विदर्भ : जहां गरीबी बनती है आत्महत्या की वजह
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नागपुर से 135 किलोमीटर दूर दाहेगांव में नज़र आती है ग़रीबी की वो तस्वीर जिसमें बरसों की लाचारी, बदहाली और नाउम्मीदी के रंग मिले हुए हैं। दाहेगांव में रहने वाली इंदिरा ग़रीबी की गिरफ़्त से कभी नहीं छूट सकीं।
इंदिरा का जन्म ग़रीबी में हुआ। इसी ग़रीबी में उनकी शादी हुई और अब इसी ग़रीबी में उन्हें जीना है, पति के सहारे के बिना। अब से आठ साल पहले, ग़रीबी से मुक्ति का उपाय ढूंढने में नाकाम इंदिरा के पति ने आत्महत्या कर ली। इंदिरा केलकर कपास उगाने वाले क्षेत्र विदर्भ की साढ़े दस हज़ार और महाराष्ट्र की 53 हज़ार विधवाओं में से एक हैं।
इंदिरा का गांव भी उतना ही ग़रीब है जितना वो ख़ुद। नागपुर से हैदराबाद के लिए नेशनल हाइवे पर तीन घंटे का सफ़र करने के बाद मैं दाहेगांव पहुंचा। गांव हाइवे से काफ़ी अंदर जाकर है। आठ साल पहले जब मैं यहां आया था, उस समय हैदराबाद की समृद्ध हाइटेक सिटी बन रही थी, अरबों रुपए की लागत से बने दिल्ली और मुंबई के अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डों के चमकते टर्मिनल नहीं बने थे, तब नागपुर के शानदार क्रिकेट स्टेडियम का नक्शा भी पास नहीं हुआ था।
इंदिरा का दर्द
इंदिरा केलकर 32 साल की उम्र में विधवा हो गईं। इंदिरा के किसान पति ने क़र्ज़ के बोझ तले आने के चलते 2006 में आत्महत्या कर ली थी। खेतिहर मज़दूर के तौर पर प्रतिदिन 60 रुपये कमाने वाली इंदिरा के चार बच्चे हैं। दो लड़कियां और दो लड़के। लड़की की शादी के चलते इंदिरा को फिर से क़र्ज़ लेना पड़ा। लड़के बेरोज़गार हैं।
40 साल की इंदिरा को आज तक कोई सरकारी मदद नहीं मिली है और अब उसे मदद की कोई उम्मीद भी नहीं है। बड़े एयरपोर्ट, स्टेडियम और हाइवे बदलते भारत की पहचान बन चुके हैं जबकि दाहेगांव की हालत शायद पहले से बुरी ही हुई है। देश की आर्थिक प्रगति यहां से होकर अब तक नहीं गुज़री है। चुनाव के समय नेता यहाँ ज़रूर आते हैं। विधवाओं से और बदहाल किसानों से वादे करते हैं, लेकिन अगले चुनाव से पहले दोबारा नहीं दिखते।
अलग राज्य का मुद्दा
किसानों के अधिकारों के लिए लड़ने वाले सामाजिक कार्यकर्ता किशोर तिवारी कहते हैं, "आमतौर पर किसानों की आत्महत्या चुनावी मुद्दा भी नहीं बनती।" इस बार भी विदर्भ में किसानों की आत्महत्या और उन पर क़र्ज़ का बोझ चुनावी मुद्दा नहीं है।
विदर्भ इलाक़े में दस लोकसभा सीटें हैं, पिछले दस-पंद्रह वर्षों से इन सीटों पर भाजपा, शिवसेना, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और कांग्रेस को जीत मिलती रहती है लेकिन किसानों की समस्या पर ज़ोरदार आवाज़ संसद में कभी सुनने को नहीं मिलती। इस बार यहां चुनावी मुद्दा है विदर्भ के लिए एक अलग राज्य की मांग।
यहां के वरिष्ठ नेताओं के अनुसार विदर्भ अगर एक अलग राज्य बना तो इसका विकास तेज़ी से होगा और इससे यहां के कपास के किसानों को भी फ़ायदा होगा। विदर्भ के लगभग सभी गांव पिछड़े हैं। दाहेगांव में दूर-दूर तक पक्के घर नहीं दिखते। घरों के बाहर महिलाएं और बच्चे फटे-मैले कपड़ों में ही नज़र आते हैं। इंदिरा को अपनी उम्र नहीं मालूम लेकिन पड़ोसियों की माने तो वह 40 या इससे एक-दो साल अधिक की हैं। मगर वह अपनी उम्र से ज़्यादा की लगती हैं। वह कहती हैं, “मेरे जीवन में केवल दुःख ही दुःख है।”
कर्ज के चलते कर रहे आत्महत्या
1996 से लेकर अब तक नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक़, देश भर में दो लाख 96 हज़ार किसानों ने आत्महत्या की है। विदर्भ में विधवाओं की संख्या 10,500 से अधिक है। सरकार इन विधवाओं के लिए अब तक कोई दीर्घकालिक योजना पेश नहीं कर सकी है।
दिल्ली में इन लोगों के लिए कोई बोलने वाला नहीं है और ये लोग चुनाव में कभी मुद्दा नहीं बनने वाले हैं। ये लोग मुख्यधारा से कटे हुए हैं और ग़रीबी में पिस रहे हैं। पति के मरने के बाद भी क़र्ज़ ने इंदिरा का साथ नहीं छोड़ा है। उन्होंने कहा, "मेरे पति ने 30 हज़ार रुपए के क़र्ज़ का बोझ छोड़ा था। उसमें से कुछ वापस किया है लेकिन लड़की की शादी के कारण नया क़र्ज़ भी चढ़ गया है।"
किसी किसान की आत्महत्या के बाद सरकार उसके परिवार को एक लाख रुपए मुआवज़े के तौर पर देती है लेकिन इंदिरा की बदक़िस्मती थी कि उसके पति सरकारी रिकॉर्ड में किसानों की श्रेणी में नहीं आते क्योंकि वह अपने पिता की ज़मीन पर कपास उगाते थे। सरकारी नियमों के मुताबिक़ किसान की मौत पर परिवार को मुआवज़ा तभी मिलता है जब ज़मीन का पट्टा मृत व्यक्ति के नाम पर हो।
इंदिरा को नहीं मिला मुआवजा
आत्महत्या के हज़ारों मामले ऐसे हैं जिनमें किसान ख़ानदानी ज़मीन पर खेती कर रहे थे लेकिन ज़मीन उनके पिता या अन्य रिश्तेदार के नाम पर थी। इंदिरा को तकनीकी कारणों से मुआवज़ा नहीं मिला। वह कहती हैं, “मैंने सरकारी दफ्तरों के कई चक्कर लगाए लेकिन एक पैसा भी नहीं मिला।”
इंदिरा ने मज़दूरी करके अपने चार बच्चों की परवरिश की। दोनों बेटियों की शादी की। दो बेरोज़गार बेटे अब उसके साथ रहते हैं। वह हाथ जोड़कर अपने बच्चों की नौकरी के लिए विनती करती है। उनका बड़ा बेटा 19 साल का है जो हाईस्कूल पास है जबकि छोटा बेटा स्कूल की पढ़ाई छोड़ चुका है। इंदिरा ने अपनी दोनों बेटियों को कभी स्कूल नहीं भेजा और उनकी शादी बालिग होने से पहले ही कर दी।
मतदान में दिलचस्पी नहीं
इंदिरा चुनाव में अपने मत का इस्तेमाल नहीं करतीं क्योंकि “उनकी फ़रियाद कोई नहीं सुनता।” राज्य और केंद्र सरकार ने विदर्भ और देश के दूसरे हिस्सों में क़र्ज़ में डूबे हुए किसानों के लिए कई पैकेज़ दिए हैं लेकिन दाहेगांव जैसे पिछड़े इलाक़ों में किसानों की निरक्षरता के कारण वो इसका फ़ायदा नहीं उठा पाते।
सरकारी पैकेज़ से बैंक के क़र्ज़े तो माफ़ हो सकते हैं लेकिन साहूकारों से लिए गए क़र्ज़ से जान छुड़ाना मुश्किल है। साहूकार 25 प्रतिशत से लेकर 100 प्रतिशत ब्याज वसूल करते हैं, ब्याज दर साहूकार की मर्ज़ी और किसान की मजबूरी के हिसाब से तय होती है। मैं इस गांव की दूसरी विधवाओं से भी मिला, सबका हाल बुरा है लेकिन किसी ने दोबारा शादी नहीं की।
इंदिरा 32 या 33 वर्ष में विधवा हो गई थी. वो दोबारा शादी कर सकती थी लेकिन दो कारणों से नहीं की। ये सामाजिक रीति-रिवाज़ों के ख़िलाफ़ है और दूसरे अपने बच्चों की ख़ातिर। वह कहती हैं, “अगर मैं दूसरी शादी करती तो बच्चों को कौन संभालता?