विधानसभा में खुली 'गुजरात की पोल'
गुजरात विधानसभा के वर्तमान सत्र में भाजपा सरकार की हालत कुछ ठीक नहीं है। नरेंद्र मोदी के मुख्यमंत्री रहते विपक्ष कभी सरकार पर हावी नहीं हो पाया था लेकिन शायद पिछले 14 साल में पहली बार विपक्ष ने सरकार को बुरी तरह घेर लिया है। पहले स्वाइन फ्लू को लेकर और अब वाइब्रेंट गुजरात समिट के बड़े-बड़े दावों को लेकर।
सदन में विपक्ष के दंडक बलवंत सिंह राजपूत ने कहा कि ‘अब तक गुजरात सरकार ने सात वाइब्रैंट समिट किए हैं। इनमें लाखों लोगों को रोजगार देने का दावा किया गया लेकिन आज भी राज्य में 35 लाख लोग बेरोजगार हैं। औद्योगिक विकास सिर्फ कागज पर ही हुआ है क्योंकि सात प्रतिशत से ज्यादा उद्योगों को ताला लग चुका है और 31 प्रतिशत के करीब छोटी-मोटी फैक्टरियां भी बंध पड़ी हैं।
राजपूत ने कहा कि ‘सरकारी आंकड़ों के अनुसार, साल 2003 से 2015 के बीच हुए सात वाइब्रैंट समिट में 30,434 से भी ज्यादा प्रोजेक्ट्स के लिए एमओयू पर हस्ताक्षर हुए जिसके तहत निवेश की राशि 89 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा बताई गई थी। लेकिन हकीकत यह है कि अमल तो सिर्फ नौ फीसद तक ही हुआ है। विदेशी पूंजी निवेश के मामले में गुजरात देश में पांचवें क्रम पर है।’
केजी बेसिन पर 2,800 करोड़ डूबा
गुजरात सरकार ने 2005 में जब आंध्र के कृष्ण गोदावरी बेसिन से प्राकृतिक गैस के भंडार की खोज को लेकर घोषणाएं की थीं तो तत्कालीन मुख्यमंत्री मोदी ने कहा था कि आने वाले दिनों में गुजरात के लोगों के घर में लगे नल से गैस व पेट्रोल आएगा। लेकिन 10 साल में 2,800 करोड़ से ज्यादा खर्च करने के बाद गुजरात सरकार ने विधानसभा में ये माना है कि ‘केजी बेसिन में गैस तो उपलब्ध है लेकिन 400 डिग्री फारनहाइट के तापमान और 12 हजार पाउंड प्रति वर्ग इंच के दबाव जैसी प्रतिकूल स्थिति के कारण गैस निकल पाना संभव नहीं हो पा रहा है।’
टाटा नैनो और फोर्ड की रियायतें वापस लेने की मांग
गुजरात सरकार ने टाटा नैनो और फोर्ड कंपनी को साणंद के पास जमीन के साथ ही रियायतें भी दी थीं। साणंद से कांग्रेस विधायक करमशी भाई पटेल ने रियायतें वापस लेने की मांग करते हुए कहा कि ‘सरकार ने फोर्ड कंपनी को सस्ते दाम पर जमीन दी थी लेकिन कंपनी स्थानीय की जगह बाहर के लोगों को काम पर रख रही है। टाटा ने साणंद में नैनो का उत्पादन बंद कर दिया है। इसलिए करार की शर्त के मुताबिक सरकार को टाटा से जमीन वापस ले लेनी चाहिए।