेगा।
जनरल सिंह की टिप्पणी सच की जगह सोच को दर्शाती है। भारत के इतिहास के सबसे विवादित जनरलों में से एक रहे वीके सिंह आज से नहीं, बहुत लंबे समय से पत्रकारों से नाराज हैं। और वे लगातार इसी प्रेस्टिट्यूट शब्द का प्रयोग कर रहे हैं। यह उनकी सोच है कि पत्रकार दुर्भावना के साथ लिखते हैं या बोलते हैं। उनकी सोच है कि उन्हें कोई भी खरीद सकता है।
उनकी यह भी सोच है कि वे पैसों के लिए अपने आपको या अपने विचारों को बेच देते हैं। हो सकता है कि उनका साबका ऐसे दो चार पत्रकारों से पड़ा भी हो। आखिर राडिया टेप का उदाहरण भी तो है। लेकिन यह उनकी सोच है कि सारे पत्रकार उसी बिरादरी से हैं। वे किसी यूटोपिया में हैं जहां उनका किसी श्रमजीवी पत्रकार से पड़ा नहीं है। या फिर यह उनकी खीज है जो किसी श्रमजीवी पत्रकार से टकरा जाने के बाद पैदा हुई है।
हो सकता है कि जनरल सिंह को अपने प्रधानमंत्री से (जो संयोगवश मेरे भी प्रधानमंत्री हैं) प्रेरणा मिली हो जो मीडिया को बाजारू कह चुके हैं। नरेंद्र मोदी भी, हो सकता है कि अपने अनुभव से यह बात कह रहे हों। हो सकता है कि उन्हें अपने चुनाव अभियान के दौरान इसका अच्छा बुरा अनुभव हुआ हो। लेकिन उनका यह बयान तब नहीं आया था जब मीडिया उनके नाम की माला जप रही थी। यह बयान तब आया जब लव जेहाद से लेकर चार बच्चे पैदा करने के बयान पर सवाल उठने लगे। उनसे उनकी सरकार के कामकाज का हिसाब मांगा जाने लगा।
चाहे वो प्रधानमंत्री हों या फिर उनके जनरल मंत्री, दोनों की बातों से यह साफ जाहिर है कि वे लोकतांत्रिक ढांचे के किसी संस्थान के बारे में क्या सोचते हैं। जिस समय वे मीडिया की बात कर रहे होते हैं तो उन्हें याद रखना चाहिए कि पत्रकार और मीडिया संस्थानों के मालिकों के बीच बहुत फर्क है। धीरे-धीरे सारे उद्योगपति और कारोबारी मीडिया कंपनियों के मालिक हो जाना चाहते हैं। वो हो भी रहे हैं। उन्होंने बहुत से पत्रकारों को नौकरियां दी हुई हैं। लेकिन जरूरी नहीं कि मंत्रियों और संत्रियों से टकराने वाले मीडिया संस्थानों के मालिकों की तरह उनके यहां नौकरी करने वाले पत्रकार भी बिकाऊ हों।
मैं शर्मिंदा हूं जनरल। और आपको मुझे अपमानित करने का कोई हक नहीं।
जनरल हम 'वेश्या' ही सही
सुदीप ठाकुर
अमेरिका के विवादास्पद लेखक और नए रुझानों का आंकलन करने वाले गेराल्ड सेलेंट ने अमेरिकी सरकार और कॉरपोरेट की तरफदारी करने वाले मीडिया पर आक्षेप करते हुए कुछ वर्ष पूर्व अंग्रेजी का एक नया मिश्रित शब्द ईजाद किया था- प्रेस्टिट्यूट (Presstitute)। यह शब्द प्रेस (Press) और प्रॉस्टिट्यूट (Prostitute) से मिलकर बना है। ऑन लाइन शब्दकोषों में इसका अर्थ कुछ इस तरह से है कि ऐसे पत्रकार जो किसी वित्तीय हितों या किसी व्यक्ति या समूहों को लाभ पहुंचाने के लिए अपनी स्टोरी या कहानियों में बदलाव कर देते हैं। इसकी एक व्याख्या इस तरह भी की गई है कि ऐसे पत्रकार, जो पत्रकारिता के अपने उत्तरदायित्व को नजरंदाज कर सरकार और कॉरपोरेट के हित में काम करते हैं।
विदेश राज्य मंत्री और पूर्व सेनाअध्यक्ष जनरल वी के सिंह ने अपने एक विवादास्पद ट्वीट में एक पत्रकार के लिए प्रेस्टिट्यूट का इस्तेमाल करते हुए परोक्ष रूप से पत्रकारों को प्रॉस्टिट्यूट यानी वेश्या करार दिया है। मेरी चिंता जितनी पत्रकारिता को लेकर है, उससे कहीं अधिक एक पत्रकार होने के नाते उन महिलाओं को लेकर है, जिन्हें बेहद मजबूरी में वेश्यावृत्ति से जुड़ना पड़ता है।
इस टिप्पणी से पत्रकारिता के साथ ही वेश्यावृत्ति के प्रति जनरल सिंह की मानसिकता का भी पता चलता है, जो शायद अधिसंख्यक पुरुष वर्ग की मानसिकता भी है। पता नहीं उन्हें इस बात का एहसास है या नहीं कि उन्होंने अपनी इस टिप्पणी से महिलाओं का भी अपमान किया है। दुनिया के कई देशों में वेश्यावृत्ति को एक वैध पेशे के तौर पर स्वीकार कर लिया गया है। भारत में वेश्यावृत्ति को वैध करने का मामला सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंचा है। लेकिन चूंकि हम जिस 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' के दौर में रहे हैं और आप जिस राजनीतिक दल से ताल्लुक रखते हैं उसका नजरिया इसे लेकर बेहद संकुचित है तो लगता नहीं कि इसे वैध रूप मिल पाएगा। जनरल साहब आपकी जानकारी के लिए हमारे देश में 30 लाख से अधिक सेक्स वर्कर बेहद नारकीय परिस्थितियों में जीवन यापन को मजबूर हैं। उनकी अपनी कोई सामाजिक पहचान तक नहीं है। यदि पत्रकारिता के रूप में आप उन्हें कोई पहचान देना चाहते हैं, तो मुझे सहस्र स्वीकार है।
याद तो नहीं आ रहा है, लेकिन एक कहानी मैंने पढ़ी थी, जिसमें एक वेश्या अपने ग्राहक से कहती है, जिस्म का सौदा किया है ईमान का नहीं। रही बात पत्रकारिता की तो इसमें गिरावट आई है, उससे कौन इनकार कर रहा है। लेकिन इतनी गिरावट तो आपकी राजनीति और दूसरी संस्थाओं में भी आई है। यह नहीं हो सकता कि जब तक आपका गुणगान करे तब तक सब कुछ अच्छा। मैं समझ सकता हूं कि सार्वजनिक जीवन में आपको अधिक दिन नहीं हुए हैं, लिहाजा आपको आलोचनाएं सुनने की आदत नहीं है। मंत्रिमंडल में अब आपको सालभर हो रहे हैं, लिहाजा आपको सामूहिक जिम्मेदारी जैसी चीजें भी सीखनी चाहिए।
राहत की बात यह है कि आपकी सरकार और आपकी पार्टी ने खुलकर आपके समर्थन में कुछ नहीं कहा है। अच्छा होता कि आप खुद अपना यह बयान वापस ले लेते। कम से कम उन महिलाओं के सम्मान में तो आपको ऐसा करना ही चाहिए जिनके पेशे पर आपने सवाल उठाया है।
बड़बोले जनरल, मीडिया...और वेश्या
भूपेंद्र सिंह
शायद 20-22 साल पुरानी बात होगी। राजधानी दिल्ली और लखनऊ से एक नया अखबार शुरू हुआ था, सेवा शर्तें अच्छी थीं, हमारे जैसे नौजवान पत्रकारों को लगता था कि इससे बेहतर जगह शायद नहीं हो सकती, जहां हम अपने मन का काम कर पाएंगे। कुछ साथी इंटरव्यू देने गए। बोर्ड में चार लोग, जिनमें एक पुराने पत्रकार और संपादक, दूसरे जीएम और दो मालिक।
-बड़े मालिक का पहला सवाल, तो आप पत्रकारिता में क्यों आना चाहते हैं?
-जवाब, पत्रकारिता एक मिशन है जिसके जरिये हम देश सेवा कर सकते हैं समाज की बेहतरी के लिए काम कर सकते हैं और लोगों के दुख दर्द को उजागर कर सकते हैं।
-मालिक-तो यह कुछ समाजसेवा जैसा है जो आप करना चाहते हैं और मिशन का भाव भी है।
-जवाब-जी हां।
-मालिक-तो हमारा सोशल विंग है, जहां आप बिना वेतन के काम कर सकते हैं, मिशन है तो पैसा तो नहीं चाहिए आपको।
-इसके बाद चुप्पी छा जाती है। नहीं सर, पैसा तो चाहिए।
-मालिक-तो फिर बोलिये नौकरी करना चाहते हैं पैसे के लिए।
उन सपनों से अलग जो पत्रकारिता की क्लास में सीखे थे, यह बदलते मीडिया का पहला सच था जिससे हमारा साबका पड़ा। अब जनरल सिंह जो कह रहे हैं उसकी विडंबना दूसरी है। कोई भी पत्रकार जानता है कि कारपोरेट दबाव में मन का काम मुमकिन नहीं। लेकिन फिर भी अगर उसकी एक स्टोरी से किसी के चेहरे पर मुस्कान आती है तो यह उसकी संतुष्टि है। बड़बोले जनरल शायद खुद भी नहीं जानते वे क्या कह रहे हैं। मीडिया को बुरा कहने के लिए जो शब्द उन्होंने चुना वो महिलाओं के लिए कितना आहत करने वाला है इसका उन्हें एहसास नहीं। इससे उनकी सोच जाहिर होती है कि वे विचार के तौर पर हल्के हैं जो उन्होंने अपनी कार्यशैली से अब तक जाहिर किया भी है। हां...हम पत्रकार भी कम आहत नहीं हुए लेकिन ऐसा तो हमारे पेशे का हिस्सा है। दबाव...अपमान...कम वेतन..डेडलाइन...विज्ञापन...सर्कुलेशन...इवेंट प्लानिंग। तो फिर भी हम यहां क्यों? बस एक संतोष कि एक चेहरे पर मुस्कान तो इन सारे विपरीत हालात के बावजूद भी ला सकते हैं।
न वेश्या ने पहली बार ऐसा दंश झेला है और न ही मीडिया ने
विनोद अग्निहोत्री
विदेश राज्य मंत्री जनरल वी केसिंह ने मीडिया की नई परिभाषा दी है। उन्होंने उसे प्रेस्टिट्यूट यानी वेश्या केलिए अंग्रेजी में प्रयुक्त प्रोस्टिट्यूट शब्द से मिलते जुलते जुमले का इस्तेमाल करके दोनों की श्रेणी एक कर दी है। उनके मुताबिक देह बेचने वाली वेश्या और खबर बेचने वाला मीडिया एक ही कोटि का है।
हालांकि जनरल साहब ने मीडिया को वेश्या जैसा बताकर अपना गुस्सा और भड़ास निकाली है। लेकिन जाने अनजाने वह एक कड़वा सच भी बयां कर गए। आदिकाल से वेश्या की देह का उपभोग करने वाले उसे संसार की सबसे सुंदर और अपनी प्रियतमा का तमगा देकर अपना मतलब साधते हैं और काम निकल जाने के बाद उसे समाज का कलंक बताने में भी देर नहीं करते। लाचारी, बीमारी और अनचाही संतान का बोझ लिए वेश्या को भाग्य के भरोसे छोड़ दिया जाता है। वैशाली की नगरवधू से लेकर वर्तमान शहरों की रेडलाईट बस्तियों की यही दास्तान है।
कुछ ऐसा ही दर्द उन कथित वेश्याओं का भी है जो देह की जगह खबर बेचती हैं यानी वी.के. सिंह प्रेस्टिट्यूट मीडिया। जब जरूरत होती है तो यही प्रेस्टिट्यूट लोकतंत्र का चौथा खंभा, अभिव्यक्ति की संवैधानिक स्वतंत्रता का वाहक और न जाने क्या क्या होता है। इसकी निर्बाध स्वतंत्रता की दुहाई देकर अपने मतलब साधे जाते हैं।
अपनी दोहरी जन्मतिथि के विवाद को लेकर अपनी ही सरकार के खिलाफ अदालत जाने वाले तत्कालीन सेनाध्यक्ष से बेहतर इसे कौन समझ सकता है। जो यूपीए सरकार पर हमले के लिए मीडिया रूपी कथित प्रेस्टिट्यूट का सबसे बड़ा चहेता था। उसी प्रेस्टिट्यूट के अनुग्रह ने एक विवादित सेनाध्यक्ष को जिसकी बर्खास्तगी की मांग भाजपा के राज्यसभा में तत्कालीन नेता विपक्ष अरुण जेटली ने की थी, आज उसी भाजपा की सरकार में मंत्री पद दिलाया और अब जिसे वेश्या और कलंकिनी कहकर जनरल साहब समाज की नजरों से गिराना चाहते हैं।
न वेश्या ने पहली बार ऐसा दंश झेला है और न ही मीडिया ने। दोनों की यह शाश्वत नियति है। इसलिए तमाम दर्द सहते हुए भी वेश्या समाज की यौन कुंठाओं का निस्तारण करती रहती है और कथित प्रेस्टिट्यूट मीडिया तमाम हमले और आरोप झेलते हुए सिंहों और गीदड़ों दोनों के निशानों का सामना करता रहता है।
जनरल साहब! वेश्या है, तो ग्राहक भी होंगे?
अवनीश पाठक
जनरल साहब! मान लिया कि हम प्रेस्टिट्यूट (वेश्या) हैं। न हमें सवाल करने का हक है, न जवाब पाने का।
एक मामूली सी जिज्ञासा है, बस वही शांत कर दीजिए। जिज्ञासा बस यह है कि वेश्या तो वही होगी, जहां ग्राहक होंगे? ग्राहक न हो तो वेश्या की चौखट पर दिया न जले। शाम गुलजार होने की बात ही छोड़ दीजिए।
मुझे अब भी याद है पत्रकारिता की कक्षा में प्रोफेसर ने पूछा था, आपमें से कितनों ने मैनेजमेंट की परीक्षाएं दी हैं? अधिकांश ने 'हां' में जवाब दिया था। चंद ऐसे भी थे, जिन्होंने पत्रकारिता को ही रोजी-रोटी का जरिया या कह लें पेशा बनाने की सोची थी।
21वीं सदी का पहला दशक धीरे-धीरे आधी उम्र पूरी कर रहा था। अखबारों के काले-सफेद दायरों में से बाहर निकलकर पत्रकारिता कैमरों की रील पर दौड़ रही थी। तेज, सबसे तेज, सबसे ज्यादा तेज खबरों का दौर था। पत्रकारिता ग्लैमर हो चुकी थी और पत्रकार सेलिब्रिटी।
खबरें क्या थीं, ये पता नहीं था? कोई बताता, हर वह चीज जो जिज्ञासा जगाए, वह खबर है। कोई कहता, जिससे समाज के बड़े हिस्से का भला हो, वह खबर है। कोई और भी बहुत कुछ कहता। लोग न जाने क्या-क्या कहते।
सबसे तेज चैनल जो दिखा रहे थे, उससे ये तय कर पाना और मुश्किल हो जाता कि खबर क्या है? बच्चा गड्ढे में गिर जाता, गाय के रंभाने में सितार के सुर सुनाई देते। ये सब खबरें थीं। उन्हीं शोर-शराबों के बीच किसी ने बताया कि हुक्मरानों के फैसलों पर सवाल उठाना, बयानों का मतलब ढूंढ़ना, कामकाज पर नजर रखना भी खबर है। बताने वाले का चेहरा याद नहीं रहा, लेकिन बात दिमाग में पैबस्त हो गई।
अपने शहर से बाहर काम करने का पहला मौका मुझे मध्य प्रदेश के एक शहर में मिला। एक ऐसा शहर जहां के लोग भी नए थे और राजनीति भी। व्यवस्था भी और संबंध भी। तमाम नएपन के बाद भी खबरों को समझने का मेरा ढर्रा वही पुराना था।
हालांकि वह ढर्रा बहुत दिनों तक चल नहीं पाया। बहुत जल्दी मुझे अपनी समझदारी को 'सेलेबल' बनाना पड़ा। जनरल साहब! आपकी जुबान में कहूं तो मेरी समझदारी की नथ उतार ली गई।
दरअसल समझदारी को 'सेलेबल' बनाने की समझ एक खबर ने दी थी। चुनावी रंजिश के किसी पुराने मामले में राज्य सरकार के एक आला मंत्री की भूमिका पर अदालत ने फैसला दिया था। फैसला क्या था, जिक्र करना गैरजरूरी है।
पुरानी समझ के नाते हुक्मुरानों की 'करतूत' भी खबर थी। हालांकि वह खबर अखबार के पन्ने पर उतर पाती, उससे पहले मंत्रीजी की ना जाने कितनी आकाशवाणियां दफ्तर में गूंजने लगीं। दफ्तर के सबसे बड़े कमरे से छन कर आवाजें आतीं और खबर की दो पंक्तियां कम हो जातीं। शायद तीन चार आवाजें आई रही होंगी और खबर अदृश्य हो गई। बाद में खबर और संबंध दोनों की कीमत तय होने की खबर भी आई।
खरीदारी हुई थी और किसी ने खरीदा था। जिसे खरीदा गया, वह क्या है? हम जानते हैं। लेकिन जिसने खरीदा वह क्या था, जनरल साहब क्या आप बता सकते हैं?
बाद के दिनों में धंधे के ऐसे कई गुरों को देखने का मौका मिला। खरीदारों की लंबी कतार भी देखी। मीडिया अपने रंग और रूप बदलता रहा। टीवी के दौर से निकलकर इंटरनेट के रास्ते मोबाइल तक मीडिया आ गया।
खबरों के धंधे में अपनी तमाम समझदारियों में काट-छांट के साथ अब तक हूं, इसलिए कह सकता हूं कि खरीदने वालों की कमी नहीं हुई, हालांकि सभी बिके नहीं। एक दावा और कर सकता हूं कि खरीदने वाला कभी आम आदमी नहीं रहा।
वेश्या तो हुक्मरानों ने ही बनाया।