मुंह फुलाए बैठे नेता भी आए नमो के साथ
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जब समूची काशी में शुक्रवार को मोदी की जीत का जश्न मनाया जा रहा था, इसमें वह लोग भी शामिल हुए जो शुरुआती दौर में टिकट वितरण से असंतुष्ट चल रहे थे।
चुनाव प्रचार के आरंभिक दिनों में जो मुंह फुलाए बैठे थे, नमो लहर के आगे उनके तेवर भी ढीले पड़ गए और बुझे मन ही सही मोदी की जीत की खुशियां उन्होंने भी मनाईं। यही नहीं, शनिवार को नमो के स्वागत की तैयारियों में भी जुटे रहे।
इनमें संगठन के कुछ नेता ऐसे भी थे जिन्हें स्थानीय चुनाव संचालन समिति में जिम्मेदारियां भी दी गई थीं।
इलेक्शन कैंपेन के दौरान फैला था असंतोष
मोदी की कैंपेनिंग के दौरान जब अमित शाह पहली बार बनारस आए तो इनमें से कुछ नेताओं के साथ उन्होंने बैठकें भी कीं और पूरे मन से चुनाव में जुटने की ताकीद की। उस दौरान इन नेताओं ने हामी में सिर हिलाया, लेकिन अंदरखाने में असंतोष बरकरार रहा।
जब यह स्पष्ट हो गया कि वाराणसी से मोदी की जीत होगी, तब भी चुनाव प्रबंधन से जुड़े एक बड़े नेता का कहना था कि हमारी पार्टी ने जनता की अपेक्षाएं इतनी बढ़ा दी है कि उसे पूरा करना बड़ा कठिन होगा। कहीं ऐसा न हो जैसा बड़ा स्वप्न टूटने पर होता है।
वहीं, एक नेता पार्टी के घोषणापत्र की कमियां ही गिनाते फिर रहे थे। वहीं, जब जीत हुई तो सबने बहती गंगा में हाथ धोया और यह आभास नहीं होने देना चाह रहे थे कि उनके मन में कोई असंतोष भी है।
स्थानीय कार्यकर्ताओं का अब क्या होगा!
अब भी पार्टी का एक खेमा कहता फिर रहा है कि स्थानीय कार्यकर्ताओं को हाशिये पर ही रहना होगा।
मोदी प्रधानमंत्री होंगे तो उनका सारा कामकाज तो उनकी अपनी टीम संभालेगी। फिर उन कार्यकर्ताओं के उत्साह का क्या होगा जिन्होंने दिन-रात मेहनत कर मोदी की जीत की जमीन तैयार की।
बहरहाल, मोदी को सम्मानजनक जीत ने यह तो साबित कर ही दिया कि भले ही संगठन के कुछ लोग उन्हें न चाहते हों लेकिन काशी की जनता उन्हें चाहती है।