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यूनियनों ने कहा, हड़ताल से टूटेगी सरकार की नींद

Thu, 21 Feb 2013 12:05 AM IST
नई दिल्ली/एजेंसी
नई दिल्ली/एजेंसी Updated Thu, 21 Feb 2013 12:05 AM IST
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unions hope government wakes up from strike

दो दिवसीय बंद के पहले दिन बुधवार को हड़ताल को मिले समर्थन को केंद्रीय यूनियनों ने अभूतपूर्व करार दिया है। साथ ही यूनियनों की ओर से उम्मीद जताई गई है कि बड़े पैमाने पर हुए बंद के असर को देखते हुए सरकार की नींद खुलेगी और वह हमारी मांगों को पूरा करने का प्रयास करेगी।

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यूनियन नेताओं ने इस बात को दुखद बताया कि उन्हें अर्थव्यवस्था को 20 हजार करोड़ रुपये का नुकसान पहुंचाने का दोषी करार दिया जा रहा है। उन्होंने इस तरह के आरोप लगाए जाने पर आश्चर्य जताते हुए सवाल किया कि क्या सरकार को टूजी मामले और पिछले बजट में कारपोरेट क्षेत्र को दी गई छूट से होने वाले नुकसान का भी अनुमान है।
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एआईटीयूसी महासचिव गुरुदास दासगुप्ता ने बंद को अभूतपूर्व करार देते हुए कहा है कि इससे पहले इस तरह का आम हड़ताल कभी नहीं देखा गया। उन्होंने कहा कि हम यह कभी नहीं सोच सकते थे कि आम हड़ताल इतना विशाल और व्यापक हो सकता है। इस दौरान अन्य यूनियनों के नेता मौजूद थे।
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दासगुप्ता ने कहा कि अन्ना हजारे के आंदोलन और दिल्ली गैंगरेप के बाद हुए विरोध प्रदर्शन ने केंद्र सरकार को क्रमश: लोकपाल बिल और महिला की सुरक्षा के लिए अध्यादेश लाने पर मजबूर कर दिया। उन्होंने कहा कि आज के बंद के व्यापक असर भी सरकार को श्रमिकों की मांगों को पूरा करने पर मजबूर कर देगी। उन्होंने कहा कि सरकार को इस बंद को मिले समर्थन से सबक लेना चाहिए।

दासगुप्ता ने कहा कि यूनियनों ने पिछले साल सितंबर में बंद की घोषणा की थी, लेकिन सरकार उनसे बातचीत को तैयार नहीं हुई। श्रमिकों की मांगों को संसद में भी उठाया गया था और इन्हें प्रधानमंत्री की मौजूदगी में हुए स्थायी श्रम समिति की बैठक में भी उठाया गया था, लेकिन कोई लाभ नहीं हुआ।

दासगुप्ता ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की भी जमकर आलोचना की। बनर्जी ने आज के बंद को अवैध घोषित किया था। दासगुप्ता ने कहा कि हड़ताल का अधिकार संविधान में मिला है और कोई भी व्यक्ति उसे अवैध करार नहीं दे सकता।

गौरतलब है कि दो दिवसीय बंद का आह्वान 11 केंद्रीय ट्रेड यूनियनों ने अपनी 10 सूत्री मांगों के समर्थन में किया है। इन मांगों में हर व्यक्ति के लिए पेंशन के साथ ही बोनस और पीएफ से सीलिंग हटाने की बात शामिल है। साथ ही बंद का आयोजन महंगाई, मुद्रास्फीति और श्रम कानून के उल्लंघन के विरोध में भी किया गया है।

सीटू ने ममता के बयान की आलोचना की
कर्मचारी संगठन सीटू ने बुधवार को पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के उस बयान को असंवैधानिक और अलोकतांत्रिक करार दिया है, जिसमें उन्होंने चुनाव आयोग से हड़ताल का आह्वान करने वाली पार्टियों को प्रतिबंधित करने की अपील की थी। संगठन ने इसे उनकी हताशा करार दिया।

सीटू के प्रदेश अध्यक्ष श्यामल चक्रवती ने कहा कि यह असंवैधानिक और अलोकतांत्रिक है। मुख्यमंत्री को संविधान की जानकारी नहीं है और वह चुनाव आयोग के अधिकार क्षेत्र से पूरी तरह से अनभिज्ञ हैं। उनका बयान उनकी हताशा जाहिर करता है क्योंकि जनता प्रदेश सरकार की दबाव की नीति से डरता नहीं है।

उन्होंने कहा कि हड़ताल करना कामगारों का हक है जिसे इससे उन्हें कोई भी जबरदस्ती दूर नहीं कर सकता है। इंदिरा गांधी ने जनता को लोकतांत्रिक अधिकारों से अलग रहने का असफल प्रयास किया था। जिसके परिणाम स्वरूप उन्हें सत्ता से बाहर होना पड़ा था।  

आईएनटीयूसी नेता रामेन पांडेय ने कहा कि मुख्यमंत्री की चुनाव आयोग से अपील बेतुकी और अनावश्यक है। इससे लगता है कि वह तानाशाही लागू करने की इच्छुक हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि तृणमूल कांग्रेस नेता खुद भी पहले बंद और हड़तालों का आह्वान कर चुकी हैं। भाकपा नेता बिकाश रंजन भट्टाचार्य ने कहा कि हड़ताल का आह्वान करने वाले राजनीतिक दलों पर प्रतिबंध लगाने का चुनाव आयोग को कोई हक नहीं है।


जहां तक 20 हजार करोड़ रुपये के नुकसान की बात है तो यह ट्रेड यूनियनों की वजह से नहीं, बल्कि सरकार और उसकी नीतियों की वजह से हुआ है। --- गुरुदास दासगुप्ता

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