आम तोड़ने का ऐसा मुकदमा, पढ़कर आपको भी आ जाएगा पसीना
इलाहाबाद की मऊआइमा पुलिस ने साबित कर दिया कि मुकदमा दर्ज कराना कोई हंसी खेल नहीं है। थाने में शिकायत दर्ज करना तो दूर अदालत के आदेश पर भी दशकों पीड़ित को भटकना पड़ सकता है। देवरा के बाबूलाल के साथ कुछ ऐसा ही हुआ कि उनको अपनी शिकायत दर्ज कराने में 12 साल लग गए।
आम तोड़ने के मामूली विवाद में हुई मारपीट की शिकायत दर्ज कराने में जो पापड़ बेलने बाबूलाल को बेलने पड़े वह अपने आप में एक नजीर है। शिकायत लेकर पहले वह थाने गए। थाने वालों ने शिकायत दर्ज किए बिना भगा दिया तो बाबू लाल ने आला पुलिस अधिकारियों से फरियाद की पर वह भी बेमानी रही। हारकर उन्होंने अदालत की शरण ली।
156(3) सीआरपी के तहत प्रार्थनापत्र देकर अदालत से फरियाद की। कोर्ट ने 15 नवंबर 2003 को मऊआइमा थाने को मुकदमा दर्ज कर जांच करने का आदेश दिया। अदालत का आदेश थाने पहुंचा तो पर उसका पालन नहीं हुआ। बाबूलाल थाने और अदालत का चक्कर काटते रहे। कोर्ट थाने से बार-बार आख्या मांगती रही और हर बार केस में डेट लगती रही।
आखिर 12 साल बाद दर्ज हुआ मुकदमा
स्पेशल सीजेएम रश्मि नंदा ने पत्रावली पर संज्ञान लेते हुए गत आठ जून को एसओ मऊआइमा को कारण बताओ नोटिस जारी करते हुए तलब कर लिया। इस समाचार को अमर उजाला ने प्रमुखता से प्रकाशित किया था। इसके बाद हरकत में आई पुलिस ने चार जून को सात लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया।
मऊआइमा के देवरा निवासी बसंत, शंकर, सहदैया, विमला, शिमली, कटकहिया व सहायमुहादिया के खिलाफ घर में घुसकर मारपीट करने, बलवा और जान से मारने की धमकी देने का मुकदमा दर्ज हुआ है।
प्रकरण के अनुसार 25 अप्रैल 2003 को सुबह छह बजे अभियुक्तगण ने वादी के पेड़ से जबरदस्ती आम तोड़ने का प्रयास किया। मना करने पर उसके घर में घुसकर मारापीटा।