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13 साल बाद भारत को मिलेगा विक्रमादित्य
Updated Sat, 16 Nov 2013 11:03 AM IST
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आखिर इंतजार खत्म हुआ। पूरे 13 साल और एक महीने के बाद रूस के कीव श्रेणी वाले विमान वाहक युद्धपोत एडमिरल गोर्श्कोव को भारत की नौसेना में आईएनएस विक्रमादित्य के तौर पर 16 नवंबर 2013 को शामिल कर लिया जाएगा।
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एडमिरल गोर्श्कोव की खरीद के लिए भारत ने रूस के साथ बातचीत अक्तूबर 2000 में शुरू की थी।
वे लम्हें गर्व से भरे होंगे जब रक्षा मंत्री एके एंटनी इस 45 हजार टन के विमान वाहक युद्धपोत को रूस में 'व्हॉइट सी' के बंदरगाह सेवर्डोविंक्स पर भारतीय नौसेना में औपचारिक तौर पर शामिल करेंगे। तब इस पर तिरंगा लहराया जाएगा।
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आईएनएस विक्रमादित्य वहां से रवाना होकर भारत के पश्चिमी तट पर स्थित करवार बंदरगाह के अपने ठिकाने पर पहुंचेगा।
विक्रमादित्य का परिचय देते वक्त जो पहली बात कही जा सकती है कि ये भारत के लिए एक 'गेम-चेंजर' है और वह भी अच्छे कारणों से।
रॉयल नेवी
लड़ाकू विमान 'मिग-29' से लैस होकर जब ये युद्धपोत अपनी पूरी रवानगी पर होगा तो इसकी सामरिक ताकत 450 मील के दायरे तक फैली हुई होगी।
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पहले से इस्तेमाल में लिए जाते रहे अपेक्षाकृत छोटे विमान वाहक युद्धपोतों के मद्देनजर ये वो क्षमता है जो भारत के पास फिलहाल नहीं है। हालांकि आईएनएस विराट का अभी इस्तेमाल किया जा रहा है लेकिन आईएनएस विक्रांत अब सेवा में नहीं है।
किसी भी त्रि-आयामी क्षमता वाली नौसेना के लिए विमान वाहक युद्धपोतों का होना एक महत्वपूर्ण बात होती है।
1948 में जब पहली बार नौसैनिक विस्तार का खाका खींचा गया था तो भारत ने दो विमान वाहकों की बात सोची थी। हालांकि पैसे की बाधा ने इस दिशा में आगे बढ़ने की इजाजत नहीं दी। भारत को वर्ष 1961 में पहला विमान वाहक युद्धपोत रॉयल नेवी से मिला था।
आलोचकों ने तब इस बात को लेकर सवाल उठाया था कि भारत जैसे विकासशील देश को इस तरह प्लेटफॉर्म खरीदने की क्या जरूरत थी और यह कितना समझदारी भरा फैसला था।
आईएनएस विराट
लेकिन दशक भर बाद ही 1971 की जंग में आईएनएस विक्रांत ने बड़े भरोसे के साथ अपनी उपयोगिता साबित कर दी। बांग्लादेश की लड़ाई के बाद किसी को विमान वाहक पोत की जरूरत को लेकर कोई शुबहा नहीं रह गया था।
भारत ने अपना दूसरा विमान वाहक युद्धपोत आईएनएस विराट भी रॉयल नेवी से ही 1987 में खरीदा और 'सी हैरियर' विमानों का भी परिचालन किया गया। हालांकि ये भी एक पुराना जहाज था।
इसकी नींव द्वितीय विश्व युद्ध के जमाने में रखी गई थी और ये अब तक नौसेना की सक्रिय सेवा में है। इस बात का श्रेय चीजों के रखरखाव को लेकर नौसेना की काबिलियत को जाता है। हालांकि आईएनएस विराट अब सम्मानपूर्वक विदाई के लिए तैयार है।
इसलिए 2014 के उत्तरार्द्ध में जब विक्रमादित्य अपनी पूरी क्षमता के साथ काम करने लायक हो जाएगा तब भी भारत के पास एक ही विमान वाहक युद्धपोत होगा और उसे अपने दूसरे पोत आईएनएस विक्रांत के लिए कुछ और साल इंतजार करने होंगे।
आईएनएस विक्रांत की डिजाइन देश में ही बनाई गई है और इसे तैयार भी यहीं किया गया है।
'उपहार' की पेशकश
विमान वाहक पोत विक्रमादित्य भारत की सैन्य क्षमताओं का विस्तार उसकी सीमाओं के पार तक कर देगा।
यह 24 घंटे में 600 मील तक का सफर करने की क्षमता रखता है और इसके प्लेटफॉर्म पर से उड़ान भरने वाले लड़ाकू विमान 450 मील के दायरे में दुश्मनों का सफाया कर सकता है।
आईएनएस विक्रमादित्य की मौजूदगी से मिलने वाली रणनीतिक बढ़त सामरिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है।
लड़ाकू विमानों के अलावा इस विमान वाहक युद्धपोत पर हेलिकॉप्टर भी होंगे जो पनडुब्बियों को भी निशाना बना सकने में सक्षम होंगे। यह आईएनएस विक्रमादित्य की ताकत को और बढ़ाता है।
निगरानी के मामले में संचार युद्ध अब केंद्र में है और विक्रमादित्य में इलेक्ट्रॉनिक हमले से निपटने के लिए कई जरूरी उपकरण लगाए गए हैं।
विक्रमादित्य का जिक्र अक्तूबर 2000 में पहली बार तब हुआ था जब रूस ने इसे भारत को बतौर 'उपहार' देने की पेशकश की थी।
शर्त ये थी कि भारत इसकी मरम्मती का खर्च उठाएगा।
परमाणु पनडुब्बी
शुरुआती अनुमानों में इसकी लागत 970 मिलियन अमेरिकी डॉलर बताई गई थी जो कि आखिर में 2।3 बिलियन डॉलर तक पहुंच गई।
बढ़ी हुई कीमत और लंबे इंतजार के बावजूद आईएनएस विक्रमादित्य भारत की सामरिक क्षमता का विस्तार उसकी सीमाओं के पार भी करता है।
आने वाले सालों में यह हिंद महासागर में भारत के तिरंगे की ताकत को और बढ़ाएगा।
भारत के आयुध भंडार में रूस सबसे महत्वपूर्ण आपूर्ति करने वाले देशों में बना हुआ है और इस बात का जिक्र किया जा सकता है कि भारत की परमाणु पनडुब्बी अरिहंत भी रूस के सहयोग से बनी है।
और 13 सालों के इंतजार का भारत के लिए सबक है कि वह घरेलू उत्पादन में और अधिक सार्थक तरीके से निवेश करे।