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उत्तराखंड सरकार के जमीन खरीद कानून को हरी झंडी

Wed, 07 Aug 2013 12:01 AM IST
नई दिल्ली/पीयूष पांडेय
नई दिल्ली/पीयूष पांडेय Updated Wed, 07 Aug 2013 12:01 AM IST
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uttarakhand government land purchase act approval

जमीन खरीद की सीमा तय करने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड सरकार को बड़ी राहत प्रदान की है।

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राज्य सरकार की ओर से दायर याचिका पर सर्वोच्च अदालत ने हाईकोर्ट के उस आदेश को दरकिनार कर दिया है, जिसमें भूमि खरीदने की सीमा तय करने के कानून को निरस्त कर दिया गया था।

राज्य सरकार ने उत्तराखंड (उत्तर प्रदेश) जमींदारी उन्मूलन अधिनियम में धारा-154 (3,4,5), 129(ब), 152(अ) को शामिल किया था। इसमें यह साफ किया गया था कि 12 सितंबर, 2003 तक जिन लोगों के पास राज्य में जमीन है, वह 12.5 एकड़ तक जमीन खरीद सकते हैं।
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मगर जिनके पास जमीन नहीं है, वह इस तिथि के बाद 250 वर्ग मीटर से ज्यादा जमीन नहीं खरीद सकते हैं।

इससे ज्यादा जमीन खरीदने के लिए राज्य सरकार से इजाजत लेने का प्रावधान किया गया है। हाईकोर्ट ने इसी प्रावधान को निरस्त कर दिया था, जिसे अब सर्वोच्च अदालत ने हरी झंडी प्रदान कर दी।
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जस्टिस बीएस चौहान की अध्यक्षता वाली पीठ ने अधिवक्ता रचना श्रीवास्तव की दलीलों से सहमति जताते हुए राज्य सरकार की ओर से बनाए गए कानून को निरस्त करने वाले नैनीताल हाईकोर्ट के आदेश को दरकिनार कर दिया।

अधिवक्ता ने तर्क दिया कि कृषि भूमि की कमी के चलते प्रदेश सरकार ने किसी भी बिल्डर, व्यवसायी या उद्योगपति को असीमित जमीन की खरीद पर रोक लगाने के लिए अधिनियम में संशोधन किया था।

इसी वजह से राज्य सरकार की ओर से अधिनियम में संशोधन कर जमीन खरीदने की सीमा तय कर दी गई थी। मगर हाईकोर्ट ने इस मामले में राज्य सरकार के उन पक्षों का ध्यान नहीं रखा, जो सुरक्षा और कृषि भूमि को बचाने के लिए उठाए गए।

याद रहे कि राज्य सरकार की याचिका पर गत वर्ष अक्टूबर में शीर्षस्थ अदालत ने प्रतिपक्ष सर्वेश शर्मा व अन्य को नोटिस जारी किया और हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगा दी थी।

सर्वोच्च अदालत ने राज्य की अधिवक्ता के उस तर्क से भी सहमति जताई, जिसमें कहा गया कि प्रदेश में 12 प्रतिशत ही कृषि भूमि है, जिसकी अनैतिक खरीद को रोकने के लिए यह कानून लाया गया था। राज्य की सीमाएं चीन और नेपाल से मिलती हैं।

अधिनियम में वर्ष 2003 में संशोधन करने का एक प्रायोजन यह भी था कि देश की अंतरराष्ट्रीय सीमा अनैतिक तरीके से खरीदी जा रही कृषि भूमि से प्रभावित न हो क्योंकि चीन या नेपाल के किसी नागरिक की ओर से किसी तरीके से असीमित तौर पर जमीनी खरीदी जाती है तो सीमा के असुरक्षित होने की संभावना भी बढ़ जाती है। लेकिन हाईकोर्ट ने इन आधारों और तथ्यों पर गौर नहीं किया।

हाईकोर्ट ने सर्वेश व अन्य की ओर से दायर याचिका पर राज्य सरकार की ओर से अधिनियम में किए गए संशोधन को समानता के अधिकार (अनुच्छेद-14) के उल्लंघन के आधार पर निरस्त किया था।


हाईकोर्ट का कहना था कि जिसके पास राज्य में जमीन है, उसे 12.5 एकड़ जमीन खरीदने की इजाजत है और जिसके पास जमीन नहीं उसे महज 250 स्क्वायर मीटर जमीन खरीदने का ही हक है। यह समानता के अधिकार का उल्लंघन है।

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