क्या सिर्फ बदकिस्मत प्रेमिका थीं रजिया, पढ़ें ये दास्तां
भारत की पहली महिला शासक रजिया सुल्तान के बारे में हेमा मालिनी का ख्याल आए बिना सोचना बहुत मुश्किल है। कमाल अमरोही की फिल्म 'रजिया सुल्तान' में हेमा मालिनी ने रजिया का किरदार निभाया था, काले रंग में पुते धर्मेंद्र के साथ।
आजकल रजिया सुल्तान पर हिंदी में एक धारावाहिक बन रहा है। हालांकि इसकी कल्पना से तथ्यों को परे ही रखा गया है। दिल्ली के सुल्तान (1210-1236 ईस्वी) इल्तुतमिश की बेटी रजिया शर्मीली नहीं थीं और परदे में बड़ी नहीं हुई थीं।
वो कत्तई इस तरह की नहीं थी कि रेत के टीलों में विलाप करें और प्रेम गीत गाएं, चाहे वो गाना शानदार 'ऐ दिले नादां' ही क्यों न हो।
वो एक निपुण और जोशीली घुड़सवार, तलवारबाज और तीरंदाज थीं। उनके पिता और उनके भरोसेमंद काले गुलाम जमालुद्दीन याकूत ने उन्हें युद्धकला में पारंगत किया था।
उन्हें शासन करने का भी प्रशिक्षण दिया गया था और जब इल्तुतमिश ग्वालियर की ओर एक अभियान पर निकले तो उन्हें सल्तनत की जिम्मेदारी सौंप गए थे।
इल्तुतमिश के सबसे बड़े बेटे और उत्तराधिकारी नसीरुद्दीन महमूद 1229 ईस्वी में एक लड़ाई में मारे गए थे और उन्हें अपने छोटे बेटों पर यकीन नहीं था क्योंकि वे जवानी के सुख भोगने में डूबे हुए थे।
परंपरा से बिल्कुल हटकर उन्होंने रजिया को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त कर दिया। कहा जाता है कि वो रजिया की क्षमता को बीस बेटों के बराबर बताते थे।
सुल्तान की इच्छा के विरुद्ध कुछ प्रभावशाली लोगों ने उनके छोटे और नाकाबिल भाई रुकनुद्दीन फिरोज (अप्रैल 1236- अक्तूबर 1236) को तख्त पर बैठा दिया, लेकिन जल्द ही योद्धा रजिया सुल्तान ने परिस्थितियों को अपने पक्ष में मोड़ लिया।
'राजा की खूबियां'
इतिहासकार ख्वाजा अब्दुल्लाह मलिक इसामी अपनी कितानब 'फुतुहात-ए-सलातिन' (1349-50) में लिखते हैं कि रजिया फटेहाल में, मैले कुचैले कपड़े पहने हुए शुक्रवार की नमाज के लिए एकत्र लोगों के सामने आकर अपनी पीड़ा सुनवाई।
रजिया का कहना था कि उनकी सौतेली मां शाह तुरकान अपने बेटे रुकनुद्दीन फिरोज के ताज के बहाने राज कर रही हैं। रजिया ने वहां मौजूद लोगों से अपनी सौतेली मां की साजिशों का मुकाबला करने में अपने पिता के नाम पर मदद मांगी।
रजिया को इस हालत में देखकर और उनके प्रभावशाली शब्दों ने मौजूद लोगों पर तगड़ा प्रभाव डाला। इससे एक और आक्रामक कदम की शुरुआत हुई, यानी दिल्ली के लोगों और रजिया के बीच एक संबंध की शुरुआत हुई।
इसामी कहते हैं कि इस घटना के बाद रजिया और आम लोगों के बीच एक और बात पर सहमति बनी, जिसके तहत ''उन्हें अपनी क्षमता प्रदर्शित करने का मौक मिलना था और अगर वो खुद को आदमियों से बेहतर साबित नहीं कर पातीं, तो उनका सिर कलम कर दिया जाना था।"
जब तक उनका भाई शहर में वापस आया रजिया का राज्याभिषेक हो चुका था और फिर शाह तुरकान को जेल में डाल दिया गया। मां और बेटे दोनों को 9 नवंबर, सन् 1236 को मार दिया गया।
एक कदम से तुर्कों को किया नाराज
अपने भाई की जगह वह सुल्तान जलालुद्दीन रजिया के नाम से तख्तनशीं हुईं। उन्होंने महिलाओं को दी जाने वाली पदवी (जो आमतौर पर शहजादियों या पत्नियों के लिए प्रयोग की जाती थी) को नकार दिया था।
उनकी नजर में शासक रजिया सुल्तान के लिए यह एक कमजोर पदवी थी। उन्होंने अपने जनाना कपड़े छोड़कर आदमियों की तरह कुर्ते, लबादे और पगड़ी पहनना शुरू कर दिया, उन्होंने परदा करना भी छोड़ दिया।
इतिहासकार मिन्हाज-उस-सिराज कहते हैं, "सुल्तान रजिया एक महान शासक थीं। वह समझदार थीं, ईमानदार और उदार, अपने साम्राज्य की संरक्षक, इंसाफ देने वाली, अपनी प्रजा की रक्षक और अपनी सेना की सेनापति थीं।
उनमें वे सारे गुण थे जो एक राजा में होने चाहिए, लेकिन बस उनकी पैदाइश सही लिंग में नहीं हुई थी। इसलिए पुरुषों के विचार में उनकी ये सारी खूबियां बेकार थीं।"
वो राज्य के मामलों को एक खुले दरबार में बड़ी कुशलता के साथ निपटाती थीं। लेकिन रजिया के पतन का कारण जमालुद्दीन याकूत नाम के एक गुलाम से उनकी कथित दोस्ती की धारणा थी, जिन्हें उन्होंने घुड़साल के मुखिया के पद पर तरक्की दी थी।
इससे बेहद शक्तिशाली तुर्कों का गुट (जिसे चहालगनी कहा जाता था) नाराज हो गया, जिन्हें लगता था कि सभी महत्वपूर्ण पद तुर्कों के पास ही रहने चाहिए।
'प्रेम संबंध?'
आज हम उन्हें कभी भी एक शासक के रूप में याद नहीं करते बल्कि एक बदकिस्मत औरत के रूप में याद करते हैं जो अपने गुलाम से प्यार करती थी और इत्तेफाक से एक शासक भी थी।
लेकिन कोई भी समकालीन इतिहासकार कभी भी किसी प्रेम संबंध की बात नहीं करता, इसके सिवाय कि घोड़े पर चढ़ने के दौरान उन्हें रजिया को छूने की इजाजत थी। लेकिन घुड़साल नियंत्रक होने के नाते यह उनका काम था। वो इल्तुतमिश के लिए भी यही करते थे।
जब हम हर चीज को रोमांस के चश्मे से देखते हैं तो ये भूल जाते हैं कि वो मुश्किल परिस्थितियों में राज करने की कोशिश कर रही थीं। और उन हालात में उनके पिता के भरोसेमंद गुलाम और उनके शिक्षक से ज्यादा भरोसेमंद कौन होता?
जब मैं अपनी बेटी को रजिया की कहानी सुना रही थी उसने चिल्लाकर कहा, "मां वो उन्हें अपने सलाहकार के रूप में देखती थीं और पिता समान मानती थीं।"
सच चाहे कुछ भी हो, शक्तिशाली तुर्कों के गुट ने उनके खिलाफ विद्रोह कर दिया। याकूत की हत्या कर दी गई और रजिया को कैद कर लिया गया।
उनके एक काले गुलाम के साथ कथित प्रेम संबंध के कारण उनके खिलाफ बगावत हुई या इसलिए कि वो अब शक्तिशाली तुर्कों की कठपुतली नहीं रह गई थीं, वो अपने दिमाग से काम कर रही थीं और एक गैर-तुर्क को एक महत्वपूर्ण पद पर नियुक्त कर अपनी ताकत आजमा रही थीं।
चहलगानी ने फिर उनके भाई मुइज़ुद्दीन बहराम को तख्त पर बैठाया। रजिया वहां से भागकर भटिंडा पहुंचने में सफल रहीं और वहां एक अन्य तुर्क अमीर मलिक अल्तूनिया से हाथ मिला लिया। बाद में उन्होंने उनसे शादी भी कर ली।
दिल्ली के उन लोगों के सुरक्षा घेरे से बाहर जाने के बाद, जिन्होंने उन्हें चुना था, वो उतनी ताकतवर नहीं रह गई थीं और जल्द ही दिल्ली के तख्त पर सवार अपने भाई के खिलाफ एक अभियान का नेतृत्व करते हुए मारी गईं।