जज्बे को सलामः नहीं थे दोनों हाथ, फिर भी जीती दुनिया
समीर घोष एक अर्थशास्त्री हैं। उन्होंने टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज और लंदन स्कूल ऑफ इकॉनामिक्स से पढ़ाई की है।
समीर घोष ने अपनी जिदंगी में बहुत ही अच्छा एकेडमिक काम किया है। आठ साल की उम्र में ही उन्होंने अपने दोनों हाथ खो दिए थे। समीर ने तभी निश्चय कर लिया था कि वह कभी किसी की दया पर जीवित नहीं रहेंगे। उन्होंने निश्चय किया कि वह जिदंगी में संघर्ष करके आगे बढ़ेगे।
कृषि अर्थशास्त्री देविंदर शर्मा ने अपनी फेसबुक वॉल पर इस बाबत एक पोस्ट शेयर की है। देविंदर शर्मा कि पोस्ट के मुताबिक समीर घोष के दोनों हाथ नहीं है। इसके बावजूद वो बड़ी आसानी से अपना पूरा खाना खा लेते हैं।
देविंदर शर्मा ने लिखा है कि उन्होंने मुझसे पापड़ लाने के लिए कहा और अपना दायां पैर उठाकर मेज पर रख लिया है। अपने दाएं पैर की उंगलियों के सहारे उन्होंने चावल खाना शुरू कर दिया। हम दोनों ने एक साथ खाना खत्म किया और फिर साथ मंच पर बैठ गए। इसके बाद समीर घोष ने सामाजिक समावेश पर अपना प्रजेंटेशन देना शुरू किया।
समीर घोष आप मेरे भारत रत्न हैं!
देविंदर शर्मा लिखते हैं कि किसी भी व्यक्ति के जोश और लगन को विकलांगता खत्म नहीं कर सकती है। समीर घोष आप मेरे भारत रत्न हैं!
समीर घोष विश्व बैंक, सयुंक्त राष्ट्र संघ और योजना आयोग के साथ काम कर चुके हैं। वर्तमान में वह पुणे में रहते हैं और नेशनल रूरल लाइवलीहुड मिशन के साथ बतौर सलाहकार साथ काम करते हैं।
समीर घोष कार्यक्रम में अपने किसी भी निजी सहायक को साथ में नहीं लाए थे। जरा कल्पना करके देखिए समीर घोष कैसे अपने कमरे में रहते होंगे। बिना किसी सहायक और बिना अपने हाथों के सुबह अपने आप को हर दिन के लिए तैयार करते होंगे। कैसे शर्ट पहनते होंगे और कैसे अपनी शर्ट के बटन बंद करते होंगे।
जब उन्होंने बताया कि लंदन स्कूल ऑफ इकॉनामिक्स में अमर्त्य सेन के साथ काम किया है तो उनकी आंखों की चमक देखते बन रही थी। देविंदर शर्मा ने जब उनसे पूछा कि आप अपना लैपटॉप कैसे इस्तेमाल करते हैं तो समीर घोष ने जवाब दिया कि अपने पैरों के सहारे।