अ'जीत' या हारः वेस्ट यूपी में जाट किसे बनाएंगे चौधरी?
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दिल्ली की गद्दी का रास्ता मुहैया कराने वाले उत्तर प्रदेश के पूर्वी छोर पर इन दिनों सबसे बड़ा मुकाबला जारी है। नरेंद्र मोदी और अरविंद केजरीवाल बनारस से मैदान में हैं। सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव आजमगढ़ से उतरकर अपना सियासी खेल बचाना चाहते हैं और कांग्रेस भी पूर्वांचल की सीटों पर पूरा जोर लगा रही रही है। ऐसे में बसपा और दूसरे स्थानीय उस्तादों को नजरअंदाज करना भी भूल होगी।
ऐसे वक्त जब उत्तर प्रदेश की सियासी सुर्खियों का ध्रुवीकरण पूरब में हो रहा है, राज्य का पश्चिमी छोर भी एक दिलचस्प राजनीतिक इबारत गढ़ रहा है। गेंहू और गन्ने की खेती, अक्खड़ बोली, फक्कड़ अंदाज और जातीय समीकरण की सियासत समझने वाला यह इलाका इस बार क्या गुल खिलाएगा, अंदाजा लगाना मुश्किल हो गया है।
उड़ी हुई है अजीत की नींद
पश्चिमी उत्तर प्रदेश ऐसा किला है, जहां हाल तक एक चौधरी की चौधराहट चलती थी। लेकिन बदलते राजनीतिक माहौल में वोटर किसी सीट पर किसके सामने का बटन दबा दे, यह कहा नहीं जा सकता। यही वजह है कि न इन दिनों राष्ट्रीय लोकदल के अध्यक्ष अजीत सिंह को नींद नहीं आ रही है। हालांकि, अपनी तरफ से उन्होंने तैयारियों में कोई कसर नहीं छोड़ी है, लेकिन मुजफ्फरनगर दंगों की आंच से उठे धुएं में उन्होंने यह पढ़ लिया है कि इस बार वोटों का ध्रुवीकरण हुआ, तो जाट वोट भाजपा के पाले में जा सकते हैं।
अजीत सिंह ने लोकसभा चुनाव में जीत तक पहुंचने के लिए कांग्रेस से हाथ मिला लिया है। किसी वक्त सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव का दाहिना हाथ रहे अमर सिंह को अपनी भुजा बना लिया है। अमर के साथ ग्लैमरस चेहरा जयाप्रदा भी उनके पाले में हैं। और जाते-जाते यूपीए सरकार ने भी इस इलाके के लिए अपना तुरुप का इक्का फेंक दिया है। अजीत को उम्मीद है कि जाटों को जो आरक्षण दिया, उससे थोक में वोट का इंतजाम होगा।
पश्चिम के मुद्दों पर सियासत
सवाल यह है कि क्या ऐन चुनावों से पहले खेला गया जाट आरक्षण का दांव आरएलडी की फसल बचा और बढ़ा पाएगा? राजनीतिक विरोधी अजीत को मौकापरस्त नेता बताते हैं और जनता के बीच यह संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं कि वो, जाटों या किसानों के लिए नहीं बल्कि मंत्री पद के लिए राजनीति करते हैं। यही आलोचना इस सवाल का आकार और बढ़ा देती है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि हरित प्रदेश का मुद्दा उनके हाथ से फिसल रहा है। उनके बेटे जयंत चौधरी वेस्ट यूपी के वोटरों को लुभाने के लिए तेलंगाना की तर्ज पर आंदोलन की बात करते हैं, जोश भी भरते हैं, लेकिन यह जोश मतदान की तारीख तक कायम नहीं रह पाता। अरसा गुजर गया, लेकिन अजीत सिंह की तरफ से जाट आरक्षण के लिए किसी बड़े आंदोलन की नींव नहीं रखी गई। कांग्रेस ने अपने अंतिम दिनों में जाट आरक्षण का जो दांव खेला, उसमें अजीत की कम और उसकी अपनी चिंता ज्यादा दिखती है।
पिता के नाम का फायदा
जाट आरक्षण के मुद्दे पर अजीत के ढीले रुख का फायदा यशपाल मलिक ने उठाया और उसके सहारे अपना कद बढ़ाने में कामयाब रहे। हालांकि, ऐसा नहीं है कि जाट अजीत से मुंह मोड़ चुके हैं और किसी भी कीमत पर उनका साथ देने को तैयार नहीं। जमीनी स्तर पर देखें, तो जाट अब भी उनकी तरफ खड़े दिखते हैं और इसकी एक वजह उनके पिता चौधरी चरण सिंह हैं।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश की जमीन उपजाऊ होने के साथ-साथ थोड़ी सी अक्खड़ मानी जाती है। कहा जाता है कि यहां के लोग अपनी बातों से बहुत कम ही पीछे हटते हैं। यहां की जनता ने अजीत सिंह को अपना चौधरी माना और लोकसभा-विधानसभा चुनावों में उनका साथ भी दिया। उन्हें यकीन था कि पूर्व पीएम की विरासत संभालने वाले अजीत उनकी परेशानियों को बांटने के लिए तैयार रहेंगे।
जयंत चौधरी भी मुश्किल में
ऐसा नहीं कि मुसीबत सिर्फ अजीत के सामने खड़ी है। चौधरी चरण सिंह की तीसरी पीढ़ी की नुमाइंदगी करने वाले उनके बेटे जयंत चौधरी भी कोई खास अच्छी स्थिति में नहीं हैं। वो मथुरा से सांसद हैं और एक बार फिर जीतना चाहते हैं। चौधरी चरण सिंह के नाम और पिता के काम के कारण पिछली बार वो सांसद बने, लेकिन इस बार उन्हें कुछ अपनी काबिलियत का ब्योरा भी देना होगा।
भाजपा ने सभी को चौंकाते हुए मथुरा से इस बार सिने तारिका हेमामालिनी को टिकट दिया है, जो अपने पति और स्टार रहे धर्मेंद्र के जाट कनेक्शन का हवाला देंगी। यही वजह है कि जयंत को इस बार दोधारी तलवार पर चलना है। एक तरफ हेमा का ग्लैमर होगा, तो दूसरी तरफ जाट वोट में सेंध लगाने के लिए धर्मेंद्र का नाम, ऐसे में जयंत को अपनी मथुरा बचाने के लिए ऐड़ी-चोटी का जोर लगाना पड़ सकता है।
काम आएंगे अमर-जया?
अजीत और कांग्रेस के बीच हुए समझौते के तहत पश्चिमी सूबे की आठ सीटों पर गठबंधन का जिम्मा उन्हें ही देखना है। फतेहपुर सीकरी से अमर सिंह और बिजनौर से जया प्रदा को टिकट दिया गया है। लोकसभा में फिलहाल अजीत के पांच सांसद हैं, लेकिन इस बार चुनौती कड़ी है। अमर सिंह और जया प्रदा, दोनों के लिए मुकाबला कड़ा है। जया प्रदा इससे पहले रामपुर से सांसद थीं, जहां उनका काम कम बोला और दूसरी चीजों ने ज्यादा साथ दिया।
अगर चौधरी अजीत सिंह की बात करें, तो पिछले चुनावों में वह करीबी मुकाबले में जीते थे। बहुजन समाज पार्टी के मुकेश शर्मा ने उनको कड़ी टक्कर दी और सिर्फ 10 हजार वोटों से हारे। तब भी इस तरह की बात उठी थी कि क्या अजीत सिंह का सुनहरा दौर अब धूल हो चुका है। आईआईटी खड़गपुर से बीटेक और उसके बाद उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका पहुंचे अजीत इंजीनियर तो बन गए, लेकिन इस बार यह देखना है कि सियासत की मशीनरी में सोशल इंजीनियरिंग के पैमाने पर उनका क्या होता है।
भविष्य पर छाया है संकट?
अजीत यूं भी सत्ता से खासा लगाव रखते हैं। वो कभी बीजेपी के साथ गठबंधन करते हैं, तो कभी कांग्रेस के साथ। समाजवादी पार्टी के साथ भी रहे हैं। हालांकि, किसी भी दल के साथ उनका गठबंधन बहुत लंबे वक्त तक नहीं टिका। अजीत यूं तो अपने राजनीतिक करियर में मात्र एक ही बार हारे हैं, लेकिन इस बार हार मिली, तो भविष्य पर संकट खड़ा हो सकता है।
लोकसभा चुनावों की तैयारियां अंतिम दौर में हैं। अजीत के पास अपने बेटे जयंत के अलावा अमर सिंह जैसे अनुभवी सियासी मैनेजर हैं और जयाप्रदा के जरिए ग्लैमर का तड़का भी। यह देखना वाकई दिलचस्प होगा कि इन तीनों का मिक्सचर राष्ट्रीय लोक दल को अपनी सियासी पैठ बढ़ाने का मौका देता है या फिर वोटर इस बार अपनी चौधराहट दिखाने के मूड में है।