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नेताओं में भाग्य विधाता बनने का घमंड जनता को मंजूर नहीं

Wed, 11 Feb 2015 08:23 PM IST
संजय मिश्र/अमर उजाला, नई दिल्ली
संजय मिश्र/अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Wed, 11 Feb 2015 08:23 PM IST
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voters dont tolerate arrogant leaders.

लोकसभा चुनाव में मात खाने के महज नौ महीने बाद ही दिल्ली विधानसभा चुनाव में हैरतअंगेज वापसी कर अरविंद केजरीवाल और आम आदमी पार्टी ने नया इतिहास रच दिया है। नतीजे कई मायने में न केवल अद्भुत हैं बल्कि चमत्कारिक भी। अदभुत इसलिए कि राजधानी दिल्ली में मुख्यधारा के दो बड़े दलों की उपस्थिति के बीच खुद जनता ने अपने लिए आप के रूप में नया राजनीतिक विकल्प खड़ा किया है।

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ऐसा विकल्प जो न केवल मुख्यधारा की राजनीति करने वाले दलों की बराबरी कर सके बल्कि जिसमें वर्तमान और पुरानी लीक पर चल रही सियासत को बदलने का माद्दा भी है। यह फैसला उस राजधानी से आया है जहां देश के सबसे अधिक बौद्घिक मतदाता हैं और वे देश के सामान्य मिजाज का प्रतीक माने जाते हैं। लगभग विपक्ष विहीन विधानसभा का यह नतीजा मुख्य धारा की पार्टियों को एक कड़ा संदेश भी है। पराक्रमी नेतृत्व के बावजूद भाजपा का धराशायी होना और कांग्रेस का मटियामेट होना साफ करता है कि वोटरों ने मुख्य धारा की पार्टियों को यह बताने से गुरेज नहीं किया है कि वे खुद को जनता की भाग्य विधाता समझने की पुरानी सोच को बदलें या फिर हाशिए पर जाने केलिए तैयार रहें।
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मुख्यधारा के दलों को जहां अपनी राजनीति करने के तरीकेपर गहन मंथन करना होगा, वहीं आप के सामने खुद को वैकल्पिक राजनीतिक के अपने बनाए प्रतिमान पर खरा उतरना होगा।
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इस नतीजे को नकारात्मक जनादेश के चश्मे से भी देखना उचित नहीं होगा। दरअसल आप को वोट देने के मामले में महलों और झुग्गियों की दूरियां ही नहीं मिटी है, बल्कि जाति, वर्ग और धर्म की दीवार भी ढही है। यही कारण है कि राजनीति और चुनाव को हमेशा एक खास राजनीतिक गुणाभाग और समीकरण केमाध्यम से देखते रहने के फ्रेम में ढले चुनावी विशलेषक भी आप के पक्ष में चल रही सुनामी का नब्ज नहीं भांप पाए। इसके अलावा इस नतीजे ने भाजपा-कांग्रेस को साफ संदेश दिया है कि अब महज बड़े संसाधनों, बड़े चेहरों, तामझाम और वादों का पिटारा खोल कर चुनाव नहीं जीते जा सकते।

व्याकुल और परिपक्व हुआ है मतदाता

voters dont tolerate arrogant leaders.

नेता और उनके वायदे तो नहीं बदले पर मतदाताओं की सोच जरूर बदल गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि अब वह परिपक्व हो गया है और जाति-धर्म से ऊपर उठ रहा है। पहले केंद्र में भाजपा को एक सुर में समर्थन, हरियाणा में तीसरे नंबर की भाजपा को स्पष्ट बहुमत, महाराष्ट्र में घोर मराठी अस्मिता के विरुद्ध विकास का एजेंडा रखने वाली भाजपा को अप्रत्याशित रूप से बहुमत के करीब पहुंचाना और जम्मू-कश्मीर में पूर्वानुमानों के इतर भाजपा को दमदार समर्थन के बाद अब दिल्ली में आप पर ऐसी मेहरबानी कि जिसकी कल्पना खुद अरविंद केजरीवाल ने भी नहीं की थी।

प्रसिद्ध उपन्यासकार और नाटककार असगर वजाहत साफ लफ्जों में कहते हैं मतदाता व्याकुल हो गया है। 50 से 60 साल हो गए हैं, लेकिन लोगों को मूलभूत परिवर्तन जैसा कुछ नहीं दिखाई दे रहा है। यही कारण है जहां आशा दिखाई पड़ती है उसी ओर टूट पड़ता है। दरअसल, मतदाता के साथ अब तक विश्वासघात होता रहा है। वह मानते हैं कि जब लोकतंत्र परिपक्व होगा तभी राजनेता सतर्क होंगे। लोकतंत्र तभी परिपक्व होगा जब शिक्षा अनिवार्य होगी। वजाहत यह भी कहते हैं कि केजरीवाल ईमानदार जरूर हो सकते हैं लेकिन अच्छे शासक के रूप में अभी उनकी परीक्षा होनी है।

वहीं, समाजशास्त्री प्रो. योगेंद्र सिंह का मानना है कि मतदाताओं की योग्यताएं और विचार तेजी से बदल रहे हैं। पहले लोग जाति धर्म से जुड़कर चीजों को देख रहे थे, लेकिन अब इसमें बिखराव हुआ है। किसी भी विकसित देश में ऐसा मतदान देखने को कहां मिलता है जैसा इस वक्त देश में हो रहा है। भारत भी विकास की राह पर है। मतदाता परिपक्व हुआ है और मूल्यांकन की प्रकृति बढ़ी है। हालांकि वह यह नहीं कह रहे हैं कि जाति और धर्म को लेकर लोगों की इच्छाएं पूरी तरह खत्म हो जाएंगी, लेकिन यह कम जरूर हो रही हैं।

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