अगले जनम मोहे बिटिया ही दीजौ....

मनीषा चौरसिया/ अमर उजाला, वाराणसी Updated Tue, 21 Jan 2014 11:56 AM IST
varanasi beti hi bachayegi
बेटियां क्या बेटों के बराबर नहीं है, बेटे के बराबर काम कर रही हैं, बेटे की कमी महसूस नहीं होने दे रही हैं, यही नहीं, बेटी नहीं होगी तो सृष्टि नहीं होगी और बेटे भी नहीं होंगे। फिर बेटियों के लिए व्रत क्यों नहीं।

यह सवाल है उन मांओं का, जिनके केवल पुत्रियां ही हैं। खास बात यह है कि उन्होंने पुत्रों की दीर्घायु के लिए रखा जाने वाला शकट (गणेश संकष्टी चतुर्थी) व्रत रखा है और उनकी दीर्घायु के लिए चंद्रमा को अघ्र्य भी दिया है।

इन मांओं का यह भी कहना है कि अगले जन्म में भी भगवान उनको बेटी जरूर दे। यानी संतति रक्षा के व्रत के जरिए बेटी और बेटों में फर्क मिटाने वाली इन माताओं की यह कोशिश सामाजिक बदलाव की दिशा में मील का पत्थर गढ़ रही हैं।

डीएलडबल्यू के अशर्फी नगर की किरन ने अपनी दो पुत्रियों मुस्कान (10) और मासूम (9) की लंबी उम्र के लिए संकटा चतुर्थी का व्रत रखा। वह अपनी बेटियों के लिए जीवित्पुत्रिका व्रत भी रखती हैं।

इनका मानना है कि जो काम कोई बेटा करता है वो सारे काम मेरी बेटियां कर रहीं हैं। ऐसे में उनकी सलामती की प्रार्थना क्यों न की जाए।

यहीं की सीमा अपनी दो बेटियों भूमि (8) और आराध्या (4) के लिए पहली बार शकट व्रत रख रही हैं। बेटियों की जिंदगी में कोई कष्ट या बाधा न आए, इस कामना के साथ अघ्र्य दिया।

जवाहर नगर की प्रीति इंद्रेश भी अपनी दो बेटियों तनिष्क और योशा के लिए व्रत रहीं। भदैनी की दीपमाला ने अपनी दो साल की बेटी परी के लिए व्रत रखा।

कल्पना चौरसिया ने अपनी पुत्रियों स्वाती (25) और दिव्या(22), लिली अग्रवाल ने अपनी तीन साल की पुत्री सिद्धि और ईश्वरगंगी की अनामिका ने अपनी दो बेटियों झलक (8) और अनोखी (4) के लिए गणेश संकटी चतुर्थी का व्रत रखकर उनकी लंबी उम्र के लिए अघ्र्य दिया।

इन महिलाओं का मानना है कि अपने सपने पूरे करने और अरमानों को सजाने के लिए बेटियां जब कदम बढ़ाना चाहती हैं तो उन्हें उपेक्षा का शिकार होना पड़ता है।

कभी रिश्ते-नाते, रस्मों की जंजीरों से बेटियां जकड़ी जाती हैं तो कभी परिवार के शान के नाम पर उनका ही गला घोंटा जाता है। ऐसे में इस तरह की पहल बेटियों को बराबरी का दर्जा दिलाने में मदद करेगी।

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