कैसा रहा मोदी सरकार का एक महीना?
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को केंद्र सरकार का मुखिया बने एक महीना हो चुका है। लेकिन अब भी वह 'हनीमून पीरियड' के दौर से ही गुज़र रहे हैं। एक ऐसा दौर जिसमें मतदाता नई सरकार को समय और चीज़ों को समझने का मौका देते हैं।
उम्मीदें फिर भी बहुत ज़्यादा हैं लेकिन उनकी मांग अभी मंद है। इस दौर में एक क़िस्म की समझदारी और धैर्य है।
आइए, इस बात को समझने की कोशिश करें कि पिछले महीने की घटनाओं से मोदी ने अभी तक क्या सफलताएं अर्जित की हैं और इस छोटे से अंतराल के आधार पर वह आगे कैसे बढ़ेंगे, इस पर भी विचार करें।
अधिकारियों को मिली ताकत
सामान्य रूप से कहा जाए तो मोदी ने काम करने की अपनी पुरानी शैली को जारी रखना ही पसंद किया है। एक ऐसी शैली जो प्रशासन को राजनीतिज्ञों की बजाए नौकरशाहों के सहारे चलाने की समर्थक है।
वरिष्ठ अधिकारियों, ख़ासकर विभागों का नेतृत्व करने वाले सचिवों से कहा जा रहा है कि वे निडर होकर काम करें।
उन्हें आश्वस्त किया जा रहा है कि मोदी उनके फैसलों के साथ खड़े होंगे और उनसे यह भी कहा जा रहा है कि किसी समस्या के आने पर वे उनसे सीधे मिल सकते हैं। इस 'समस्या' का आशय उनके विभागों के मंत्री हैं।
ये वही तरीक़ा है जिस तरीक़े से उन्होंने गुजरात चलाया और उनकी व्यक्तिगत लोकप्रियता व स्पष्ट बहुमत का मतलब है कि मंत्रियों को दिल्ली में इसकी आदत डाल लेनी होगी।
मोदी स्टाइल की शिक्षा
उनके मंत्रियों को भी मोदी के शासन करने की शैली के अन्य पहलुओं के बारे में शिक्षा दी जा रही है। वह मंत्रियों से अपने 100 दिन के कार्यकाल का समयबद्ध और नतीजा दिखाने वाला एजेंडा तय करने को कह चुके हैं।
मोदी के कार्यकाल का पहला संकट बहुत छोटा था और उससे बचा जा सकता था। मोदी ने जब विदेशी नेताओं से बात करने में अंग्रेज़ी की बजाए हिंदी को चुना तो बहुतों ने उनकी तारीफ़ की थी।
यह अजीब था क्योंकि वह अच्छी तरह अंग्रेज़ी नहीं बोल सकते और अनिवार्य रूप से हिंदी ही बोलते हैं जब तक कि वह गुजराती बोलने पर न उतर आएं।
यूट्यूब पर मोदी का नया रूप
यूट्यूब पर मौजूद उनके पेटेंट वाइब्रेंट गुजरात की बैठकों में उनका एक वीडियो देखते हुए इसे आसानी से समझा जा सकता है।
इसमें वह अंग्रेज़ी बोलने की कोशिश करते हैं और आशावाद (ऑप्टिमिस्टिक) व निराशावाद (पेसीमिस्टिक) में गड़बड़ा जाते हैं। वह ख़ुद को निराशावादी व्यक्ति कहते हैं जबकि उनका असली मतलब इसका बिल्कुल विपरीत होता है।
और इसलिए ज़रूरत के मुताबिक एक गुण पैदा कर लिया गया। मीडिया की प्रतिक्रिया से उत्साहित मोदी ने अपने अधिकारियों को आदेश दिया कि वे भी हिंदी का इस्तेमाल करें।
एक वरिष्ठ नौकरशाह ने इसे सोशल मीडिया तक खींच दिया। इसकी तत्काल प्रतिक्रिया तमिलों समेत मोदी के सहयोगियों की ओर से भी आई। उन्होंने मांग की कि इस आदेश को वापस लिया जाए।
संबंधों में लचीलापन
इस मुद्दे पर केंद्र सरकार का पीछे हटना यह दिखाता है कि मोदी का रुख़ लचीला था और इस पूरी घटना को ऐसे लिया गया जैसे कुछ हुआ ही न हो।
लोच अच्छी बात है और शानदार बहुमत के बावजूद मोदी को भविष्य में इसकी ज़रूरत पड़ेगी।
दूसरा संकट इराक़ में भारतीयों के अपहरण के साथ आया। इस बार भी मोदी ने बहुत ही बुद्धिमत्ता से काम लिया।
जिस तरह उन्होंने चुनाव प्रचार किया उससे अलग उन्होंने बेवजह मर्दानगी और राष्ट्रवादी शब्दाडंबर से ख़ुद को दूर ही रखा और कठिन परिस्थितियों को कैसे सुलझाया जाए, इसका वह अध्ययन कर रहे हैं।
प्रधानमंत्री के प्रदर्शन से शेयर बाजार में तेजी
प्रधानमंत्री के प्रदर्शन से शेयर बाज़ार प्रसन्न बना हुआ है और तेल को लेकर इराक़ से आने वाली बुरी ख़बरों के बावजूद उनकी नीतियों और मंशाओं को आम तौर पर सकारात्मक लिया जा रहा है।
यह इसलिए है क्योंकि वित्त मंत्री अरुण जेटली वही बातें कर रहे हैं जो बाज़ार सुनना चाहता है। यह इसलिए है कि बजट राजकोषीय मजबूती और घाटे को कम करने पर केंद्रित होगा।
इसका एक संकेत तो तभी आ गया था जब मोदी ने रेलवे किराए में वृद्धि की, जिसे कांग्रेस सरकार वापस ले चुकी थी। इस फैसले को बिना विपक्ष से सलाह-मशविरे के पास कर दिया गया।
गलतियां और उनसे सबक
गृह मंत्रालय में डेढ़ लाख पुरानी फाइलों को नष्ट करने के उनके आदेश के बाद उनकी बेहिचक प्रशासक की छवि और निखर गई।
और सबसे आख़िरी बात। मोदी ने सूचनाओं को जारी करने पर कड़ा नियंत्रण रख रखा है। मंत्री और सचिव उनकी नाराज़गी से इतने डरे हुए हैं कि पूरी तरह चुप्पी साध ली है। पार्टी नेताओं को भी संदेश पहुंच चुका है और वे भी बहुत ज़्यादा नहीं बोल रहे।
कुल मिलाकर, यह कहा जा सकता है कि प्रधानमंत्री के तौर पर मोदी का पहला महीना बहुत ही शानदार रहा। उन्होंने बहुत कम ग़लतियां कीं और जहां भी वह लड़खड़ाए जल्दी ही संभल गए।
हालांकि, उनकी सरकार की ओर से बड़े सवालों पर जवाब आना अभी बाकी है। नवाज़ शरीफ़ से शांति प्रक्रिया पर आगे बढ़ने की बात करने के बाद मोदी को अब भी विदेश सचिवों से बैठक करनी है।
और सबसे महत्वपूर्ण बात- क्या वह यूपीए सरकार की कल्याणकारी योजनाओं को ख़त्म कर देंगे? दो सप्ताह में आने वाले केंद्रीय बजट से जल्द ही हमें इसका जवाब भी मिल जाएगा।