नक्सलियों पर सैन्य कार्रवाई के खिलाफ हैं वीके सिंह
वीके सिंह ने नक्सल प्रभावित इलाकों में सेना के इस्तेमाल का विरोध किया है। उनके मुताबिक अपने लोगों के खिलाफ सेना का उपयोग उसकी छवि को दागदार कर देगा। समस्या से
निबटने के लिए कई दूसरे उपाय किए जा सकते हैं। सेना जवाब नहीं है।
वीके सिंह ने 2010 में छत्तीसगढ़ में नक्सलवादी हमले के बाद तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री पी चिदंबरम के साथ हुई बैठक का भी जिक्र किया। कहा, "तब मैंने कहा था कि हमें नक्सलवाद के कारणों को जानने के लिए आत्मविश्लेषण करना चाहिए। मैंने केंद्रीय मंत्री को बताया था कि समस्या यह नहीं है कि सेना नक्सल प्रभावित इलाकों में जाना नहीं चाहती है पर इससे क्या संदेश जाएगा।"
पूर्व सेना प्रमुख के अनुसार उन्होंने तत्कालीन रक्षा मंत्री से भी कहा था कि सेना को नक्सल प्रभावित इलाकों में केवल तभी भेजना चाहिए जब राष्ट्रीय सुरक्षा पर कोई खतरा हो, खासकर किसी और देश द्वारा।
बड़ी गलती थी श्रीलंका में शांति सेना भेजना
विदेश राज्य मंत्री जनरल (सेवानिवृत्त) वीके सिंह का मानना है कि भारत को 1987 में श्रीलंका में शांति सेना नहीं भेजनी चाहिए थी। सरकार का शांति सेना (इंडियन पीस कीपिंग फोर्स) भेजना बहुत बड़ी नीतिगत खामी थी।
अपनी आटोबायोग्राफी ‘करेज और कन्विक्शन’ पर चर्चा के लिए आयोजित कार्यक्रम में मंगलवार को पूर्व सेना प्रमुख ने कहा कि भारत और श्रीलंका सरकार के बीच करार होना एक बड़ी गलती थी। वहां लड़ाई एलटीटीई और श्रीलंका सरकार के बीच थी। उनका लिट्टे पर ना कोई नियंत्रण था और ना ही उन्होंने जिम्मेदारी ली।
भारतीय सेना वहां शांति कायम करने के लिए गई थी पर युद्ध में फंस गई। केंद्रीय मंत्री ने एक और चौंकाने वाला खुलासा किया है।
उनके अनुसार श्रीलंका में अभियान के दौरान भारतीय सेना के पास लिट्टे प्रमुख वेलुपिल्लई प्रभाकरण को पकड़ने के कई मौके थे पर हर बार ‘ऊपर’ से आदेश आ जाता और उसे बचने का मौका मिल जाता था। एक मौके पर तो श्रीलंकाई राष्ट्रपति रणसिंघे प्रेमदासा ने खुद शांति सेना से लड़ने में लिट्टे की मदद की थी।
पड़ोसी देशों से रिश्तों के सवाल पर वीके सिंह ने कहा कि भारत-पाक के बीच माहौल सुधारने के लिए कई प्रयास किए गए हैं। वहीं चीन के साथ सीमा विवाद सुलझाने के लिए हम कोई समय सीमा नहीं निर्धारित कर सकते हैं।