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उत्तर प्रदेश आज क्यों है निरुत्तर प्रदेश?

Mon, 28 Jul 2014 05:03 PM IST
राजेश प्रियदर्शी/डिजिटल एडिटर, बीबीसी
राजेश प्रियदर्शी/डिजिटल एडिटर, बीबीसी Updated Mon, 28 Jul 2014 05:03 PM IST
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uttar pradesh in media because of bad news

देश का सबसे बडी आबादी वाला राज्य, बीमारू का उ, उत्तर प्रदेश फिर गलत वजहों से चर्चा में है। कबीर, जायसी, रसखान की प्रेम-भक्ति से सराबोर धरती पर दंगे भड़क रहे हैं।

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जिसे गंगा-जमुनी तहजीब कहते हैं, उसी गंगा-जमुना का दोआबा सुलग रहा है।

शाहहारूनपुर, जिसे आज सहारनपुर के नाम से जाना जाता है, 14वीं सदी में सूफी संत शाह हारून चिश्ती का ठिकाना था, वे प्रेम और भाईचारे का संदेश दे रहे थे।

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सोचने पर मजबूर करते हैं आज के हालात

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सहारनपुर के दक्षिण में, शायर जिगर का शहर, पीतल की कारीगरी का शहर, शाहजहां के बेटे मुराद बख्श के नाम पर बसाया गया मुरादाबाद भी झुलस रहा है। मुजफ्फरनगर के घाव अभी भरे नहीं हैं।

उत्तर प्रदेश जैसा राज्य भारत में कोई नहीं जिसके हर शहर और कस्बे की अलग पहचान है।

अलीगढ़ के ताले, काकोरी के कबाब, मुरादाबाद की पीतल की कारीगरी, फिरोजाबाद की चूडियां, खुर्जा की पॉटरी, मथुरा के पेडे़, बनारस की साडी...ये लिस्ट काफी लंबी है। ऐतिहासिक मंदिर, मस्जिद और दरगाह चप्पे-चप्पे पर हैं।

देश को अनेक प्रधानमंत्री देने वाला उत्तर प्रदेश कितना अहम है इसको समझे बिना नरेंद्र मोदी भी प्रधानमंत्री नहीं बन सकते थे। उत्तर प्रदेश वो राज्य है जिसने एक गुजराती को देश का प्रधानमंत्री बनाया है।

संस्कृति का हृदय स्थल है यूपी

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नाच-गाना, खान-पान, दस्तकारी, शायरी-कव्वाली, धर्म-दर्शन से लेकर सियासत तक, जीवन का वो कौन सा हिस्सा है जिस पर उत्तर प्रदेश की गंगा-जमुनी संस्कृति की छाप न हो। उत्तर भारत की संस्कृति का हृदयस्थल अगर कोई है तो वह उत्तर प्रदेश है।

जब कोई समाजवादी, सेकुलर, वामपंथी और हिंदू राष्ट्रवादी नहीं था, तब की है ये संस्कृति। गंगा जमुनी संस्कृति का मतलब होता है मिली-जुली संस्कृति।

एक साहब पूछ बैठे कि गंगा हमारी पवित्र नदी है, यमुना भी, क्या सोचकर यमुना को आपने मुसलमानों के खाते में डाल दिया? इसका जवाब देने के बदले मुस्कराना ही बेहतर है।

अवध के नवाब वाजिद अलीशाह ने वसंत के महीने में वृंदावन में भगवान कृष्ण के श्रृंगार के लिए लाखों की भेंट भेजी थी, महारानी अहिल्याबाई ने हजारों मुस्लिम जुलाहों को संरक्षण दिया, बनारस में साडी का कारोबार फला-फूला, उन्होंने काशी विश्वनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार भी किया।

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'मांग के खाइबौ, मसीत पे सोइबौ'

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तुलसीदास ने धर्मांध पंडितों की आलोचना से दुखी होकर कहा था- 'मांग के खाइबौ, मसीत पे सोइबौ', मस्जिद में सोने की बात करने वाले तुलसीदास रघुवर को 'गरीबनवाज' कहते हैं।

मुसलमान राजाओं के दरबारी हिंदू थे और हिंदू राजाओं के सिपाहसालार तुर्क, अफगान और पठान। सब अपना मजहब मानते थे और दूसरे के रास्ते में नहीं आते थे।

यह सब न तो किसी पॉलिटिकल करेक्टनेस के तहत था, न खुद को सेकुलर साबित करने के लिए, न ही किसी खास तबके को खुश करने के लिए। यह जिंदगी जीने का ढंग था, ढंग जो उत्तर प्रदेश ने सबको सिखाया।

एक-दूसरे के रीति-रिवाज निभाते हैं लोग

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फैजाबाद के खड़ाऊं-कमंडल बनाने वाले मुसलमान, ताजिया उठाने वाले हिंदू कोई विचित्र जीव या अपवाद नहीं हैं। वे एक सहज मिले-जुले समाज के चलते-फिरते, नाचते-गाते, खाते-कमाते लोग हैं जो पिछले पाँचेक सौ साल से इसी तरह जीते आए हैं, लेकिन पिछले पचास-साठ साल की सियासत के शिकार होकर बिखरते जा रहे हैं।

उत्तर प्रदेश का जितना असर हमारी साझा विरासत और संस्कृति पर है, उसके दरकने-चटकने का असर भी पूरे देश पर होगा। सहारनपुर, मुरादाबाद और मुजफ्फरनगर न हों इसका क्या उपाय है?

इस सवाल के जवाब में उत्तर प्रदेश फिलहाल निरुत्तर प्रदेश है।

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