आखिर क्यों हो रही मोदी सरकार की फजीहत?
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सरकार की अनावश्यक आक्रामकता उस पर ही भारी पड़ती दिख रही है। अपार बहुमत के साथ सत्ता में आने वाली मोदी सरकार को दस माह के भीतर ही संसद में हार का मुंह देखना पड़ा है। संसद के दोनों सदनों में सरकार की रणनीति फेल नजर आ रही है।
मंगलवार को राज्यसभा में जहां सरकार को संख्या बल के मामले में हार का सामना करना पड़ा वहीं लोकसभा में बीमा विधेयक पेश करते समय विपक्ष ने मत विभाजन की मांग कर सदन के प्रति सरकार की जवाबदेही की बखिया उधेड़ी। यहां सरकार बेशक सदन में विधेयक प्रस्तुत करने में सफल रही।
मगर सरकार के 131 सांसद ही इस मौके पर लोकसभा में उपस्थित थे। सदन में भाजपा के अकेले दम पर ही 283 सांसद हैं। सरकार के फ्लोर प्रबंधकों को विपक्ष के दांव की भनक तक नहीं लग पाई। इसे सरकार के रणनीतिकारों की विफलता माना जा रहा है।
फ्लोर मैनेजरों को नहीं लगी विपक्ष के दांव की भनक
मगर सदन में सरकार की हास्यास्पद स्थिति के लिए रणनीतिकारों से ज्यादा बड़ी विफलता उसके अहंकार को माना जा रहा है। सरकार अब भी चुनावी मोड में नजर आ रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर संसदीय कार्य मंत्री वेंकैया नायडू तक के तेवर अति आक्रामक हैं।
विपक्षी नेताओं का कहना है कि मोदी सरकार में परिपक्वता का अभाव है। अपने आक्रामक रवैये से सरकार ने विपक्ष को एकजुट होने का बैठे बिठाए मौका दे दिया है। जिसके कारण सरकार को संसद में दोनों सदनों में मुश्किल का सामना करना पड़ रहा है। उसका कामकाज तो प्रभावित हो ही रहा है, सरकार को उल्टे फजीहत झेलनी पड़ रही है।
पीएम के आक्रामक भाषण के बाद भी पिछड़ी सरकार
मंगलवार को राज्यसभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आक्रामक भाषण के बाद सरकार के पास विपक्ष पर बढ़त बनाने का मौका था लेकिन डिप्लोमेसी में वह पिछड़ गया। नतीजतन प्रस्ताव पर विपक्ष अपने संशोधन पर अड़ गया और सरकार हार गई।
प्रधानमंत्री मोदी ने करीब 12 घंटे चली लंबी बहस के बाद धन्यवाद प्रस्ताव पर बहस का जवाब देते हुए विपक्ष पर तीखे हमले किए। लेकिन सरकार के फ्लोर मैनेजर विपक्ष को उसकी अहमियत का अहसास कराने और उनके साथ तालमेल बनाने में फेल दिखे। सरकार यह भूल गई कि विपक्ष ने संशोधनों का प्रस्ताव किया है औऱ सरकार सदन में अल्पमत में है।