'मोदी बनाम मायावती' होगा यूपी का चुनाव, सपा लड़ाई से बाहर
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मैं टैक्सी ड्राइवर के चुनाव विश्लेषण पर पूरा भरोसा करता हूँ।बीते दिनों लखनऊ में एक टैक्सी ड्राइवर ने मुझसे कहा था, "इस बार लड़ाई भाजपा और बसपा के बीच है।
समाजवादी पार्टी जानती है कि वह दौड़ से बाहर है।" उन्होंने समाजवादी पार्टी के कथित मुस्लिम तुष्टिकरण की निंदा की और फिर राजनीति के तीन मूल 'सी'- 'क्राइम', 'करप्शन' और 'कास्ट' यानी अपराध, भ्रष्टाचार और जाति के बारे में बताया। उनके उत्तर साफ थे।
लेकिन जब मैंने उनसे पूछा कि क्या भाजपा को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करना चाहिए, तो उन्होंने कहा, "आपने सबसे मुश्किल सवाल कर दिया।" मुख्यमंत्री उम्मीदवार के नाम पर भाजपा उत्तर प्रदेश में उसी दोराहे पर खड़ी नजर आती है जिस पर वह दिल्ली और बिहार में थी।
दिल्ली में उसने प्रचार अभियान शुरू होने के बहुत बाद मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया और वह भी कमजोर। किरण बेदी कहीं से भी अरविंद केजरीवाल के मुकाबले नहीं ठहरती थीं।
बिहार में जंग 'नीतीश बनाम मोदी' हुई
बिहार में मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित न करने से वहां जंग 'नीतीश बनाम मोदी' हो गई। नतीजा यह हुआ कि नए वादों के साथ विरोधियों को चुनौती देने वाली पार्टी के बजाय भाजपा केंद्र सरकार के कामकाज का बचाव करती रही।
मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार न होने से नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव को पिछड़े वर्गों को यह डर दिखाने का मौका मिला कि अगर भाजपा जीती तो मुख्यमंत्री अगड़ी जाति का होगा। इसी तरह उत्तर प्रदेश में भी बिहार की तर्ज पर प्रचार 'मोदी बनाम मायावती' हो सकता है।
भाजपा को यह डर भी है कि अगर वह मुख्यमंत्री के पद के लिए नाम का ऐलान कर देगी तो अंदरूनी कलह और दलबंदी शुरू हो जाएगी। इससे बेहतर रहेगा कि सभी लोगों को कयास लगाने दो और सभी नेताओं और जाति आधारित गुटों को पार्टी को जिताने के लिए जीतोड़ मेहनत करने दो।
इन मतभेदों से पार पा सकेंगे मोदी, अमित शाह
अगर भाजपा पिछड़ी जाति के किसी नेता को मुख्यमंत्री का उम्मीदवार घोषित करेगी तो अगड़ी जातियां शायद भाजपा से किनारा कर लें। इसी तरह भाजपा किसी ब्राह्मण को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करेगी तो ठाकुर विद्रोह कर सकते हैं।
लेकिन क्या मोदी और अमित शाह, आरएसएस की चुनाव जिताने वाली मशीनरी के साथ भी इतने ताकतवर नहीं है कि इन मतभेदों से पार पा सकें?
आखिर कितना मुश्किल होगा कि एक ठाकुर को पार्टी अध्यक्ष बना दो, ब्राह्मणों को उनकी आबादी के अनुपात से ज्यादा टिकट दे दो और एक लोकप्रिय ओबीसी नेता को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बना दो? हां, यह ठीक है कि भाजपा के पास उत्तर प्रदेश में ऐसा कोई नेता नहीं जो मायावती को टक्कर दे सके। अभी चुनाव में एक साल से ज्यादा समय है।
ऐसे में क्या भाजपा राष्ट्रपति चुनाव के तर्ज पर प्रचार अभियान नहीं चला सकती?क्या वह मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार को वास्तविकता से बड़ा नहीं दिखा सकती? नरेंद्र मोदी राजनीतिक रूप से 'अछूत' समझे जाते थे। भाजपा ने उन्हें प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया और लोकसभा की 282 सीटें जीत गई।
भाजपा के किस नेता से करेंगे तुलना?
राष्ट्रपति चुनाव की तर्ज पर प्रचार अभियान चलाने की वजह से भाजपा 30 साल पुरानी गठबंधन राजनीति को खत्म कर बहुमत में आ सकी।
राष्ट्रपति चुनाव जैसे प्रचार अभियान चलाने वाली भाजपा के लिए यह मुश्किल होगा कि वह मतदाताओं को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार भी न बताएं और उनका समर्थन हासिल कर ले।
मतदाता जानते हैं कि अगर समाजवादी पार्टी जीती तो अखिलेश यादव और बहुजन समाज पार्टी जीती तो मायावती मुख्यमंत्री होंगी। वह इन नेताओं की तुलना भाजपा के किस नेता से करे?
साल 2014 में हुए महाराष्ट्र, झारखंड और हरियाणा के विधानसभा चुनावों में जहां भाजपा ने मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किए बिना जीत हासिल कर ली थी, हालत अलग थे। विरोधी खराब हालत में थे और मोदी की लोकप्रियता आसमान छू रही थी।
बिहार चुनाव से लेना होगा सबक
बिहार के अनुभव के बाद यह मुमकिन है कि भाजपा राज्य के चुनाव में प्रधानमंत्री को मैदान में ज्यादा न उतारे। वह इसके बजाए तीन-चार नेताओं के नाम पेश कर सकती है और सबको अटकलें लगाते छोड़ सकती है।
इससे सिर्फ मतदाताओं के दिमाग में भ्रम ही पैदा होता है और दूसरी पार्टियां ऐसे असमंजस का फायदा उठा सकती हैं। भारत में मोदी ने जो राजनीति शुरू की है, उसमें नेता खुद में एक संदेश होता है। अगर संदेश साफ है तो मतदाता साफ और निर्णायक फैसला दे सकता है।
यह बात दूसरे से ज्यादा मोदी को पता होनी चाहिए। उत्तर प्रदेश जैसे बड़े, जटिल और बहुध्रुवीय राज्य का चुनाव मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार का नाम साफ किए बगैर नहीं जीता जा सकता। स्पष्ट, निर्णायक, नेता-केंद्रित जनादेश का समय 2007 में मायावती के साथ ही आ गया था।
जीत का श्रेय साझा करने से डर रही मोदी-शाह की जोड़ी?
क्या इसकी वजह यह है कि मोदी-शाह की जोड़ी राज्य में जीत का श्रेय किसी स्थानीय नेता के साथ साझा करने से डर रही है? क्या इसका अर्थ यह है कि भाजपा ने कांग्रेस की हाईकमान संस्कृति अपना ली है?
फिलहाल, इस बारे में सिर्फ़ अटकलें ही लगाई जा सकती हैं। मुख्यमंत्री के नाम का ऐलान करने का समय यही है।इससे पार्टी को तैयारी का समय मिल जाएगा और उम्मीदवार को केंद्र में रखकर राष्ट्रपति चुनाव की तरह का चुनाव अभियान तैयार किया जा सकेगा।
भाजपा मोदी के व्यक्तित्व और हिंदुत्व पर खेलेगी दांव
इससे एक नए, स्वच्छ दावेदार और पुराने टिके हुए खिलाड़ियों के बीच प्रतियोगिता बन सकती है लेकिन लग रहा है कि भाजपा इसके बजाय मोदी के व्यक्तित्व और हिंदुत्व पर दांव खेलेगी।ऐसा करने से, बिहार की तरह ही एक बार फिर सत्ता के लिए इसकी बेचैनी दिखेगी।
इस तरह मतदाताओं को जीतने की संभावना न होने का संदेश जाएगा, जिसका फायदा मायावती को ही होगा। कांग्रेस की तरह उत्तर प्रदेश-बिहार को 'लुटियंस दिल्ली' की ऊंची जगह से देखना ही भाजपा की परेशानी का सबब बनेगा।