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हिंदी दिवस: काशी में हिंदी की सबसे बड़ी पीठ बदहाल

अनूप ओझा/अमर उजाला, वाराणसी। Updated Mon, 14 Sep 2015 02:50 PM IST
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varanasi nagari pracharini sabha is in critical condition
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खड़ी बोली हिंदी को आकार देने वाली नागरी प्रचारिणी सभा आज बदहाली के दौर से गुजर रही है। हिंदी के प्रचार और शोध के लिए 16 जुलाई, 1893 में स्थापित संस्था नागरी प्रचारिणी सभा फिलहाल अपने पूर्वजों के पुण्य-प्रताप के सहारे किसी तरह जिंदा है।
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भवन के किराए, पुस्तकालय के अलावा अन्य स्रोतों से होने वाली आय से किसी तरह इसका खर्च चल रहा है। केंद्र और राज्य सरकारों की ओर से प्रचारिणी के लिए वर्षों से एक धेले का बजट न होने की वजह से वहां पांडुपिलियों और ग्रंथों के रूप में हिंदी की अकूत संपदा नष्ट होने के कगार पर है। मामूली मानदेय पर तैनात कर्मचारी हिंदी साहित्य की इस अनमोल थाती की रखवाली कर रहे हैं।


भारतेंदु युग के बाद हिंदी साहित्य की उल्लेखनीय गतिविधियों, उनके नियमन और नियंत्रण, संचालन में महत्वपूर्ण योगदान के लिए जानी जाने वाली प्रचारिणी की स्थापना क्वींस कॉलेज के नौवीं कक्षा के तीन छात्रों बाबू श्याम सुंदर दास, पं. राम नारायण मिश्र, शिवकुमार सिंह ने की थी। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी और रामचंद्र शुक्ल जैसे हिंदी साहित्य की दिग्गजों की बदौलत इस संस्था की ख्याति हिंदी जगत में फैली। दुर्लभ पुस्तकों का प्रकाशन यहां से हुआ।

हिंदी के प्रचार और शोध की केंद्र रही यह संस्था अब बरबादी के कगार पर पहुंच गई है। भवन के किराए, पुस्तकालय और प्रकाशनों से होने वाली आय से इसका खर्च चल रहा है। पुस्तकालय की जर्जर हो चुकी आलमारियों में रखी तमाम दुर्लभ पांडुलिपियों और किताबों का संरक्षण भगवान भरोसे ही है।

वर्ष 1900 में गांव-गांव, घर-घर पांडुलिपियों और ग्रंथों की खोज गई और यहां संग्रह किया गया था। आज प्रचारिणी के पास 20 हजार से अधिक पांडुलिपियां, 50 हजार से अधिक पुरानी पत्रिकाएं और 1.25 लाख से अधिक ग्रंथों का भंडार है। हिंदी की इस थाती के संरक्षण के लिए संस्था के पास पर्याप्त धन नहीं है।

प्रचारिणी के सहायक मंत्री ब्रजेश चंद्र पांडेय के मुताबिक आधुनिक हिंदी के जनक भारतेंदु बाबू के फुफेरे भाई बाबू राधाकृष्ण दास सभा के पहले अध्यक्ष बने। काशी के सप्तसागर मोहल्ले की घुड़साल में तब इसकी बैठकें होती थीं। करीब 25 साल से एक धेला बजट सरकार की ओर से नहीं मिला है।

सुधाकर द्विवेदी, जार्ज अब्राहम ग्रियर्सन, अंबिकादत्त व्यास, चौधरी प्रेमघन जैसे विद्वान पहले ही साल प्रचारिणी के सदस्य बन गए थे। हिंदी साहित्य का इतिहास, हिंदी विश्वकोश जैसे ग्रंथों का प्रकाशन प्रचारिणी से ही किया गया था। अब अगर इसकी बदहाली दूर करने की दिशा में प्रयत्न नहीं शुरू किए गए तो आने वाली पीढ़ियां इस लापरवाही के लिए माफ नहीं करेंगी।

डॉ. जितेंद्र नाथ मिश्र- सदस्य नागरी प्रचारिणी सभा ने बताया कि नागरी प्रचारिणी सभा अपने हाल पर किसी तरह जिंदा है। इसका स्वतंत्रता आंदोलन में भी बहुत बड़ा योगदान रहा है। यह संस्था राष्ट्रीय धरोहर है। इसका संपूर्ण संरक्षण केंद्र सरकार को अपने हाथ में ले लेना चाहिए।
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