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दिल्ली के दूध में यूरिया नहीं, बाकी का पता नहीं
पीयूष पांडेय/नई दिल्ली
Updated Wed, 03 Oct 2012 12:48 AM IST
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दिल्ली में बिकने वाले दूध में यूरिया की मिलावट नहीं होती। दिल्ली सरकार ने यह दावा सुप्रीम कोर्ट में मिलावटी दूध की खुलेआम बिक्री और मिलावटखोरों के खिलाफ कार्रवाई में नाकाम रहने के आरोप को नकारते हुए किया। दिल्ली सरकार ने डिटरजेंट, रिफाइंड ऑयल, कास्टिक सोडा की मिलावट से सिंथेटिक दूध तैयार किए जाने से इनकार नहीं किया है। दूसरी ओर, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, हरियाणा और राजस्थान ने अब तक जनता के स्वास्थ्य से जुड़े इस मुद्दे पर जवाब देना भी जरूरी नहीं समझा है।
सर्वोच्च अदालत ने 9 मई को भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद्, भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण सहित कई वैज्ञानिक परीक्षणों का हवाला देने वाली याचिका पर केंद्र व राज्य सरकारों को नोटिस जारी किया था। स्वामी अच्युतानंद तीरथ सहित अन्य लोगों की ओर से दायर याचिका पर चार सप्ताह में जवाब दायर करना था, लेकिन दिल्ली को छोड़कर अब तक किसी ने भी जवाब दायर नहीं किया।
दिल्ली सरकार के उपायुक्त एसके नंदा ने हलफनामे में कहा है कि गत तीन वर्षों में लिए गए सैंपल में दूध और उससे बने अन्य उत्पादों में यूरिया नहीं पाया गया है। 2009 में खोए के 95 में तीन सैंपल मिलावटी पाए गए, जबकि 2010 में 126 में 7 सैंपल मिलावटी थे। वहीं 2011 में 64 सैंपल में कोई मिलावटी नहीं था। इसके बाद इस साल के मध्य तक लिए गए 79 सैंपल में भी मिलावट नहीं पायी गई।
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हलफनामे में दिल्ली सरकार ने कहा है कि 2009 में दूध के 225 सैंपल लिए गए, जिनमें 39 मिलावटी पाए गए थे। 2010 में 164 में 14 सैंपल मिलावटी थे, जबकि 2011 में 65 में 16 सैंपल मिलावटी थे। हालांकि इसके बाद लिए गए 17 सैंपल में कोई मिलावट नहीं पायी गई।
हालांकि दिल्ली सरकार ने खोए और दूध में सिर्फ यूरिया न होने का दावा किया है, जबकि याचिकाकर्ता ने दूध और उससे बने उत्पादों में अन्य नुकसानदेह पदार्थों की मिलावट की भी बात की थी। याचिकाकर्ता के अधिवक्ता अनुराग तोमर के मुताबिक दिल्ली सरकार का जवाब अधूरा है, क्योंकि अन्य पदार्थों के जरिए दूध व उससे निर्मित पदार्थों में मिलावट के संबंध में स्पष्टीकरण नहीं दिया गया है।
गौरतलब है कि याचिका में कहा गया है कि सरकारी प्राधिकरण के सर्वे के मुताबिक जनवरी 2011 में 33 राज्यों से 1791 नमूने लिए गए। इनमें से 1226 नमूने पीने योग्य नहीं पाए गए। इस तरह 68 प्रतिशत नमूनों में मिलावट पाई गई। सबसे अधिक उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के 88 प्रतिशत नमूने विफल रहे। इसके बावजूद मिलावटखोरों के खिलाफ कदम उठाने में सरकारें नाकाम साबित हुई हैं। याचिकाकर्ता ने सरकारों को इस मसले पर सख्त निर्देश जारी करने की गुजारिश की है।
दूध में मिलावट के नुकसान
सिंथेटिक दूध स्वास्थ्य के लिए बेहद खतरनाक है। इससे कैंसर व अन्य घातक बीमारियां पनप रही हैं। डॉक्टरों के मुताबिक सफेद दाग की बढ़ती बीमारी भी सिंथेटिक दूध की देन है। इसे बनाने में फारमोलिन आदि रसायन का जमकर इस्तेमाल हो रहा है। यूरिया और साबुन के घोल के मिश्रण से पेट के साथ आंतें भी खराब हो जाती हैं।
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सर्वोच्च अदालत ने 9 मई को भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद्, भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण सहित कई वैज्ञानिक परीक्षणों का हवाला देने वाली याचिका पर केंद्र व राज्य सरकारों को नोटिस जारी किया था। स्वामी अच्युतानंद तीरथ सहित अन्य लोगों की ओर से दायर याचिका पर चार सप्ताह में जवाब दायर करना था, लेकिन दिल्ली को छोड़कर अब तक किसी ने भी जवाब दायर नहीं किया।
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दिल्ली सरकार के उपायुक्त एसके नंदा ने हलफनामे में कहा है कि गत तीन वर्षों में लिए गए सैंपल में दूध और उससे बने अन्य उत्पादों में यूरिया नहीं पाया गया है। 2009 में खोए के 95 में तीन सैंपल मिलावटी पाए गए, जबकि 2010 में 126 में 7 सैंपल मिलावटी थे। वहीं 2011 में 64 सैंपल में कोई मिलावटी नहीं था। इसके बाद इस साल के मध्य तक लिए गए 79 सैंपल में भी मिलावट नहीं पायी गई।
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हलफनामे में दिल्ली सरकार ने कहा है कि 2009 में दूध के 225 सैंपल लिए गए, जिनमें 39 मिलावटी पाए गए थे। 2010 में 164 में 14 सैंपल मिलावटी थे, जबकि 2011 में 65 में 16 सैंपल मिलावटी थे। हालांकि इसके बाद लिए गए 17 सैंपल में कोई मिलावट नहीं पायी गई।
हालांकि दिल्ली सरकार ने खोए और दूध में सिर्फ यूरिया न होने का दावा किया है, जबकि याचिकाकर्ता ने दूध और उससे बने उत्पादों में अन्य नुकसानदेह पदार्थों की मिलावट की भी बात की थी। याचिकाकर्ता के अधिवक्ता अनुराग तोमर के मुताबिक दिल्ली सरकार का जवाब अधूरा है, क्योंकि अन्य पदार्थों के जरिए दूध व उससे निर्मित पदार्थों में मिलावट के संबंध में स्पष्टीकरण नहीं दिया गया है।
गौरतलब है कि याचिका में कहा गया है कि सरकारी प्राधिकरण के सर्वे के मुताबिक जनवरी 2011 में 33 राज्यों से 1791 नमूने लिए गए। इनमें से 1226 नमूने पीने योग्य नहीं पाए गए। इस तरह 68 प्रतिशत नमूनों में मिलावट पाई गई। सबसे अधिक उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के 88 प्रतिशत नमूने विफल रहे। इसके बावजूद मिलावटखोरों के खिलाफ कदम उठाने में सरकारें नाकाम साबित हुई हैं। याचिकाकर्ता ने सरकारों को इस मसले पर सख्त निर्देश जारी करने की गुजारिश की है।
दूध में मिलावट के नुकसान
सिंथेटिक दूध स्वास्थ्य के लिए बेहद खतरनाक है। इससे कैंसर व अन्य घातक बीमारियां पनप रही हैं। डॉक्टरों के मुताबिक सफेद दाग की बढ़ती बीमारी भी सिंथेटिक दूध की देन है। इसे बनाने में फारमोलिन आदि रसायन का जमकर इस्तेमाल हो रहा है। यूरिया और साबुन के घोल के मिश्रण से पेट के साथ आंतें भी खराब हो जाती हैं।