महिला पुलिस कर्मियों के मामले में पिछड़ा पश्चिम बंगाल
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चार साल से एक महिला मुख्यमंत्री (ममता बनर्जी) के सत्ता में होने और राज्य में महिलाओं के खिलाफ अपराध का ग्राफ तेजी से बढ़ने के बावजूद पुलिस बल में महिलाओं की भागीदारी के मामले में पश्चिम बंगाल काफी पिछड़ा है।
सभी राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों की सूची में पश्चिम बंगाल 25वें स्थान पर है। 2014 में राज्य में कार्यरत 79,476 पुलिस कर्मियों में महज 3,791 महिला पुलिस कर्मी थीं, जो लगभग 4.77 फीसदी है।
एक गैर-सरकारी संगठन राष्ट्रमंडल मानवाधिकार आयोग की ओर से जारी रिपोर्ट में इसका खुलासा हुआ है। संगठन ने भारतीय पुलिस व्यवस्था में सुधार की भी वकालत की है। पुलिस बल में महिलाओं की भागीदारी के मामले में 14.16 फीसदी के साथ चंडीगढ़ पहले और 12.42 फीसदी के साथ तमिलनाडु दूसरे स्थान पर है। इस मामले में राष्ट्रीय औसत 6.11 फीसदी है।
रिपोर्ट में केंद्रीय गृह मंत्रालय के हवाले से कहा गया है कि वह पुलिस बल में महिलाओं की तादाद बढ़ाने के लिए आरक्षण लागू करने पर विचार कर रहा है, लेकिन पुलिस के राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र में होने की वजह से इस मामले में आखिरी फैसला करने का अधिकार मुख्यमंत्रियों के हाथों में है।
फिलहाल तमिलनाडु व महाराष्ट्र समेत 12 राज्यों में पुलिस बल में महिलाओं के लिए आरक्षण लागू है।
महिलाओं के लिए 33 फीसदी आरक्षण की आदर्श स्थिति
केंद्रीय गृह मंत्रालय के मुताबिक, महिलाओं के लिए 33 फीसदी आरक्षण आदर्श स्थिति है। कोलकाता पुलिस में यह समस्या काफी गंभीर है। इसमें एक हजार से भी कम महिलाएं हैं।
महिला अधिकारियों की कमी की वजह से जहां कई मामलों में महिलाएं शिकायत लेकर पुलिस के पास पहुंचने से हिचकती हैं, वहीं पुलिस पर भी महिलाओं के प्रति असंवेदनशील रवैया अपनाने के आरोप लगते रहे हैं।
पुलिस सूत्रों ने बताया कि महानगर के हर थाने में तीन महिला पुलिस कर्मचारियों की तैनाती है। इनमें से दो कांस्टेबल हैं और एक सब-इंस्पेक्टर, लेकिन खासकर रात के समय होने वाले अपराधों की स्थिति में यह तादाद नाकाफी साबित होती है।
महिला पुलिस कर्मियों का कहना है कि पुलिस बल में तादाद बढ़ाने के साथ ही महिलाओं के लिए थानों में शौचालय और कपड़े बदलने के कक्ष समेत कई अन्य आधारभूत सुविधाओं को विकसित करना भी जरूरी है।