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धर्म और राष्ट्र पर क्या कहता है संघ?

Sun, 12 Oct 2014 12:00 PM IST
एमजी वैद्य/संघ के वरिष्ठ विचारक
एमजी वैद्य/संघ के वरिष्ठ विचारक Updated Sun, 12 Oct 2014 12:00 PM IST
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what are the religion and nation acording to rss.

राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ अपनी हर तकरीर में राष्ट्र की बात करता है।

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क्या हैं संघ के लिए राष्ट्र की अवधारणा? क्या संघ की राष्ट्र और राज्य की संकल्पना वही है जो राजनीति शास्त्र की किताबें हमें बताती है।

संघ के राष्ट्र और राज्य की अवधारणा पर प्रकाश डाल रहे हैं संघ के वरिष्ठ विचारक एमजी वैद्य।

हमें राष्ट्र और राज्य इन दो अवधारणाओं में अंतर करना चाहिए। 'राज्य' एक राजकीय व्यवस्था है, जो कानून के बल पर चलती है और कानून को प्रभावी बनाने के लिए उसके पीछे दंड देने की शक्ति रहती है।

राष्ट्र यानी लोग होते हैं, लोगों का 'राष्ट्र' बनने के लिए तीन प्रधान शर्तें हैं।

1) जिस भूमि पर लोग रहते हैं, उस भूमि के प्रति उनकी भावना। उनको अपनी भूमि माता के समान पवित्र और वंदनीय लगनी चाहिए। वह 'मातृभूमि' होनी चाहिए।

2) लोगों का एक इतिहास होता है। इतिहास की घटनाएं जैसे आनंद देने वाली होती हैं, वैसे ही दु:खदायी भी होती हैं। ये घटनाएं विजय की होती हैं, तो पराजय की भी होती हैं। जिनको ये अपने इतिहास की घटनाएं लगती है, उनका राष्ट्र बनता है।

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'हिंदू मजहब नहीं है'

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3) तीसरी और सबसे महत्वपूर्ण शर्त है जिनकी मूल्य-अवधारणा यानी वैल्यू सिस्टम समान होता है, और इस मूल्य-अवधारणा से, जिनके अच्छे या बुरे ठहराने के मापदंड समान होते हैं, उनका राष्ट्र बनता है। यह मूल्य-व्यवस्था ही संस्कृति होती है।

ये जो लोग हैं, उनका नाम हिंदू है। इसलिए यह हिंदू राष्ट्र है। संघ के नाम में ही 'राष्ट्रीय' शब्द है। वह केवल राष्ट्र की चिन्ता करता है।

यहां यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि 'हिंदू' मजहब नहीं। अनेक मजहबों का संघ है। 'धर्म' का अंग्रेज़ी में 'रिलिजन' या 'मज़हब' ऐसा अनुवाद करने के कारण ही अनेक गलत धारणाएं बनी हैं।

अपनी भाषा के कुछ शब्द ही लीजिए, 'धर्मशाला' क्या यह धार्मिक स्कूल होता है?, 'धर्मकांटा' क्या इस पर मज़हबों का तौल होता है?, 'राजधर्म' क्या यह राजा का धर्म है जो प्रजा का नहीं है।

'धर्म' शब्द के अर्थ की सम्यक व्याख्या करने के लिए एक विशेष लेख ही लिखना पड़ेगा।

कहने का सारांश यह है कि 'हिंदू' मजहब नहीं। वह एक मूल्य-व्यवस्था का वाचक है। मतलब यह संस्कृति का बोधक है।

इस व्यवस्था में विविधता, फिर वह विविधता ईश्‍वर के नाम की हो, उसके उपासना के आकार प्रकार की हो, या उसके लिए बनाए गए पूजास्थल या प्रार्थना स्थल की हो, का सम्मान है। यही हिंदू संस्कृति है। इसी का नाम हिंदुत्व है।

वास्तविक सेक्युलरिज्म क्या है?

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नरेन्द्रभाई मोदी की सरकार राज्य का विषय है। वह राज्य चलाने के लिए स्वतंत्र है। अपने गणराज्य का एक संविधान है। उसके प्रावधानों के अनुसार वह अपना व्यवहार करेगा।

देश की सुरक्षा का ख्याल रखेगा। सार्वजनिक जीवन में व्याप्त भ्रष्टाचार को बर्दाश्त नहीं करेगा। उसकी न्याय व्यवस्था स्वतंत्र और स्वच्छ होगी। यह हिंदुस्तान यानी हिंदुओं की बहु संख्या वाला देश है, इसलिए तो यहां लोकतंत्र है। 'राज्य' का संबंध पारमार्थिक संकल्पनाओं से नहीं रहता। नहीं रहना चाहिए।

इसलिए राज्य ‘ऐहिक’ यानी सेक्युलर ही रहेगा। राज्य का कोई अधिकृत मजहब नहीं रहेगा। अत: वह सर्व पंथ निरपेक्ष ही रहना चाहिए। हिंदुओं को धार्मिक राज्य (थियोक्रेसी) मान्य नहीं।

अपने अड़ोस पड़ोस के देशों में लोकतंत्र स्थिर क्यों नहीं हुआ। कारण वहां हिंदू बहु संख्या में नहीं हैं।

भारत के संविधान में 1976 में 'सेक्युलर' शब्द अंतर्भूत किया गया है। किन्तु अपना राज्य 1976 में 'सेक्युलर' नहीं बना। पहले से ही 'सेक्युलर' था।

आज जो अनेक दल सेक्युलरिज्म का नारा लगाते हैं, वे सही अर्थ में 'सेक्युलर' नहीं। क्योंकि मजहब को ध्यान में रखकर वे अलग कानून और अलग व्यवस्थाओं के पक्षधर हैं।

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सरकार के साथ संघ का संबंध

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नरेन्द्रभाई मोदी संघ के पुराने कार्यकर्ता हैं। कई वर्षों तक संघ के पूर्णकालिक प्रचारक भी रहे हैं। वे इन सब मुद्दों के जानकार है।

राष्ट्र की अवधारणा के संबंध में ऊपर जो बताया गया है, मोदी उसे जानते हैं। संघ को अलग से बताने की आवश्यकता ही नहीं हैं। कुछ विषयों पर परामर्श की आवश्यकता हो सकती है, तो वे संघ के अधिकारियों से संपर्क कर सकते हैं।

संघ की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा में सारे संघ प्रेरित संगठनों के प्रतिनिधि उपस्थित रहते हैं। भाजपा के भी रहते हैं। अब इस संबंध को प्रत्यक्ष रूप से कहें या अप्रत्यक्ष रूप से कहें, यह आप ही तय कीजिए।

बात चलती है कि संघ का रिमोट कंट्रोल रहता है। जब कंट्रोल करने की ही मंशा नहीं, तो रिमोट क्यों?

संघ की इच्छा और नीति होती तो प्रत्यक्ष रूप से भी कंट्रोल हो सकता है। लेकिन संघ की ना ऐसी इच्छा है, ना नीति।

संघ को लेकर गलत धारणाएं

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सभी संगठन स्वतंत्र और स्वायत्त हैं। सभी में संघ के कार्यकर्ता, कम-ज्यादा संख्या में क्यों न हो, उपस्थित हैं।

वे जानते हैं कि राष्ट्रीय जीवन में संघ को क्या अभिप्रेत है। किस व्यक्ति को मंत्री बनाएं, किसको कौन सा विभाग दें, किन को उम्मीदवार बनाएं, यह संघ नहीं बताता।

यह भाजपा का विषय है और उसके लिए वह स्वतंत्र है। संघ के संबंध में ये मौलिक बातें हम समझ लेंगे तो ग़लत धारणाओं के लिए स्थान ही नहीं रहेगा।ं

फिर हमारा मीडिया अपनी मर्जी से या पूर्वाग्रह से जो भी कहना और लिखना है, उसके लिए स्वतंत्र है। आजकल पूरे देश में राजनीति हावी हुई है।

इसलिए राजनीति के बारे में ही सवाल खड़े किए जाते हैं। धर्म का क्षेत्र, शिक्षा का क्षेत्र, वनवासियों का क्षेत्र- इन में भी संघ के कार्यकर्ता सक्रिय हैं लेकिन इनकी बात नहीं होती।

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