मौजूदा सियासी चक्रव्यूह में क्यों असहाय हुई कांग्रेस?
अपने राजनीतिक इतिहास में सबसे ज्यादा संकट झेल रही देश की सर्वाधिक पुरानी पार्टी कांग्रेस रविवार को अपनी 129वीं सालगिरह मना रही है। राजनीतिक पार्टी के लिहाज से हालांकि इस उम्र को बुढ़ापा नहीं कहा जा सकता है, लेकिन कांग्रेस केंद्र से लेकर राज्यों में आज जिस हालात में पहुंच चुकी है, उसे देख कर तो लग रहा है कि उस पर उम्र हावी हो रही है। पार्टी सियासी संक्रमण के ऐसे दौर में है, जब लोगों का भरोसा उस पर सबसे कम है। यही नहीं खुद पार्टी भी चुनौतियों के मौजूदा चक्रव्यूह से बाहर निकलने में खुद को असहाय महसूस कर रही है।
निश्चित तौर पर कांग्रेस के सामने इस समय सबसे बड़ा इम्तिहान है। पार्टी को बेचैनी से ऐसे नेतृत्व की तलाश है, जो चुनावी लोकतंत्र के हर दौर में कांग्रेस संगठन में जवानी का रंग भरता रहा है। नेहरू के बाद इंदिरा, कामराज, राजीव और सोनिया गांधी ने पार्टी को ढलान के दौर में बचाए रखा।
जाहिर तौर पर लगभग तय माने जा रहे कांग्रेस के अगले अध्यक्ष राहुल गांधी के लिए जोश का यह रंग भरना बेहद कठिन चुनौती है। खासकर यह देखते हुए कि अब तक अपनी कार्यशैली से राहुल जनता तो दूर अपनी पार्टी के नेताओं और कैडर में भी फिर से खड़े होने का भरोसा नहीं जता पाए हैं।
चंद राज्यों तक सिमटी कांग्रेस की सत्ता
16 मई से लेकर 28 दिसंबर, 2014 आते-आते दक्षिण में कर्नाटक और केरल, पूरब में असम और पूर्वोत्तर के तीन छोटे राज्यों को छोड़ दें तो पूरे देश में कांग्रेस सत्ता से बाहर है। पश्चिम, उत्तर और मध्य भारत में उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के अलावा तो पार्टी की जमीन ही नहीं बची है। उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, राजस्थान, महाराष्ट्र, गुजरात, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, ओडिशा जैसे बड़े राज्यों में वह हाशिए पर जा चुकी है। ऐसी विकराल चुनौतियों के बीच कांग्रेस को अब यह मनोवैज्ञानिक बढ़त भी नहीं है कि वह देश को आजाद कराने वाली पार्टी है क्योंकि आजादी के बाद पैदा हुई पीढ़ियों में कांग्रेस की इस विरासत को कंधा देने में दिलचस्पी नहीं दिखती।
संकट में फंसी कांग्रेस के स्थापना दिवस के मौके पर कांग्रेस नेता सत्यव्रत चतुर्वेदी कहते हैं कि स्थापना दिवस और संकट का दौर दोनों अलग चीज हैं। कोई व्यक्ति जिसका जन्मदिन होता है, वह बीमार भी हो सकता है। जो व्यक्ति जन्म लेता है, वह बीमार भी होगा। जो पार्टी बनती है, वह चुनाव जीतेगी भी और हारेगी भी। चतुर्वेदी कहते हैं कि ऐसा नहीं कि हम पहली बार हारे हैं। हम 2-3 बार सत्ता से बाहर रहे। लोकतंत्र यही है। लोकतंत्र में सारी जिंदगी एक पार्टी राज करती रहेगी, ऐसा नहीं होता।
अंदर से दुर्बल हो चुकी कांग्रेस: किदवई
कांग्रेस के इतिहास पर बारीक निगाह रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार रशीद किदवई कहते हैं कि सिर्फ कांग्रेस का मनोबल ही इस समय सबसे निचले स्तर पर नहीं है, बल्कि अंदर से भी दुर्बल हो चुकी है। उसके पास राजीव गांधी के जमाने में तैयार हुए नेताओं की फौज भी रही है, जिसने सोनिया गांधी के पीछे खड़ा होकर 2000 के दशक में कांग्रेस को संभाल लिया और कांग्रेस को धराशायी होने से बचा लिया।
राहुल कांग्रेस का पूरी तरह से संभालें कार्यभार: दिग्विजय
कांग्रेस को चुनाव में मिल रही लगातार हार के बीच पार्टी के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह ने कहा कि राहुल गांधी को पूरी तरह से पार्टी का नेतृत्व संभाल लेना चाहिए। पार्टी महासचिव ने कहा कि कांग्रेस पार्टी के सभी लोग चाहते हैं कि राहुल अखिल भारतीय कांग्रेस समिति का नेतृत्व पूर्णकालिक ढंग से संभाल लें। पिछले महीने भी दिग्विजय सिंह ने ऐसा ही बयान दिया था जिसे कांग्रेस पार्टी ने उनकी व्यक्तिगत राय बताते हुए खुद को इससे अलग कर लिया था।
हालांकि सिंह ने कहा कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी हमारी नेता बनी रहेंगी। उन्होंने कहा कि मुझे पूरा विश्वास है कि यदि राहुल को मौका दिया जाता है तो बेहतर प्रदर्शन करेंगे। जहां तक कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की बात है तो वह हमारी नेता बनी रहेंगी।
राज्यसभा सांसद ने कहा कि सोनिया के नेतृत्व में कांग्रेस ने चमत्कारिक सफलताएं हासिल की हैं। एक वक्त में पार्टी मात्र दो राज्यों में सत्ता में थी लेकिन बाद में उसने 14 राज्यों में अपनी सरकार बनाई। इसके अलावा उनके नेतृत्व में पार्टी 2004 और 2009 में केंद्र की सत्ता में आई लेकिन अब वक्त आ गया है कि राहुल गांधी पार्टी का कार्यभार संभालें। सभी पार्टी कार्यकर्ता भी इसके पक्ष में हैं। पिछले महीने राहुल को सोनिया से कार्यभार संभालने संबंधी सुझाव को लेकर दिग्विजय विवादों में आ गए थे। उनके सुझाव को पार्टी ने सिरे से खारिज कर दिया था।
राहुल को भारत भ्रमण की कांग्रेस नेताओं ने दी सलाह
पार्टी को संकट से निकालने के लिए कांग्रेस के अंदर इन दिनों विचार मंथन चल रहा है। ऐसी ही कसरत के बीच कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता राहुल गांधी को देश भ्रमण कर पार्टी को मजबूती देने की सलाह दे रहे हैं। अभी 24 दिसंबर को ही कांग्रेस के कई पदाधिकारियों ने पार्टी उपाध्यक्ष से देश भ्रमण कर पार्टी को मजबूती देने की गुजारिश की थी। पार्टी के वरिष्ठ नेता और दो कांग्रेसी मुख्यमंत्री भी यह सलाह पिछले दिनों दे चुके हैं। मगर राहुल अंतिम फैसला नहीं कर पा रहे हैं। राहुल के फैसला नहीं लेने को लेकर पार्टी के कई बड़े नेता नाराज है। उनका मानना है कि राहुल के आसपास रहने वाले उनके सलाहकार ऐसा करने से रोक रहे हैं।
राहुल के सलाहकारों में मोहन गोपाल, कनिष्क सिंह, जयराम रमेश, मधुसूदन मिस्त्री और कौशल विद्यार्थी आदि शामिल हैं। पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि अभी राहुल के देशव्यापी दौरे की जरूरत है। पार्टी के सामने मोदी सरकार के खिलाफ कई मुद्दे हैं, जिनको हथियार बनाकर राहुल सड़क पर उतर सकते हैं। इस नेता ने कहा कि राहुल के सलाहकार उन्हें अभी कोई जोखिम उठाने से मना कर रहे हैं और उन्हें लगभग एक साल बाद ही ऐसा कोई कार्यक्रम करने की सलाह दे रहे हैं। पिछले महीने भी कांग्रेस उपाध्यक्ष ने बारी बारी से पार्टी के कई नेताओं के समूह से बातचीत की थी। तब भी कई नेताओं ने उन्हें कहा था कि वह जल्द ही अगर देश के हर हिस्से में दौरा करेंगे तो लोग उनसे जुड़ने की कोशिश करेंगे।
उस समय कुछ नेताओं का अनुमान था कि राहुल झारखंड और जम्मू कश्मीर चुनाव के ठीक बाद देश भ्रमण करेंगे। मगर अभी तक दौरे को लेकर कोई योजना नहीं बनी है। राहुल का भारत भ्रमण ही नहीं कई मुद्दों और कार्यक्रमों को लेकर कांग्रेस की रणनीति दो भागों में बंट रही है। 24 अकबर रोड में बैठे वरिष्ठ नेता अपनी अलग रणनीति को अंजाम दे रहे हैं तो पार्टी उपाध्यक्ष के निवास 12 तुगलक लेन में बैठे राहुल के सलाहकार अलग कार्यक्रम और योजना बना रहे हैं।