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वीरेन डंगवाल: 'जिंदगी से छलकता आदमी और कवि'
अनिल यादव/वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
Updated Mon, 28 Sep 2015 06:51 PM IST
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अप्रत्याशित शरारती स्वभाव के कारण हम कुछ दोस्त उन्हें डॉ. डैंग कहते थे। 4 सितंबर को दिल्ली के गांधी पीस फाउंडेशन में उनका अभिनंदन था, लेकिन उनसे वह आख़िरी मुलाकात उनके सदा के प्रखर इंट्यूशन और नए निरासक्त भाव को पहचानने का मौका थी।
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कैंसर तो हद से आगे जा ही चुका था पर वे जान भी गए थे कि कितने डग बाद मृत्यु उन तक आ पहुंचेगी इसीलिए उन्होंने अपने घर बरेली लौटने का फैसला किया था।
मैं थोड़ी देर पहले पोलैंड के क्रॉकोव शहर से कोई नौ घंटे की हवाई यात्रा के बाद पहुंचा था, सोने के बजाय उनसे मिलने चला गया, खींच कर गले लगाने के अगले क्षण उन्होंने ठहरी हुई आवाज़ में कहा,'' तुम न भी आते तो मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता...'' मैं धक रह गया कि कवि ने ठंडे दिमाग से चलने की तैयारी कर ली है। ये वही डॉ. डैंग थे कि पहाड़ की तरफ जाओ तो न जाने कैसे उन्हें लगभग हर बार पता चल जाता था। फोन आ जाता था, ''बेट्टा खूब मज़े कर रहे हो, मैंने तुम्हें सपने में देखा था।''
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'ज़िंदगी पटरी पर ले आए'
उनके अमर उजाला, कानपुर के संपादक बनने के बाद 90 के दशक के आखिरी सालों में उनसे मेरी पहली मुलाकात सड़क किनारे हुई थी। उस साल नौकरी छोड़ने के बाद हम कुछ मोहभंग के शिकार, नकार से भरे, अराजक समझे जाने वाले युवाओं ने एक ग्रुप बना लिया था जो लखनऊ के पॉयनियर चौराहे पर एक पेड़ के नीचे भोर तक शराब पीते हुए उत्पात, लनतरानी और गहन चिंतन करते थे कि हम तरक्की की ओर ले जाने वाले खांचों में ठीक से बैठ क्यों नहीं पाते? उस रात वे मुझे खोजते हुए वहां आ धमके। उन्होंने मुझे हाथ पकड़ कर खींचते हुए वीरेनियन अंदाज में कहा, ''प्यारे जो तुम कर रहे हो दुनिया के सर्कस में उसकी कीमत चवन्नी भी नहीं है।''
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''कल नहा कर दफ्तर आओ, जब तक जी चाहे कुछ रपटें लिखना, वरना तुम्हारे दोस्त कौन सा तुम्हें छोड़ के भागे जा रहे हैं, फिर यहीं चले आना।'' इस तरह अगले दिन से नौकरी की शुरुआत हुई।
मैं ही अकेला नहीं हूं, बहुतेरे हैं जिन्हें वे उनके पेट्रोला और हताशा के भूमिगत तहख़ानों से निकाल कर फिर से उनकी जिंदगी पटरी पर लाए। उन्हीं दिनों मैंने अखबार में ग्यारहवें पन्ने पर बहैसियत संपादक उनकी लिखी एक टिप्पणी पढ़ी थी-'फ़ैज़ुल्लागंज की आयशा को सलाम।' आयशा एक गरीब लड़की थी जिसने एक लड़के से प्यार किया था। लड़के ने धोखा दिया, निकाह से मुकर गया।
आयशा ने छत पर चढ़कर आत्महत्या की धमकी दी, मुहल्ले को जुटा कर बताया और लड़के को निकाह के लिए झुका दिया था। टिप्पणी की आख़िरी लाइन थी...ख़बरदार जो किसी ने आयशा को परेशान किया तो।
कविता में सादगी और जज़्बा
यह अखबारों के कॉरपोरेटीकरण का दौर था, मामूली लोगों की ख़बरें पन्नों से गायब हो रही थीं, धर्म, चटक तस्वीरें, मनोरंजन यानी फीलगुड फ़ैक्टर वाली अलामतों को तरजीह दी जा रही थी। उनकी कविताओं में भी वैसी ही सादगी, जीवन को संपूर्णता में पकड़ने की बेचैनी, एक सुचिंतित थिर किस्म का आशावाद और भारतीय समाज की विडंबनाओं को पचा कर भविष्य की ओर देखने का जज़्बा है जिनकी गूंज बहुत लंबे समय तक बनी रहेगी।
उनकी एक काफी मशहूर कविता 'कटरी की रूकुमिनी' को मैंने इसी नाम से कहानी में भी बदलने की कोशिश की थी। थे तो वे हिंदी के प्रोफेसर लेकिन पारंपरिक गुरुडम से कोसों दूर, खुले दिमाग के आधुनिक दिलेर इंसान जिन्होंने जनता का पक्ष चुना था। जिस तरह मौत के साथ उसी तरह अपने चुनाव को भी उन्होंने सारा नफ़ा नुकसान जानते हुए सहज ढंग से निभाया।
शोख़ कशिश खींच लाती थी युवाओं को उनके व्यक्तित्व में एक शोख़ कशिश थी जिसके कारण उन्हें हमेशा युवा घेरे रहते थे। उनके बेटे की शादी में नाचने वाला डीजे का प्लेटफार्म सूना पड़ा था और इलाहाबाद से आया एक लड़का दीपक सिंह उनके काव्यपाठ के बीच में अचानक कहने लगा,'' सर, मैं हमेशा से नाचना चाहता था लेकिन घर वालों ने नाचने नहीं दिया।'' आज मैं नाचूंगा। उन्होंने कहा,'' प्यारे मौका है...'' और वह शायद जिंदगी में पहली बार खुले आसमान के नीचे टूट कर नाचा। आंसुओं से धुंधलाई आंखों से भी दिख रहा है कि डॉ। डैंग जिंदगी से छलकते आदमी और कवि थे जैसा कि आमतौर पर कम होता है। उन्हें आख़िरी सलाम।